Shivmurti Powerful Portrayal Of Rural Lifes Truth And Womens Resistance
जीवन का सच दिखाते हैं शिवमूर्ति
Contributed by: चंद्रावती|नवभारत टाइम्स•
कथाकार शिवमूर्ति का साहित्य ग्रामीण जीवन की सच्चाई दिखाता है। उनकी कहानियों में महिलाएं सामाजिक रूढ़ियों से लड़ती हैं। उपन्यास 'अगम बहै दरियाव' ग्रामीण भारत की असमानताओं को दर्शाता है। 'त्रिशूल' सांप्रदायिकता और कट्टरता पर आधारित है। शिवमूर्ति उपेक्षित वर्गों की बात करते हैं और इंसानियत को महत्व देते हैं। उनका साहित्य समाज की सच्चाई बताता है।
समकालीन हिंदी साहित्य में शिवमूर्ति का नाम बड़े अदब से लिया जाता है। मुंशी प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणु, मैक्सिम गोर्की, जैक लंदन और अरुंधति रॉय जैसे महान लेखकों की राह पर चलते हुए, शिवमूर्ति ने अपनी कहानियों में हमेशा समाज के उन लोगों को आवाज़ दी है जो सत्ता, व्यवस्था और परंपरा की दौड़ में पीछे छूट गए हैं। उनकी कहानियाँ सिर्फ़ कहानियाँ नहीं, बल्कि हकीकत का आईना हैं, जो गाँव की असलियत को बिना किसी लाग-लपेट के सामने रखती हैं। शहर में रहकर भी उनका दिल गाँव से जुड़ा रहा, और वे अपने देखे-सुने को ही अपनी लेखनी का आधार बनाते हैं।
शिवमूर्ति का साहित्य गाँव की ज़मीनी हकीकत को बयां करता है। वे गाँव का झूठा रोमांस नहीं दिखाते, बल्कि वहाँ के संघर्ष, द्वंद्व, विडंबनाओं और अंतर्विरोधों को उजागर करते हैं। उनकी रचनाओं में खासकर स्त्रियों का एक मज़बूत और प्रतिरोधी रूप देखने को मिलता है। गाँव की वे महिलाएँ जो पढ़ी-लिखी नहीं हैं और रोज़मर्रा के संघर्षों से जूझती हैं, शिवमूर्ति की कहानियों में अपने सम्मान और पहचान के लिए सामाजिक बंधनों और पितृसत्तात्मक व्यवस्था से लड़ती नज़र आती हैं। ‘कसाईबाड़ा’, ‘तिरियाचरित्तर’, ‘अकालदंड’, ‘सिरी उपमा जोग’ और ‘कुच्ची का कानून’ जैसी उनकी कहानियाँ इस बात का जीता-जागता सबूत हैं। ‘कुच्ची का कानून’ में एक अनपढ़ विधवा महिला अपनी तीखी दलीलों से पंचायत का सामना करती है और पुरानी सामाजिक मर्यादाओं पर सवाल उठाती है।हाल ही में प्रकाशित उनका उपन्यास ‘अगम बहै दरियाव’ ग्रामीण भारत की गहरी असमानताओं और मानवीय त्रासदी को दर्शाता है। यह उपन्यास गरीबी, भूख, बेरोज़गारी, शोषण और सत्ता के दबाव के बीच पिसते लोगों के सच्चे जीवन को सामने लाता है। वहीं, उनका उपन्यास ‘त्रिशूल’ राजनीति और सांप्रदायिकता से पैदा हुई मॉब लिंचिंग, दंगों और कट्टरता जैसी गंभीर समस्याओं पर केंद्रित है। बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय की पृष्ठभूमि पर आधारित होने के बावजूद, यह उपन्यास आज के समय में और भी ज़्यादा प्रासंगिक और गंभीर लगता है।
शिवमूर्ति अपने लेखन के ज़रिए समाज के छोटे-छोटे, उपेक्षित मुद्दों को सामने लाते हैं। उनका मानना है कि गाँवों के विकास के बिना देश का विकास अधूरा है। वे समाज के एक ऐसे तबके की बात करते हैं जो समाज की हर हलचल पर पैनी नज़र रखता है। एक सामाजिक कार्यकर्ता के ज़रिए वे कहते हैं कि जिंदा रहने और लड़ने के लिए पढ़ाई बहुत ज़रूरी है।
शिवमूर्ति अन्य साहित्यकारों से इसलिए भी अलग हैं क्योंकि वे समाज के अभावग्रस्त और उपेक्षित वर्गों की आवाज़ बनते हैं। उनका विरोध किसी व्यक्ति से नहीं, बल्कि क्रूर और असमान व्यवस्था से है। वे इंसानियत को सबसे ऊपर रखते हैं। उनका साहित्य समाज की कड़वी सच्चाई को दर्शाता है। वे पाठकों को सोचने पर मजबूर करते हैं और उन्हें ही अपने निष्कर्ष निकालने का मौका देते हैं। ऐसे लेखकों को पढ़ना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि उनका साहित्य हमें सोचने पर विवश करता है और जीवन की वास्तविकताओं को समझने में मदद करता है। वे हमें सिखाते हैं कि समाज में क्या सही है और क्या गलत।