10 Minute Delivery Halted Government Intervention On Gig Worker Safety Whats The Full Story
ये कैसी भागमभाग
नवभारत टाइम्स•
क्विक कॉमर्स कंपनियों ने सरकार के कहने पर 10 मिनट में डिलीवरी की सेवा बंद कर दी है। यह फैसला गिग वर्कर्स की सुरक्षा के लिए उठाया गया है। भारत में गिग वर्कर्स की संख्या तेजी से बढ़ी है। 10 मिनट में डिलीवरी के चक्कर में वर्कर्स पर दबाव और जोखिम बढ़ रहा था।
सरकार के दखल के बाद क्विक कॉमर्स कंपनियों ने '10 मिनट में डिलीवरी' की सर्विस बंद करने पर सहमति जताई है। यह फैसला लाखों गिग वर्कर्स की सुरक्षा और उनके काम करने के माहौल को बेहतर बनाने के लिए लिया गया है। कुछ कंपनियों ने तो इस पर अमल करना भी शुरू कर दिया है।
देश में गिग वर्कर्स की संख्या तेजी से बढ़ी है। 2021 में जहां ये 77 लाख थे, वहीं अब इनकी संख्या एक करोड़ को पार कर गई है। इनमें बड़ी संख्या उन लोगों की है जो क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स से जुड़े हैं। यह सेक्टर अर्थव्यवस्था का एक अहम हिस्सा बन गया है और ग्राहकों को अच्छी सर्विस दे रहा है। लेकिन, इसके साथ ही गिग वर्कर्स की सुरक्षा को लेकर चिंताएं भी बढ़ गई हैं।'10 मिनट में डिलीवरी' का वादा सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है, लेकिन इसके पीछे कई खतरे छिपे हैं। इस सर्विस में काम करने वाले कर्मचारियों पर समय पर डिलीवरी करने का भारी दबाव होता है। 10 मिनट में सामान पहुंचाने के लिए वे अक्सर ट्रैफिक नियमों को तोड़ते हैं और भीड़भाड़ वाली सड़कों पर तेज रफ्तार से गाड़ियां चलाते हैं। यह एक आम बात हो गई है।
भारत में क्विक कॉमर्स की शुरुआत 2021 में हुई थी। एक कंपनी ने इसे अपना बिजनेस मॉडल बनाया और देखते ही देखते दूसरी कंपनियां भी इसी राह पर चल पड़ीं। हालांकि, अमेरिका, यूरोप और चीन जैसे देशों में ऐसे प्रयोग पहले ही फेल हो चुके हैं। तुर्किये की एक कंपनी ने तो 2015 में ही 10 मिनट डिलीवरी का कॉन्सेप्ट पेश किया था, लेकिन वह भी सफल नहीं हो पाई। इन सभी जगहों पर असफलता की एक ही वजह रही - व्यावहारिकता और जरूरत का सवाल।
सवाल यह उठता है कि क्या वाकई 10 मिनट में डिलीवरी की जरूरत है? खासकर उन शहरों में जहां गाड़ियों से भरी सड़कों पर एक सिग्नल पार करने में भी 10 मिनट लग जाते हैं, वहां घर तक सामान पहुंचाना कितना आसान हो सकता है? क्या घरेलू सामान की डिलीवरी इतनी जरूरी है कि इसके लिए जोखिम उठाया जाए? कंपनियां तेजी से 'डार्क स्टोर्स' की संख्या बढ़ा रही हैं। अभी ऐसे करीब 2500 स्टोर हैं और 2030 तक यह संख्या 7500 तक पहुंचने का अनुमान है। लेकिन, इसके साथ ही डिलीवरी का दबाव भी बढ़ता जाएगा।
व्यापार में ग्राहक को सबसे ऊपर माना जाता है, लेकिन इसके लिए कर्मचारियों की सुरक्षा और सेहत से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। सरकार ने 'सोशल सिक्योरिटी कोड 2020' के जरिए गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा प्रदान की है। ये नियम पिछले साल 21 नवंबर से लागू हो गए हैं। अब सभी पक्षों को मिलकर ऐसे समाधान निकालने होंगे जिससे वर्कर्स को उनका हक मिले और अर्थव्यवस्था को भी नुकसान न पहुंचे।
यह '10 मिनट में डिलीवरी' का कॉन्सेप्ट असल में एक दौड़ थी, जिसमें कंपनियां एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश कर रही थीं। लेकिन, इस दौड़ में सबसे ज्यादा नुकसान गिग वर्कर्स को हो रहा था। वे अपनी जान जोखिम में डालकर ग्राहकों को खुश करने की कोशिश कर रहे थे। सरकार का यह कदम इन वर्कर्स के लिए एक राहत की खबर है।
गिग वर्कर्स, जिन्हें अक्सर 'प्लेटफॉर्म वर्कर्स' भी कहा जाता है, वे लोग होते हैं जो किसी ऐप या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए काम करते हैं। जैसे कि फूड डिलीवरी बॉय, कैब ड्राइवर, या ऑनलाइन सामान पहुंचाने वाले लोग। ये लोग किसी एक कंपनी के परमानेंट कर्मचारी नहीं होते, बल्कि प्रोजेक्ट के हिसाब से काम करते हैं।
'डार्क स्टोर्स' का मतलब है ऐसे छोटे गोदाम या स्टोर जो सिर्फ ऑनलाइन ऑर्डर पूरा करने के लिए बनाए जाते हैं। ये आम जनता के लिए खुले नहीं होते और इनका मकसद होता है कि सामान जल्दी से जल्दी ग्राहकों तक पहुंचाया जा सके। क्विक कॉमर्स कंपनियां इन्हीं डार्क स्टोर्स का इस्तेमाल करके तेजी से डिलीवरी करती हैं।
सरकार का यह फैसला यह सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है कि आर्थिक विकास के साथ-साथ श्रमिकों का कल्याण भी हो। यह दिखाता है कि सरकार गिग वर्कर्स की समस्याओं को समझ रही है और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। उम्मीद है कि कंपनियां भी इस फैसले का सम्मान करेंगी और अपने वर्कर्स के लिए एक सुरक्षित और बेहतर काम का माहौल बनाएंगी।