देवकीनंदन ठाकुर ने मुफ्त शिक्षा स्वास्थ्य की वकालत की, समान अवसर पर दिया जोर
देवकीनंदन ठाकुर ने मुफ्त शिक्षा-स्वास्थ्य की वकालत की, समान अवसर पर दिया जोर
NewsPoint•
जयपुर, 27 जुलाई। प्रसिद्ध कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने देश में सभी नागरिकों के लिए मुफ्त और समान शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की पुरजोर वकालत की है। उनका मानना है कि अगर वाकई में देश में सबको बराबर अधिकार देना है, तो इसकी शुरुआत शिक्षा और इलाज से होनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि छात्रों को परीक्षा से जुड़े मुद्दों, पेपर लीक और ऐसे मामलों पर सवाल उठाने का पूरा हक है, लेकिन प्रदर्शन हमेशा शांतिपूर्ण, संयमित और शालीन भाषा में ही होना चाहिए। पेपर लीक को रोकने के लिए कड़े कानून बनाने के फैसले का उन्होंने स्वागत किया।
देवकीनंदन ठाकुर ने एक खास बातचीत में कहा कि भारत को विश्व कप जिताने वाले अनुभवी खिलाड़ी आज नई पीढ़ी को सिखा रहे हैं। लेकिन हर खिलाड़ी को भारतीय टीम या आईपीएल में खेलने का मौका नहीं मिल पाता। इसलिए ऐसे मंच बनाने की जरूरत है, जहाँ पुराने क्रिकेटर नौजवानों को ट्रेनिंग और सलाह दे सकें। क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं है, बल्कि यह देश का नाम रोशन करने और युवाओं को सही रास्ता दिखाने का जरिया भी है। बड़े खिलाड़ियों का तजुर्बा युवा खिलाड़ियों को निखारने में बहुत काम आता है। जब नौजवानों का जोश और बड़ों का अनुभव एक साथ मिलता है, तो सिर्फ खिलाड़ी ही नहीं, बल्कि देश भी आगे बढ़ता है। अनुभवी क्रिकेटरों की देखरेख में खिलाड़ियों की पहचान बेहतर तरीके से हो सकती है और इससे भारतीय क्रिकेट को नई ऊंचाइयां मिलेंगी।देवकीनंदन ठाकुर ने खेलों को समाज सेवा से जोड़ने पर भी जोर दिया। उन्होंने बताया कि प्रतियोगिताओं में खिलाड़ियों को कोई पैसा नहीं देना पड़ता। पिछले सत्र में बनाए गए हर रन पर 500 रुपए सामाजिक कार्यों के लिए दिए गए। इस पैसे का इस्तेमाल तेजाब हमले की शिकार बच्चियों की मदद करने और अस्पताल बनाने जैसे कामों में किया गया। उन्होंने कहा कि बचपन से ही खिलाड़ियों के अंदर यह भावना डालनी चाहिए कि उनकी सफलता सिर्फ उनकी अपनी उपलब्धि नहीं है, बल्कि समाज, देश और धर्म के प्रति भी उनकी जिम्मेदारी है। उन्होंने चिंता जताई कि आजकल समाज में स्वार्थ की भावना बढ़ रही है, जिसे सेवा और अच्छे संस्कारों से खत्म करने की जरूरत है।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर उन्होंने कोई टिप्पणी करने से इनकार कर दिया और इसे एक राजनीतिक मामला बताया। हालांकि, उन्होंने साफ तौर पर कहा कि सरकार को मुफ्त की दूसरी योजनाओं के बजाय दो चीजें पूरी तरह से मुफ्त और सबके लिए एक जैसी उपलब्ध करानी चाहिए: शिक्षा और चिकित्सा। आज देश में शिक्षा की व्यवस्था कई स्तरों पर बंटी हुई है। जो लोग आर्थिक रूप से मजबूत हैं, वे विदेश या महंगे निजी स्कूलों में पढ़ते हैं। वहीं, गरीब और ग्रामीण परिवारों के बच्चे सरकारी स्कूलों तक ही सीमित रह जाते हैं। ऐसी असमान व्यवस्था में सबको बराबर मौके मिलने की बात करना सही नहीं है। चाहे मंत्री का बेटा हो, किसान का बेटा हो, अधिकारी का बेटा हो या किसी भी वर्ग का बच्चा हो, सबको एक जैसी शिक्षा और एक जैसी गुणवत्ता वाली चिकित्सा सुविधा मिलनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि अगर किसी गरीब आदमी को कैंसर जैसी गंभीर बीमारी हो जाती है, तो उसके ठीक होने की उम्मीद बहुत कम हो जाती है। जबकि अमीर लोग देश या विदेश में बेहतर इलाज करा लेते हैं। जिस दिन देश में शिक्षा और चिकित्सा का समान अधिकार लागू हो जाएगा, उसी दिन असली सामाजिक न्याय की दिशा में एक बड़ा कदम माना जाएगा। नीट (NEET) परीक्षा और छात्रों की मौतों का जिक्र करते हुए देवकीनंदन ठाकुर ने कहा कि एक भी छात्र की जान जाना पूरे समाज के लिए चिंता का विषय है। मरे हुए छात्रों के परिवारों को चाहे जितनी भी आर्थिक मदद दी जाए, उनकी भरपाई नहीं हो सकती। इसलिए ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए कि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों। उन्होंने समान शिक्षा व्यवस्था को इस दिशा में सबसे अहम समाधान बताया।
