आंदोलन की ज़रूरत

नवभारतटाइम्स.कॉम•
mohan bhagwats statement on protests respect for law is necessary even when emotions are high
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने विजयादशमी पर अपने संबोधन में भारत की विविधता, एकता, संविधान, संघ के कार्यों से लेकर तकनीक तक पर बात की। उनके संबोधन में आंदोलनों का मुद्दा प्रमुखता से उठा। उन्होंने संदेश दिया कि किसी भी वजह से आपसी मनमुटाव, नाराजगी या गुस्सा नहीं पैदा होना चाहिए। जब भावनाएं उफान मार रही हों, तब भी कानून का सम्मान जरूरी है।

असंतोष भर नहीं । भागवत ने आंदोलन ों को लेकर आगाह किया कि उनका इस्तेमाल व्यवस्था और विचारों के प्रति नफरत फैलाने के लिए नहीं होना चाहिए। हालांकि लोकतंत्र में आंदोलन केवल असंतोष जताने का माध्यम नहीं, सरकार और संस्थाओं को जवाबदेह बनाने का जरिया भी हैं। महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार या प्रशासनिक फैसलों के खिलाफ उठने वाली आवाज को इसलिए गलत नहीं माना जा सकता क्योंकि उससे सत्ता असहज होती है। शांतिपूर्ण विरोध लोकतांत्रिक अधिकार है। हां, हिंसा और दूसरों के अधिकारों का उल्लंघन किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
दूसरों से तुलना । मोहन भागवत ने फ्रांस, अल्बानिया, नेपाल और बांग्लादेश में हुए आंदोलनों का उल्लेख करते हुए भारत को अस्थिर करने की कोशिशों के प्रति सतर्क रहने की बात कही है। फ्रांस में सरकारी स्कूलों की बदहाली के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हुआ था और अब इसमें महंगाई का विरोध व बेहतर जीवनस्तर की मांग भी शामिल हो चुके हैं। इसी तरह अल्बानिया में सरकार के खिलाफ गुस्सा है और जनता व्यापक सुधारों की मांग कर रही है। जहां भी अभी आंदोलन हो रहे हैं या हाल-फिलहाल में हुए हैं, कुछ मुद्दे कमोबेश हर जगह उठे।

भारतीय युवा समझदार । भारत में भी स्टूडेंट्स पेपर लीक जैसे मसले पर आक्रोशित हुए थे और बाद में चुनाव आयोग से जुड़ा सवाल शामिल हुआ। हालांकि मुद्दे एक होने से परिस्थितियों में समानता नहीं आ जाती। यूरोप हो या पड़ोसी देश, वहां के मुकाबले भारत के युवाओं ने ज्यादा सूझबूझ का परिचय दिया है। जंतर-मंतर पर पहले प्रोटेस्ट के दौरान भी नई पीढ़ी ने कई आशंकाओं को गलत साबित किया। यह परिपक्वता नेपाल और बांग्लादेश में देखने को नहीं मिली थी। यही वजह है कि वहां बदलाव हुआ पर स्थिरता नहीं आई।

सीख और समझ । लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन की तय प्रक्रिया है। भागवत का संदेश भी है कि केवल रिजीम चेंज से स्थितियां नहीं बदलतीं, समाज के स्वभाव और चरित्र में बदलाव जरूरी है। आंदोलन इस दिशा में बहुत कुछ सिखा सकते हैं। पहले हुए आंदोलन उदाहरण हैं, जिन्होंने कुछ न कुछ जोड़ा ही है।

रेकमेंडेड खबरें