ज्ञान अगर ढका हो तो गुरु हटाते हैं अज्ञानता से परदा

Contributed byसंत रमेश भाई ओझा|नवभारतटाइम्स.कॉम
guru purnima gurus remove the veil of ignorance and spread the light of knowledge
गुरु पूर्णिमा को हम व्यासपूर्णिमा भी कहते हैं। गुरु, पूर्णिमा के चंद्र की भांति पूर्ण हैं, इसलिए पूर्णिमा को हम गुरुपूर्णिमा कहते हैं। ज्ञान को अगर हम सूर्यधर्मी कहेंगे तो गुरु को चंद्रधर्मी कहना उचित होगा। ज्ञान को पचाने का मतलब, सूर्य के प्रखर ताप को झेलना है। गुरुपूर्णिमा की रात को आकाश की ओर देखें तो चंद्रमा काले बादलों के बीच घिरा हुआ दिखाई देता है। गुरु को अगर हम चंद्र की उपमा दें तो उससे घिरे बादल शिष्य समान हैं। बादल अप्रगट जल का प्रतीक है। वर्षा रूपी जल लेकर खड़े बादल अभी तक बरसे नहीं हैं। क्षण मात्र में बादल बरसेंगे लेकिन पहले अज्ञान दूर करने के लिए शिष्य रूपी काले बादल गुरुरूप चंद्रमा के आस-पास गुरु पूर्णिमा को देखने को मिलेंगे।

ज्ञान केवल ढका हुआ है, सद्गुरु अज्ञान का पर्दा हटाते हैं। गुरु चंद्रमा बनकर चांदनी बरसाते हैं। गुरु, ज्ञान प्रकाश पुंज होते हुए भी चंद्रमा की तरह शीतल हैं, इसलिए गुरुपूर्णिमा के दिन हम गुरु वंदना करते हैं। एक संकेत यह है कि अपनी कलाओं को विकसित करते हुए पूर्णिमा के चंद्र की भांति गुरु भी पूर्ण हो चुके हैं। गुरु बिना भवसागर पार करना संभव नहीं। इसीलिए, जीवन में गुरु जरूरी हैं।
सवाल है कि क्या गुरु का सदेह होना जरूरी है? रामकृष्ण परमहंस, महर्षि अरविंद, रमण महर्षि या स्वामी विवेकानंद सदेह तो नहीं परंतु हमें गुरु भाव होता है। एकलव्य के पास द्रोण गुरु सदेह नहीं थे। फिर भी एकलव्य को भीतर से प्रेरणा देते रहे। व्यक्ति का नहीं, उसकी गुरुता का महत्व होता है। इसलिए, शक्ति की पूजा होती है। व्यक्ति तो माध्यम है। गुरुपूर्णिमा के दिन गुरु को तिलक कर वंदन करते हैं।

(प्रस्तुति: सुभाष चंद्र शर्मा)

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