Pahadi Holi A Unique Blend Of Melodies And Folk Dances Celebrated For A Month
रागों की धुन और लोक नृत्यों की जुगलबंदी में बसी 'पहाड़ी होली'
नवभारत टाइम्स•
भारत में होली के कई रंग हैं। उत्तराखंड की पहाड़ी होली खास है। यह महीने भर से ज्यादा चलती है। इसमें गायन और वादन का महत्व है। पहाड़ी होली के चार रूप हैं। बैठकी होली, पुरुषों की खड़ी होली, महिला होली और स्वांग। कुमाऊं क्षेत्र में ये चारों रूप प्रचलित हैं। यह उत्सव संगीत और नृत्य का अनूठा संगम है।
नई दिल्ली: भारत में होली के कई रंग देखने को मिलते हैं, लेकिन ब्रज और पहाड़ी होली सबसे खास हैं। उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल क्षेत्रों में मनाई जाने वाली पहाड़ी होली की खासियत यह है कि यह सिर्फ कुछ दिनों की नहीं, बल्कि एक महीने से भी ज्यादा समय तक चलती है। इस होली में गायन और वादन का खास महत्व है, जो इसे अनोखा बनाता है। पहाड़ी होली के विशेषज्ञ संदीप गोरखा बताते हैं कि पहाड़ी होली के चार मुख्य रूप हैं।
पहाड़ी होली की शुरुआत पूस महीने के पहले रविवार से हो जाती है। इसका पहला रूप है 'बैठकी होली'। इसमें शास्त्रीय रागों के आधार पर गीत गाए जाते हैं। यह होली का एक गंभीर और पारंपरिक तरीका है।दूसरा रूप है 'पुरुषों की खड़ी होली'। यह रंगभरनी एकादशी के आते-आते अपने पूरे शबाब पर होती है। इस दौरान पुरुष मिलकर जोश-खरोश से होली मनाते हैं।
पहाड़ी होली का तीसरा रूप है 'महिला होली'। यह भी अक्सर बैठकर ही खेली जाती है। महिलाएं पारंपरिक गीतों और उल्लास के साथ इस होली का आनंद लेती हैं।
होली का चौथा और आखिरी रूप है 'स्वांग'। यह हास्य-विनोद के लिए किया जाता है। लोग तरह-तरह के वेश धारण कर मज़ाक करते हैं। हालांकि, संदीप गोरखा के अनुसार, आजकल यह रूप कम ही देखने को मिलता है। उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में ये चारों ही तरह की पहाड़ी होली खूब मनाई जाती है। यह महीने भर चलने वाली यह अनूठी परंपरा लोगों को एक-दूसरे के करीब लाती है और खुशियां बांटने का मौका देती है। पहाड़ी होली का यह लंबा उत्सव लोगों को साल भर होली के रंग में रंगे रहने का एहसास कराता है।