Uncontested Election Has The Final Phase Of Kalyug Begun
ऐसे कैसे निर्विरोध
नवभारत टाइम्स•
महाराष्ट्र निकाय चुनावों में एक ऐसे उम्मीदवार के निर्विरोध चुने जाने की खबर है जो अपने आसपास किसी भी व्यक्ति के बीच लोकप्रिय नहीं था। वह अपने इलाके, पार्टी और यहां तक कि परिवार में भी विरोध का सामना करता था। पिछले साल वह सोसायटी के सचिव पद का चुनाव भी हार गया था।
महाराष्ट्र निकाय चुनावों में एक ऐसे उम्मीदवार का निर्विरोध चुना जाना, जिसे उसके अपने लोग, पड़ोसी और यहां तक कि पान वाला भी पसंद नहीं करता, एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। यह घटना इस बात की ओर इशारा करती है कि कहीं न कहीं चुनावी प्रक्रिया में कुछ गड़बड़ है, जहां पैसे का बोलबाला साफ नजर आता है।
यह मामला तब और भी हैरान करने वाला हो जाता है जब पता चलता है कि यही शख्स पिछले साल अपनी ही सोसायटी में सेक्रेटरी के चुनाव में बुरी तरह हार गया था। लेकिन आज वह बिना किसी मुकाबले के कॉर्पोरेटर बन गया है। उसके सगे भाई ने भी इस बात पर हैरानी जताई थी कि उसे घर से ही वोट मिल जाएं, यह भी बड़ी बात होगी। ऐसे में उसका निर्विरोध चुना जाना किसी चमत्कार से कम नहीं लगता।खबरों के मुताबिक, जब पार्टी ने उसे उम्मीदवार बनाने का फैसला किया, तो उसके खिलाफ काफी विरोध था। लेकिन जैसे ही टिकट उसके हाथ में आया, पैसों की खनक सुनाई दी। कहा जा रहा है कि इसी पैसों के खेल ने बाकी उम्मीदवारों को शांत कर दिया और वे उसके सामने "बैठ" गए, यानी चुनाव लड़ने से पीछे हट गए।
जब इस बात की खबर चौरसिया पान वाले को मिली, तो पहले तो उसे यकीन ही नहीं हुआ। उसने सोचा कि यह कोई मजाक है। लेकिन जब उसे पक्की खबर मिली, तो उसने भी हैरानी जताते हुए कहा, "बाबू जी, क्या सचमुच कलयुग का अंतिम चरण शुरू हो चुका है...?" यह बात इस घटना की गंभीरता को दर्शाती है।
यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति की जीत नहीं है, बल्कि यह एक बड़े सवाल को जन्म देती है कि क्या आज के समय में चुनाव निष्पक्ष हो रहे हैं? क्या जनता की आवाज की कोई अहमियत रह गई है? या फिर सब कुछ पैसों और ताकत के खेल पर निर्भर करता है?
सोचिए, एक ऐसा व्यक्ति जिसे उसके अपने मोहल्ले वाले भी पसंद नहीं करते, जिसके खिलाफ उसकी पार्टी में भी माहौल खराब है, वह कैसे निर्विरोध जीत सकता है? यह सवाल आम आदमी को सोचने पर मजबूर करता है। यह दिखाता है कि कहीं न कहीं सिस्टम में खामियां हैं, जिनका फायदा कुछ लोग उठा रहे हैं।
यह मामला इस बात का भी संकेत देता है कि चुनाव लड़ने के लिए सिर्फ लोकप्रियता या जनता का समर्थन ही काफी नहीं है। कभी-कभी पैसे का जोर भी बहुत चलता है। जब टिकट बंटवारे के समय ही पैसों का खेल शुरू हो जाता है, तो फिर निष्पक्ष चुनाव की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
यह घटना महाराष्ट्र निकाय चुनावों के संदर्भ में हुई है, लेकिन यह समस्या सिर्फ महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है। देश के कई हिस्सों में ऐसी खबरें आती रहती हैं, जहां पैसे के दम पर या किसी और तरह के दबाव के कारण उम्मीदवार निर्विरोध चुने जाते हैं।
यह एक चिंताजनक स्थिति है। अगर ऐसे ही चलता रहा, तो आम आदमी का लोकतंत्र पर से विश्वास उठ जाएगा। हमें यह सोचना होगा कि हम किस तरह के नेताओं को चुन रहे हैं और क्यों चुन रहे हैं। क्या हम सच में अपने प्रतिनिधि चुन रहे हैं या फिर किसी और के इशारों पर काम करने वाले लोगों को सत्ता में ला रहे हैं?
यह घटना एक चेतावनी है कि हमें चुनावी प्रक्रिया पर पैनी नजर रखनी होगी और यह सुनिश्चित करना होगा कि चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी हों। तभी हम एक मजबूत और स्वस्थ लोकतंत्र का निर्माण कर पाएंगे।