तीखेलाल: का हीरालाल, समाज बड़ा न्यायप्रिय हो गया है आजकल। अपराध की खबर आते ही अदालत लग जाती है। फैसला भी हो जाता है, सजा भी सुना दी जाती है।हीरालाल: अरे, ई कौन-सा नया संविधान आ गया?
तीखेलाल: टाइगर श्रॉफ पर गोली चलाने की साजिश के आरोप में लॉरेंस बिश्नोई का नाम आए तो कुछ लोगों के लिए वह इतना बड़ा नाम हो जाता है कि पुलिस अफसर तक उसे ‘साहब’ कहकर संबोधित करते हैं। उधर, शिवा कांड में आरोपित श्रद्धा का नाम आया नहीं कि सोशल मीडिया पर फैसला सुना दिया गया-हत्यारिन, चरित्र दोष से जुड़ी उपमाएं और न जाने क्या-क्या।
हीरालाल: लेकिन अपराध गंभीर हो तो गुस्सा आना स्वाभाविक है।
तीखेलाल: बिल्कुल! मगर सवाल है कि गुस्सा अपराध पर है या अपराध करने वाले के जेंडर पर? पुरुष आरोपित हो तो उसके लिए गैंगस्टर, डॉन, बाहुबली जैसे तमगे निकल आते हैं। महिला आरोपित हो तो चरित्र प्रमाणपत्र जारी होने लगता है।
हीरालाल: बात तो सही है। पर ई फर्क सिर्फ औरत-मर्द का थोड़े ही है। जाति, धर्म, पैसा और रसूख देखकर भी तो लोगों की राय बदल जाती है।
तीखेलाल: यही तो! दबंग का अपराध उसकी बहादुरी बन जाता है और कमजोर का अपराध उसकी औकात। अपने धर्म का आरोपित हो तो साजिश का शिकार, दूसरे धर्म का हो तो पूरे समुदाय का प्रतिनिधि! अमीर के लिए वकीलों की फौज और गरीब के लिए थाने के चक्कर। समाज पहले पहचान पूछता है, फिर अपराध देखता है।
हीरालाल: लेकिन औरत के मामले में यह दोहरा रवैया कुछ ज्यादा ही दिखाई देता है।
तीखेलाल: क्योंकि हमने औरत के लिए भूमिकाएं तय कर रखी हैं-वह मां हो, बहन हो, पत्नी हो, देवी हो। बस इंसान न हो! कंधे से कंधा मिलाकर चले, तो तालियां बजती हैं। अंतरिक्ष में जाए तो देश का गौरव, कारोबार में आगे बढ़े तो महिला सशक्तीकरण। लेकिन अपराध में नाम आ जाए तो समाज को अचानक याद आ जाता है कि औरत होकर ऐसा कैसे कर सकती है, यह तो सिर्फ पुरुषों का ही अधिकार है।
हीरालाल: यानी बराबरी का अधिकार है तो जिम्मेदारी भी बराबर और कानून के सामने जवाबदेही भी बराबर।
तीखेलाल: बिल्कुल। न पुरुष को उसके रुतबे के कारण छूट मिले, न महिला को उसके जेंडर के कारण अतिरिक्त गाली।
हीरालाल: तो समाज को करना क्या चाहिए?
तीखेलाल: अपराध से नफरत करे, अपराधी को कानून के हवाले करे और फैसला सबूतों पर छोड़े।
हीरालाल: वाह! मतलब न्याय की आंखों पर पट्टी अदालत में ही नहीं, समाज की आंखों पर भी होनी चाहिए-ताकि चेहरा नहीं, अपराध दिखाई दे।
तीखेलाल: और तराजू ऐसा हो कि उसमें रसूखदार का वजन अपने आप कम न हो जाए और कमजोर की गलती अपने आप भारी न हो जाए!