Congresss New Move Kisan Sammelan Against Trade Deal On The Lines Of Farm Laws
कृषि क़ानूनों वाली तरकीब आज़माएगी कांग्रेस
नवभारत टाइम्स•
कांग्रेस ने भारत-अमेरिका के बीच अंतरिम ट्रेड डील को किसान विरोधी बताया है। इसके खिलाफ पार्टी छह राज्यों में किसान सम्मेलन आयोजित कर रही है। पार्टी का आरोप है कि यह डील किसानों के हितों के खिलाफ है और इससे विदेशी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। कांग्रेस नेतृत्व इस मुद्दे को गंभीरता से उठा रहा है।
कांग्रेस ने भारत-अमेरिका के बीच हुए अंतरिम ट्रेड डील को किसानों के लिए खतरनाक बताते हुए इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। पार्टी छह राज्यों में किसान सम्मेलन आयोजित कर इस मुद्दे को जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी ने दिल्ली में जम्मू-कश्मीर, हिमाचल, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र के नेताओं के साथ मिलकर इस रणनीति को अंतिम रूप दिया है। कांग्रेस का आरोप है कि इस डील में प्रधानमंत्री मोदी ने देश के किसानों के हितों को ताक पर रख दिया है। राहुल गांधी का कहना है कि यह डील कपास, सोयाबीन, मक्का और फल-मेवा उगाने वाले किसानों के लिए बड़ा खतरा है। पार्टी का मानना है कि आयात में छूट और खुले बाजार से विदेशी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, जिससे किसानों की उपज की कीमतें गिरेंगी और उनकी आय पर बुरा असर पड़ेगा। अमेरिका अपने किसानों को भारी सब्सिडी देता है, जबकि भारत में किसानों को ऐसी कोई खास मदद नहीं मिलती।
कांग्रेस जिन छह राज्यों में किसान सम्मेलन करने जा रही है, वे सभी राजनीतिक रूप से बहुत अहम हैं। मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में सोयाबीन और कपास की खेती बड़े पैमाने पर होती है। राजस्थान में कपास के साथ-साथ सरसों भी खूब उगाई जाती है। बिहार में मक्का की खेती और बागवानी प्रमुख है। हिमाचल प्रदेश के किसान फलों की खेती पर निर्भर हैं, और जम्मू-कश्मीर में सेब और सूखे मेवे वहां की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा हैं। इन राज्यों में किसान सम्मेलन आयोजित करके कांग्रेस इन क्षेत्रों के किसानों को सीधे जोड़ने की कोशिश करेगी। पार्टी 24 फरवरी को भोपाल, 7 मार्च को यवतमाल और 9 मार्च को श्रीगंगानगर में सम्मेलन करेगी। इन महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी खुद शामिल होंगे। इससे यह साफ संदेश जाएगा कि पार्टी नेतृत्व इस मुद्दे को कितनी गंभीरता से ले रहा है। राहुल गांधी लगातार किसान नेताओं से मुलाकात कर रहे हैं। कृषि कानूनों के खिलाफ हुए आंदोलन से यह बात साबित हो चुकी है कि जब राजनीतिक दल और किसान संगठन एक साथ आते हैं, तो कोई भी मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर छा जाता है। हालांकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों के आंदोलन का नेतृत्व किसानों के हाथों में ही रहना चाहिए।कांग्रेस संसद में भी केंद्र सरकार पर दबाव बना रही है। पार्टी ने अमेरिका के साथ हुई ट्रेड डील की शर्तों को सार्वजनिक करने की मांग की है। अगर सरकार इन शर्तों को नहीं बताती है, तो कांग्रेस पारदर्शिता का मुद्दा उठाकर सरकार को घेरने की कोशिश करेगी और नैतिक बढ़त हासिल करना चाहेगी।
किसानों के मुद्दे के साथ-साथ कांग्रेस ऊर्जा आयात के मुद्दे को भी उठा रही है। पार्टी का कहना है कि फरवरी 2022 से जनवरी 2026 तक भारत ने रूस से करीब 168 अरब डॉलर का कच्चा तेल खरीदा है। कांग्रेस का तर्क है कि अगर इस व्यापार समझौते से ऊर्जा आयात के स्रोत बदलते हैं, तो इससे देश में महंगाई बढ़ सकती है। कांग्रेस की इस रणनीति में अवसर के साथ-साथ कुछ जोखिम भी हैं। ट्रेड डील के जटिल प्रावधानों और सरकार के अपने आंकड़ों के कारण कांग्रेस की चिंताओं को कम करके आंका जा सकता है। साथ ही, इन राज्यों में कांग्रेस संगठन की क्षमताएं अलग-अलग हैं, इसलिए इन सम्मेलनों को सफल बनाना एक बड़ी चुनौती होगी।
आगामी चुनावों को देखते हुए कांग्रेस ग्रामीण मतदाताओं पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है। किसानों का मुद्दा भावनात्मक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर बहुत असरदार होता है। संसद और सड़क पर अभियान चलाकर कांग्रेस राष्ट्रीय नीति पर एक वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करना चाहती है और साथ ही अपने जमीनी नेटवर्क को भी सक्रिय करना चाहती है। यदि यह अभियान स्थानीय मांगों जैसे न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), फसल बीमा और खेती की लागत जैसे मुद्दों से जुड़ता है, तो ट्रेड डील का विरोध एक व्यापक कृषि विमर्श का रूप ले सकता है। यह सिर्फ एक व्यापार समझौते का विरोध नहीं है, बल्कि किसान राजनीति में कांग्रेस की वापसी का एक प्रयास है। पार्टी नेतृत्व की सक्रियता, राज्यों का सही चुनाव और पारदर्शिता की मांग, यह सब एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है।