1855-56 की बात है, कुछ ठिकाना नहीं रह गया था कि ईस्ट इंडिया कंपनी के शिकंजे में फंसे अवध के नवाब वाजिद अली शाह की हुकूमत का सूरज कब डूब जाए। फिर भी उनकी शाहखर्ची बेलगाम बनी हुई थी। हालांकि कुछ लोगों की निगाह में यह उनकी दरियादिली की पैदाइश थी, तो कुछ की निगाह में विलासिता।
शाहखर्ची के चर्चे । जाने-माने लखनऊविद स्मृतिशेष योगेश प्रवीन ने अपनी बहुचर्चित पुस्तक 'नवाबी के जलवे' में वाजिद अली शाह के खर्चों से जुड़े कई वाकयों का जिक्र किया है। उनमें एक है कि उन्हीं दिनों किस्मत का मारा एक बहेलिया उनको उकाब (गरुड़) का एक जोड़ा बेचने आया। हाथ में एक सुनहरा पर्देदार पिंजरा लिए वह दरबार में पहुंचा तो दस्तूर के मुताबिक तख्त-ए-सुल्तानी के पास जाकर कोर्निश बजाई। फिर उनके शाही लिबास के दामन को आंखों से लगाया और डरते-डरते बोला, 'हुजूरेआला, उकाब के इस जोड़े को कबूल कर लें तो मेरा मुकद्दर संवर जाए।'बहेलिया की चाल । उसका खस्ता हाल देख वाजिद अपना हाल भूल गए और फौरन रजामंदी जता दी। लेकिन, आसानी से काम बनता देखकर बहेलिए ने कीमत के तौर पर 10 हजार रुपये की बड़ी रकम मांग ली। बुजुर्ग वजीर-ए-आजम अमीनुद्दौला को समझते देर नहीं लगी कि वह वाजिद की दरियादिली का बेजा फायदा उठाने के फेर में है। उन्होंने गौर से देखा तो पाया कि उसका उकाब का जोड़ा भी असली नहीं है।
वजीर का शक । उन्होंने नवाब से कहा कि वह सौदा कल पर टाल दें। लेकिन, वाजिद को ऐसा करना अपनी हेठी भी लगा और शान में गुस्ताखी भी। सो, उन्होंने आपा खोते हुए हुक्म दिया कि छतर मंजिल (महल) के तहखाने में रखे उनकी मां के संदूक से मोहरें लाकर बहेलिए को दे दी जाएं और परिंदों को चिड़ियाघर में पहुंचा दिया जाए। हुक्म की फौरन तामील हुई। जब बहेलिया गदगद होकर लौट गया तो अमीनुद्दौला ने वाजिद से शक जाहिर किया कि उकाब का जोड़ा असली नहीं है।
नवाब की झुंझलाहट । वजीर ने सोचा था कि बहेलिए को वापस बुलाकर वाजिद कड़ी सजा देंगे, लेकिन वह उल्टे झुंझला उठे, 'बेवकूफ समझते हो मुझे? मुझे अच्छी तरह मालूम है कि बहेलिया उकाब का नहीं, चील का जोड़ा लाया था। लेकिन सोचो जरा, यह जानते हुए कि भेद खुल जाने पर मैं उसको बहुत कड़ी सजा दूंगा और कौन जाने, उसे जान से भी हाथ धोना पड़ जाए, उसने मुझे ठगने की कोशिश की तो कितना मजबूर रहा होगा वह। इतना बड़ा खतरा कोई यूं ही तो नहीं उठाता।' बेचारे अमीनुद्दौला क्या जवाब देते? उनको याद आया, कुछ ही दिनों पहले वाजिद ने खास प्रजाति के कबूतरों का एक जोड़ा 24 हजार रुपये में और सफेद मोरों का एक जोड़ा 11 हजार रुपये में खरीद लिया था।