सबसे बड़े मतदाता वर्ग को ध्यान में रखकर पार्टियों को बनानी होगी रणनीति
जंतर-मंतर से शुरू हुए महज़ 35 दिनों के आंदोलन ने भारत के राजनीतिक कैनवस पर Gen Z की वो तस्वीर उकेरी है, जिसकी ताकत का एहसास धर्मेंद्र प्रधान के मंत्री पद से इस्तीफे के रूप में सामने आया। अगले साल उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात समेत सात राज्यों में चुनाव होंगे। वहीं, अगले लोकसभा चुनाव में तीन साल से कुछ कम समय बचा है। ऐसे में सभी पार्टियों को अपनी रणनीति में भारी बदलाव करना होगा क्योंकि इन चुनावों में किंगमेकर Gen Z ही होंगे।
सबसे बड़ी हिस्सेदारी । Gen Z की चुनावी शक्ति को समझने के लिए यूनाइटेड नेशंस वर्ल्ड पॉपुलेशन प्रॉस्पेक्टस के 2024 के आंकड़ों पर नज़र डालिए। भारत की कुल आबादी में लगभग 28% के साथ इस वक़्त सबसे बड़ी हिस्सेदारी Gen Z की है। 1981 से 1996 के बीच पैदा हुए मिलेनियल्स, 25% के साथ दूसरे नंबर पर हैं। 2013 के बाद पैदा हुए Gen Alpha तीसरे नंबर पर हैं, 19% के साथ, लेकिन अगले लोकसभा चुनाव में ये 18 साल से कम के होंगे। 1965 और 1980 के बीच पैदा हुए Gen X चौथे नंबर पर हैं 17% के साथ, जबकि बाकी 11% 1965 से पहले पैदा हुई पीढ़ियों का है।सोशल मीडिया की भाषा बदली । नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में BJP पिछले तीन आम चुनाव युवाओं के समर्थन और सोशल मीडिया के कारगर इस्तेमाल से जीतती आ रही है, लेकिन 2014 में BJP को केंद्र की सत्ता में लाने में मिलेनियल्स और GenX की बड़ी भूमिका थी। सोशल मीडिया तब WhatsApp, Facebook, Twitter तक ही सीमित था। इंस्टाग्राम प्रभावी नहीं था और 'रील्स कल्चर' और 'मीम्स' के युग की तो शुरुआत ही नहीं हुई थी। ब्रैंड अडवाइजर संतोष देसाई के मुताबिक, Gen Z के प्रभावी होने के साथ सोशल मीडिया की भाषा में बदलाव आया है, जिससे यह सरकार अनजान थी।
निडर है यह पीढ़ी । BJP और दूसरे राजनीतिक दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है इस पीढ़ी की सोच को समझकर 2029 चुनाव के लिए रणनति बनाने की। Gen Z निडर हैं, अपने मुद्दों पर दृढ़ हैं और उनकी प्रतिबद्धता ढीठता की सीमा तक जा सकती है। इसका उदाहरण हैं मुंबई की रिया अहीर, जिन्होंने आंदोलनकारी साथियों से भरी बस को अकेले रोककर पुलिस को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। या जंतर-मंतर की वह लड़की, जो लाठीचार्ज के दौरान अपने पुरुष साथियों के लिए ढाल बन कर खड़ी हो गई। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर Gen Z अटल हैं। उन्हें इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता कि मुद्दों को लेकर उनके लगाए गए नारों पर मर्यादा की सीमा लांघने का आरोप लग रहा है। किसी भी दल के लिए Gen Z को खुद से दूर करना कितना घातक हो सकता है, वह इस आंदोलन से साफ है। इसीलिए हर पार्टी को इस वर्ग को ध्यान में रखकर रणनीति बनानी होगी।
BJP को हुआ आभास? BJP के शीर्ष नेतृत्व को आभास हो गया है कि पार्टी को अपनी रणनीति में Gen Z के अनुरूप बदलाव लाने की ज़रूरत है। इसकी बानगी है 24 घंटों से भी कम अंतराल में प्रधानमंत्री मोदी के दो विडियो का इंस्टाग्राम पर आना। मोदी ने इन विडियो में Gen Z को 'फ्रेंड्स' कह कर संबोधित किया। यही नहीं, एक बैठक में उन्होंने अपने मंत्रियों को इंस्टाग्राम पर सक्रिय होने और उन्हें युवाओं से जुड़े मुद्दों पर रील्स डालने की सलाह भी दी। लेकिन BJP के लिए हिंदुत्व को Gen Z के बीच भुनाना आसान नहीं होगा, जंतर-मंतर के प्रदर्शन से इसका संकेत मिला है। यहां जुटे छात्रों के लिए शिक्षा, रोज़गार जैसे मुद्दे अहम थे, न कि धर्म, जाति, अगड़ा-पिछड़ा जैसे खांचे।
रोजगार पर बेचैनी । Gen Z डिजिटल युग में पैदा हुए हैं, जहां स्मार्टफोन के बिना जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। ब्लूमबर्ग के मुताबिक, भारत के 93% Gen Z के पास स्मार्टफोन है। यह आंकड़ा पूरे विश्व के Gen Z स्मार्टफोन ओनर्स से सिर्फ 2% कम है। स्मार्टफोन से न केवल दूरियां मिटी हैं, बल्कि संवाद, सूचना और मनोरंजन के नए आयाम खुल गए हैं, जागरूकता बढ़ी है। इस पृष्ठभूमि में Gen Z की शिक्षा और रोज़गार को लेकर बढ़ती बेचैनी से निपटना सरकार की सबसे बड़ी चुनौती है। हालांकि, अगले लोकसभा चुनाव में अभी लगभग तीन साल का समय है। इसलिए सत्ताधारी पार्टी के पास इस पीढ़ी के मुताबिक रणनीति बनाने का वक्त है।