छात्रों ने आवाज़ उठाई तो Pm ने चुना संवाद का रास्ता
छात्रों ने आवाज़ उठाई तो PM ने चुना संवाद का रास्ता
नवभारतटाइम्स.कॉम•
हालिया छात्र आंदोलन की सबसे बड़ी और विचारणीय कहानी खुद आंदोलन नहीं, बल्कि उस पर भारत सरकार की लोकतांत्रिक प्रतिक्रिया है। किसी भी जीवंत लोकतंत्र में विरोध और असहमति का होना स्वाभाविक है, लेकिन सत्ता की वास्तविक कसौटी यह होती है कि वह उस असहमति से निपटती कैसे है। पिछले एक दशक से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि को लेकर विरोधी दलों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया के एक खास वर्ग द्वारा यह नैरेटिव गढ़ा जाता रहा कि उनके नेतृत्व में भारत लोकतांत्रिक मूल्यों से दूर जा रहा है और असहमति की जगह खत्म हो रही है। हर राजनीतिक घटनाक्रम को इसी पूर्वाग्रह की पुष्टि के लिए इस्तेमाल किया गया, लेकिन छात्र आंदोलन ने इस समूचे आख्यान की कलई खोलकर रख दी है।
बातचीत से निकला समाधानजंतर-मंतर पर जब छात्रों ने मांगें उठाईं, तब केंद्र सरकार चाहती तो बातचीत का रास्ता न अपनाकर, वैमनस्य का रुख अपना सकती थी या मामले को लंबे समय तक लटका सकती थी। लेकिन उसने जवाबदेही और संवाद का मार्ग चुना। शिक्षा क्षेत्र में अभूतपूर्व सुधार करने वाले केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने नैतिक व राजनीतिक जवाबदेही लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। यह सिर्फ एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि इस बात का मुखर संदेश था कि सरकार जनभावनाओं के प्रति पूरी तरह जवाबदेह है। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री ने अपने वरिष्ठ मंत्रियों जेपी नड्डा और डॉ. जितेन्द्र सिंह को कॉकरोच जनता पार्टी के प्रतिनिधियों सहित आंदोलनकारी छात्रों से सीधी वार्ता की कमान सौंपी। अंततः बिना किसी बल प्रयोग, बिना किसी टकराव और बिना छात्रों को 'विरोधी' समझे, संवाद के ज़रिए एक शांतिपूर्ण समाधान निकल आया।
यह घटनाक्रम उन लोगों के लिए बेहद असुविधाजनक है जो भारत पर तानाशाही की दिशा में बढ़ने का ठप्पा लगाते रहे हैं। अगर कोई सरकार वाकई तानाशाही रवैया रखती, तो क्या वह मंत्री स्तर पर त्यागपत्र स्वीकार करती या आंदोलनकारियों से मेज पर बैठकर बात करती? राहुल गांधी और कांग्रेस ने हमेशा की तरह इस संवेदनशील मुद्दे को भी प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ एक राजनीतिक हथियार में बदलने की भरपूर कोशिश की, लेकिन सरकार की मंशा टकराव की नहीं, बल्कि सहमति बनाने की थी।
बेशक कुछ लोग इसे राजनीतिक रणनीति मान सकते हैं और लोकतंत्र में शासन को राजनीति से पूरी तरह अलग भी नहीं किया जा सकता। लेकिन किसी भी नीति का आकलन उसके सुखद परिणाम से होना चाहिए। इस घटनाक्रम में सरकार ने जनता की आवाज़ सुनी, जवाबदेही ली और जनभावना का सम्मान किया, यह सरकार के आत्मविश्वास का प्रतीक है, किसी असुरक्षा का नहीं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है; तीनों कृषि कानूनों को वापस लेते समय भी प्रधानमंत्री मोदी ने स्वयं देश के सामने आकर बड़ी विनम्रता से अपनी बात रखी थी और जनविश्वास को सर्वोपरि माना था। इसी तरह 'मायगव' और 'मन की बात' जैसे माध्यमों या संसदीय प्रक्रियाओं से सरकार ने हमेशा नागरिकों से जुड़ाव बनाए रखा है।
स्वस्थ लोकतंत्र की रीढ़ ही आलोचना और सवाल पूछना होता है और सत्ता को इसका सम्मान करना चाहिए। परंतु आलोचना की साख तभी बचती है जब उसमें सच को स्वीकार करने का साहस हो। यदि हर घटना को जबरन पूर्वाग्रहों के सांचे में ढालने की कोशिश होगी, तो निष्पक्ष मूल्यांकन असंभव हो जाएगा। जो लोग लगातार प्रधानमंत्री मोदी को तानाशाह साबित करने में तुले रहते हैं, उन्हें ईमानदारी से जवाब देना चाहिए कि क्या असहमति से डरने वाली सरकार कभी इतने बड़े स्तर पर जवाबदेही और संवाद का मार्ग चुनती?
विदेशी मीडिया का पूर्वाग्रह
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे खूबसूरत पहलू यह है कि आंदोलन कर रहे छात्र कोई विरोधी नहीं, बल्कि भारत के भावी नीति-निर्माता, वैज्ञानिक, उद्यमी और भावी नेतृत्व हैं। एक परिपक्व लोकतंत्र अपनी युवा पीढ़ी को प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण का सहभागी मानता है। भारत सरकार ने यही परिपक्वता दिखाई है। लोकतंत्र केवल पांच साल में एक बार वोट डालने का नाम नहीं है, बल्कि चुनावों के बीच भी जनता के भरोसे को बनाए रखना इसका असली मर्म है। अपनी तथ्यविहीन रिपोर्टों के जरिये भारत को बदनाम करने की कोशिश में लगे उन अंतरराष्ट्रीय मीडिया एवं अन्य संस्थाओं को भी पूर्वाग्रहों का चश्मा उतारकर भारत के इस जीवंत और जटिल लोकतंत्र को समझने की ज़रूरत है।