DUSU नतीजों से Gen Z ने क्या संदेश दिया

नवभारतटाइम्स.कॉम
gen zs message from dusu results are youth just raising issues or also changing political preferences
पूनम पाण्डे

पेपर लीक के खिलाफ युवाओं ने जंतर-मंतर पर आंदोलन किया, सरकार से सवाल पूछे और फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्रसंघ चुनाव (DUSU) में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का छात्र संगठन, BJP समर्थित ABVP चार में से तीन पदों पर जीत गया। इसे क्या माना जा सकता है? BJP के मुताबिक, इन नतीजों ने दिखा दिया कि युवाओं का भरोसा किसके साथ है और Gen Z को बरगलाया नहीं जा सकता। पार्टी के लिए यह कांग्रेस पर तंज कसने का भी मौका है, खासकर जब राहुल गांधी अलग-अलग जगहों पर 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम कर रहे हैं। लेकिन, क्या DUSU का नतीजा वाकई में Gen Z की राजनीतिक पसंद का प्रमाण है?
शायद यह पूरी तस्वीर नहीं, क्योंकि DU की छात्र राजनीति में राष्ट्रीय मुद्दों के साथ जातीय और क्षेत्रीय समीकरण, उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ और संगठन की जमीनी ताकत भी हमेशा अहम रहे हैं। इन नतीजों को सिर्फ BJP बनाम कांग्रेस के तौर पर देखना भी ठीक नहीं। यहां जातीय समीकरणों की अपनी भूमिका रही है। अध्यक्ष पद पर जाट और गुर्जर समुदाय के उम्मीदवारों का लंबे समय से दबदबा रहा है। इसके साथ ही हॉस्टल सहित छात्रों की बुनियादी जरूरतें अहम मुद्दा रही हैं। चुनाव से पहले सत्य निकेतन के हादसे के दौरान भी छात्र नेताओं और छात्र संगठनो को स्टूडेंट्स तक अपनी बात पहुंचाने का मौका मिला।

अब भी रह गई दूरी

पेपर लीक और परीक्षाओं में गड़बड़ियों के खिलाफ जंतर-मंतर पर युवाओं का आंदोलन इस बात का संकेत था कि परीक्षा व रोजगार का सवाल नई पीढ़ी के लिए कितना बड़ा मुद्दा है। राहुल गांधी ने भी इन सवालों को राजनीतिक बहस का हिस्सा बनाने की कोशिश की। फिर DU में कांग्रेस के छात्र संगठन NSUI को इसका चुनावी फायदा क्यों नहीं मिला, यह कांग्रेस के लिए बड़ा सवाल है। किसी मुद्दे पर सरकार से नाराज होना और उस नाराजगी का वोट कांग्रेस को देना, ये दोनों अलग-अलग बातें हैं। इसलिए DU का नतीजा राहुल गांधी के कार्यक्रम की सफलता या असफलता से ज्यादा इसकी तरफ इशारा करता है कि युवाओं के मुद्दे उठाने और उनकी राजनीतिक पसंद बनने के बीच शायद अभी दूरी है।

एक खांचे में बंद करना भूल

दिल्ली यूनिवर्सिटी में देश के अलग-अलग हिस्सों से युवा पढ़ने आते हैं। इसलिए इन नतीजों को BJP देश भर के युवाओं की पसंद और उनके फैसले के तौर पर दिखा रही है। खासकर अगले साल होने वाले यूपी, उत्तराखंड और पंजाब चुनाव से पहले ये नतीजे नैरेटिव बनाने के लिए अहम हैं। वैसे तो इन तीनों राज्यों की राजनीति अलग है, लेकिन युवाओं के लिए रोजगार, भर्ती परीक्षा और शिक्षा के सवाल सभी जगह अहम हैं।

Gen Z BJP के साथ है या कांग्रेस के खिलाफ, यह नैरेटिव के लिए तो सही है लेकिन इसका कोई सीधा जवाब नहीं है। सवाल यह है कि युवा जिन मुद्दों पर सवाल उठा रहे हैं, क्या राजनीतिक दल उन्हें सुनने के साथ उनका भरोसा भी जीत पा रहे हैं? DU में ABVP की जीत, NSUI की हार और निर्दलीय की सफलता एक ही बात कहती है - युवाओं को किसी एक राजनीतिक खांचे में बंद करके पढ़ना भूल हो सकती है।

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