Isros Failure Will This Setback Weigh Heavily On Indias Space Future
ISRO की ये नाकामी आगे कामयाबी में बदलेगी
नवभारत टाइम्स•
इसरो का पहला मिशन असफल रहा। पीएसएलवी-सी62 रॉकेट तकनीकी खराबी से भटक गया। इसने 16 सैटेलाइट और पेलोड खो दिए। यह असफलता भारत की कूटनीतिक और वैश्विक अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं को झटका है। अंतरिक्ष में असफलताएं आम हैं, लेकिन इनसे सबक लेना जरूरी है। इसरो के भरोसेमंद रॉकेट की लगातार दो असफलताएं क्लाइंट्स को हिचकिचा सकती हैं।
इसरो का साल का पहला मिशन, PSLV-C62 रॉकेट में तकनीकी खराबी के कारण असफल हो गया, जिससे 16 सैटेलाइट और पेलोड अंतरिक्ष में नहीं पहुंच सके। यह मिशन भारत की कूटनीतिक जरूरतों और अंतरिक्ष में वैश्विक महत्वाकांक्षाओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण था, और इसकी असफलता ने दोनों को झटका दिया है। अंतरिक्ष अभियानों में असफलताएं आम हैं, लेकिन इन विफलताओं से मिले सबक और ईमानदारी से की गई जांच ही भविष्य की सफलता की नींव रखती है, अन्यथा बाजार में हिस्सेदारी और प्रतिष्ठा दोनों को नुकसान पहुंचता है, जैसा कि रूस के अंतरिक्ष कार्यक्रम के साथ हुआ।
यह असफलता इसरो के लिए चिंता का विषय है क्योंकि PSLV को लंबे समय से उसका सबसे भरोसेमंद रॉकेट माना जाता रहा है। लगातार दो मिशनों की विफलता के कारण अब ग्राहक हिचकिचा सकते हैं। आज का अंतरिक्ष बाजार बहुत प्रतिस्पर्धी है, जहां नए लॉन्चर तेजी से उड़ान भरने का वादा कर रहे हैं। ऐसे में, इसरो केवल अपनी पुरानी साख के सहारे आगे नहीं बढ़ सकता।इस लॉन्च में कई उपग्रह नष्ट हुए, जिनमें DRDO का एक महत्वपूर्ण रक्षा पेलोड भी शामिल था। भारत में पहले से ही निगरानी, खुफिया जानकारी और सुरक्षित संचार में कुछ कमियां हैं। एक रक्षा उपग्रह के नुकसान से ये कमियां और बढ़ जाती हैं, खासकर जब क्षेत्रीय सुरक्षा हालात को देखते हुए क्षमता तेजी से बढ़ाने की जरूरत है। इस देरी से देश के हित को नुकसान पहुंच सकता है।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद इसरो ने कहा था कि देश की अंतरिक्ष क्षमताओं की वजह से दुश्मन के इलाके में भीतर तक सटीक कार्रवाई संभव हो पाई। यह एक असामान्य कदम था। हालांकि, हर असफलता अभियानों को महीनों और कभी-कभी बरसों के लिए पीछे धकेल देती है। रिप्लेसमेंट सैटेलाइट के लिए फंड की मंजूरी से लेकर निर्माण तक सब कुछ नए सिरे से करना पड़ता है।
भारत में प्राइवेट लॉन्च स्टार्टअप की बात हो रही है, लेकिन ऐसे स्टार्टअप भी इन असफलताओं की तुरंत भरपाई नहीं कर पाएंगे। भारत के प्राइवेट लॉन्च वीकल अभी शुरुआती दौर में हैं। इसलिए, देश के लिए जरूरी मिशन को अंजाम देने की जिम्मेदारी अभी भी इसरो पर ही है।
अंतरिक्ष अभियानों में असफलताएं नई बात नहीं हैं। इसरो, नासा, SpaceX, चीन और रूस जैसे सभी बड़े अंतरिक्ष संगठनों को कभी न कभी नाकामी का सामना करना पड़ा है। इसे टाला नहीं जा सकता। अंतरिक्ष एक बहुत जोखिम भरा क्षेत्र है। इन असफलताओं से हमें जरूरी डेटा मिलता है और आगे के अभियानों के लिए महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं। इन्हीं की बुनियाद पर हम फिर से सफलता हासिल करते हैं। लेकिन इसके लिए यह बहुत जरूरी है कि विफलताओं की ईमानदारी से जांच की जाए। अगर ऐसा नहीं किया गया, तो नुकसान बहुत बड़ा हो सकता है। इससे बाजार में हमारी हिस्सेदारी और हमारी प्रतिष्ठा, दोनों को चोट पहुंचती है। रूस का अंतरिक्ष कार्यक्रम इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
PSLV लंबे समय से इसरो का सबसे भरोसेमंद रॉकेट रहा है। एजेंसी इस पर बहुत निर्भर रही है। लेकिन, लगातार दो मिशनों की विफलता के कारण अब क्लाइंट हिचकिचाएंगे। आज का अंतरिक्ष बाजार बहुत प्रतिस्पर्धी है। नए लॉन्चर तेज उड़ान का वादा कर रहे हैं। ऐसे में, ISRO केवल अपनी पुरानी साख के सहारे आगे नहीं बढ़ सकता।
इस लॉन्च में कई उपग्रह नष्ट हुए हैं, जिनमें DRDO का एक अहम रक्षा पेलोड भी शामिल था। भारत में पहले से ही निगरानी, खुफिया जानकारी और सुरक्षित संचार में कुछ कमियां हैं। अब एक रक्षा उपग्रह के नुकसान से ये कमियां और बढ़ जाती हैं, खासकर जब क्षेत्रीय सुरक्षा हालात की वजह से क्षमता तेजी से बढ़ाने की जरूरत है। ऐसी देरी देश के हित में नहीं है।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद इसरो ने कहा था कि देश की अंतरिक्ष क्षमताओं की वजह से दुश्मन के इलाके में भीतर तक सटीक कार्रवाई संभव हो पाई। यह एक असामान्य कदम था। हालांकि, हर असफलता अभियानों को महीनों और कई बार बरसों के लिए पीछे धकेल देती है। रिप्लेसमेंट सैटेलाइट के लिए फंड्स की मंजूरी से लेकर निर्माण तक सब कुछ नए सिरे से होता है।
भारत में प्राइवेट लॉन्च स्टार्टअप की बात हो रही है। हालांकि, ऐसे स्टार्टअप से भी इन असफलताओं की तुरंत भरपाई नहीं हो पाएगी। भारत के प्राइवेट लॉन्च वीकल अभी शुरुआती दौर में हैं। देश के लिए जरूरी मिशन को अंजाम देने की जिम्मेदारी अब भी इसरो पर ही है।