सोशल मीडिया पर समान शिक्षा को लेकर चल रहे अभियानों पर उन्होंने कहा कि वह कई सालों से लगातार समान शिक्षा की मांग कर रहे हैं। उन्होंने आरक्षण को एक राजनीतिक मुद्दा बताते हुए इस पर सीधी टिप्पणी नहीं की। लेकिन उन्होंने इतना जरूर कहा कि शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में ऐसे फैसले होने चाहिए जो समाज के सबसे गरीब व्यक्ति के हित में हों। उन्होंने कहा कि गरीबी किसी जाति को देखकर नहीं आती, इसलिए जरूरतमंद हर व्यक्ति की मदद की जानी चाहिए।
देवकीनंदन ठाकुर ने कहा कि वे जनहित के आंदोलनों का समर्थन करते हैं, लेकिन हर आंदोलन में भाषा की मर्यादा और अहिंसा का पालन होना चाहिए। शब्दों की हिंसा भी एक तरह की हिंसा ही है। उन्होंने कबीर के दोहे ‘ऐसी वाणी बोलिए’ का जिक्र करते हुए युवाओं से अपील की कि वे अपने अधिकारों के लिए आवाज जरूर उठाएं, लेकिन संयमित भाषा और शांतिपूर्ण तरीके से। उन्होंने अन्ना हजारे का उदाहरण देते हुए कहा कि उन्होंने भी अपने आंदोलनों में कभी हिंसा का सहारा नहीं लिया और यही लोकतांत्रिक विरोध का सही तरीका है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि देश में सबको एक जैसी शिक्षा मिलनी चाहिए। आज अमीर लोग अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाते हैं, जबकि गरीब बच्चे सरकारी स्कूलों में जाते हैं। यह ठीक नहीं है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि चाहे कोई भी बच्चा हो, उसे अच्छी से अच्छी शिक्षा मिले। इसी तरह, स्वास्थ्य सेवाएं भी सबके लिए बराबर होनी चाहिए। अगर किसी गरीब को बीमारी हो जाती है, तो उसे भी वही इलाज मिलना चाहिए जो किसी अमीर को मिलता है। उन्होंने कहा कि जब तक शिक्षा और चिकित्सा सबके लिए समान नहीं हो जाती, तब तक असली सामाजिक न्याय नहीं आ सकता।
नीट परीक्षा को लेकर छात्रों की नाराजगी और कुछ छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं पर उन्होंने गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि किसी भी छात्र की जान जाना पूरे देश के लिए दुख की बात है। उन्होंने कहा कि सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिससे भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों। समान शिक्षा व्यवस्था को उन्होंने इस समस्या का एक बड़ा हल बताया। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया पर समान शिक्षा के लिए जो अभियान चल रहे हैं, वे सही हैं और वे खुद भी सालों से इसकी मांग कर रहे हैं।
आरक्षण के मुद्दे पर उन्होंने सीधे तौर पर कुछ नहीं कहा, लेकिन यह जरूर कहा कि शिक्षा और स्वास्थ्य के फैसले ऐसे होने चाहिए जिनसे समाज के सबसे गरीब लोगों को फायदा हो। उन्होंने कहा कि गरीबी किसी जाति या धर्म को देखकर नहीं आती, इसलिए हर जरूरतमंद की मदद होनी चाहिए।
देवकीनंदन ठाकुर ने कहा कि वे ऐसे सभी आंदोलनों का समर्थन करते हैं जो लोगों के भले के लिए हों। लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि हर आंदोलन में भाषा का ध्यान रखना चाहिए और हिंसा नहीं करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि कड़वे शब्द भी चोट पहुंचाते हैं, इसलिए युवाओं को अपनी बात शांति से और सही तरीके से रखनी चाहिए। उन्होंने अन्ना हजारे का उदाहरण दिया कि कैसे उन्होंने बिना हिंसा के अपनी बात रखी और लोगों का समर्थन हासिल किया। उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे अपने हक के लिए आवाज उठाएं, लेकिन हमेशा शांति और संयम बनाए रखें।