City Potholes Become Cause Of Seasonal Sorrow Engineers Unique Suggestions
सीजनल दुख
नवभारतटाइम्स.कॉम•
जैसे सीजनल फल सब्जियां होते हैं उसी तरह सुख-दुख भी सीजनल होते हैं। बचपन से पढ़ा था भारतीय किसान के आंसू और मुस्कान मॉनसून की मेहरबानी पर होते हैं। लेकिन शहरों में रहने वाले शहराती उनसे अलग नहीं, बारिश न हो तो गर्मी बेहाल करती है, और अगर हो गई तो जलभराव रुलाते हैं। पिछले साल मैंने गलियों के गड्ढों की सुखद चर्चा की थी। आपको बताते हुए खुशी हो रही है कि मामला अब मेन रोड तक पहुंच गया है। पिछले साल आधे फुट के जो नन्हें मुन्ने गड्ढे थे, अब वे शरारती टीनेजर हो गए हैं 2-2 फुट गहरे।
वैसे तो यह एरिया एयरपोर्ट के पास है, यहां से तमाम वीवीआईपी गुजरते हैं। लेकिन यह उनका सौभाग्य और हमारा दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि वे या तो ऊपर फ्लाईओवर या फिर उससे भी ऊपर हवाई जहाज में यात्रा कर रहे होते हैं। हालांकि पिछले साल एक नीली बत्ती वाली कार इन गड्ढों के इश्क में खुद को बर्बाद कर चुकी थी। फिर दुश्मन जमाने ने रातोरात यहां रोडरोलर भिजवाकर प्रेम की गहराइयों वाली इन खाइयों को पटवा दिया। लेकिन आप जानते ही हैं कि इश्क को जालिम जमाना कहां तक रोक पाया है। छह महीने में और गहरे, और शानदार गड्ढे उभर कर आए। हालांकि, हमारे इंजीनियर साहब का नजरिया एकदम अलहदा है। उनका कहना है कि अगर मैंने इसे नगर निगम में सही जगह पहुंचा दिया तो हमारा शहर देश के टूरिज्म मैप पर छा जाएगा। पहला सुझाव है कि इन गड्ढों में एडवेंचर स्पोर्ट्स हों, दूसरा सुझाव है कि हर साल लगने वाले महोत्सव में इसे मौत के कुएं के तौर पर हाइलाइट किया जाए, तीसरा सुझाव इन गड्ढों वाली सड़क को सांस्कृतिक धरोहर घोषित करते हुए यूनेस्को में भेजने का है। चौथा सुझाव ज्यादा मौलिक है। इंजीनियर साहब पानी से भरे गड्ढों को प्रवासी पक्षी फ्लेमिंगो के आशियाने के तौर पर विकसित करना चाहते हैं। उसके लिए वे एक सीजन यहां फ्लेमिंगो जैसा गुलाबी कुर्ता-पायजामा पहनकर एक टांग पर खड़े होने को तैयार हैं ताकि पक्षी खिंचे चले आएं।