बार-बार सम्राट की परीक्षा लेता बिहार

नवभारतटाइम्स.कॉम
questions arising on bihars education system due to repeated incidents at iit bombay
IIT बॉम्बे में जो कुछ हुआ और हो रहा है, उस घटना से अलग एक बड़ा सवाल है। इतने बड़े संस्थान में नियमों और शिकायतों के लिए बनी आंतरिक व्यवस्था का क्या हुआ? इंस्टीट्यूट में अकादमिक अनुशासन समिति, SC/ST सेल, शिकायत निवारण व्यवस्था और सेनेट है। फिर भी कुछ ही घंटों में मामला पुलिस, प्रदर्शन और सोशल मीडिया के बीच पहुंच गया। यहीं से हमें अपने संस्थानों के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए।

भरोसे से मजबूती । भारत ने दशकों में कुछ ही ऐसे उच्च शिक्षा संस्थान बनाए हैं, जिनकी दुनिया में पहचान है। इनकी असली ताकत उनकी इमारत या बजट नहीं, संस्थागत व्यवस्था और स्वायत्तता है। शिक्षक नियम लागू करें, छात्र उन्हें स्वीकार करें और हर विवाद का समाधान तय प्रक्रिया से हो- इसी भरोसे पर कोई संस्थान मजबूत बनता है।
गहरा असर । अगर शिक्षक को व्यक्तिगत कानूनी कार्रवाई का डर रहेगा, तो वह अगली बार नियम लागू करने से बच सकता है। वह छोटी गलती को नजरअंदाज कर सकता है या मूल्यांकन में जरूरत से ज्यादा नरमी बरत सकता है। धीरे-धीरे इसका असर डिग्री की गुणवत्ता पर पड़ेगा। नुकसान आखिरकार उन्हीं छात्रों का होगा, जिन्हें अपनी योग्यता के दम पर आगे बढ़ना है।

जवाब चाहिए । लेकिन, स्वायत्तता का मतलब यह भी नहीं कि संस्थान सवालों से ऊपर हो जाएं। IIT बॉम्बे में एक साल के भीतर चार छात्रों की मौत अपने आप में संस्थागत विफलता है। एक छात्र अपने जिले में टॉप करता है, लेकिन आईआईटी में जब 300 की बैच में वह 287वें स्थान पर पहुंचता है, तो उसके सामने होता है जबरदस्त मानसिक और शैक्षणिक दबाव। लेकिन, हमारी व्यवस्था ऐसे छात्रों को संभालने और उन्हें मुश्किल दौर से निकालने के लिए पर्याप्त सहारा नहीं देती। ज्यादातर प्रतिष्ठित कैंपसों में छात्रों की संख्या के मुकाबले काउंसलिंग की सुविधा बहुत कम है।

आलोचना जरूरी । आज अगर हर विवाद में पुलिस और सड़क की भूमिका बढ़ रही है, तो इसके पीछे संस्थानों के भीतर की कमजोर व्यवस्था भी एक कारण है। जब शिकायतों का समयबद्ध और पारदर्शी समाधान नहीं होता, तो लोग दूसरे रास्ते तलाशते हैं। इसलिए संस्थानों की रक्षा का रास्ता आलोचना से बचना नहीं, अपनी आंतरिक व्यवस्था को मजबूत करना है।

ये कदम उठाएं । अनुशासन के नियम सार्वजनिक हों। शिकायतों की तय समय सीमा हो। SC/ST सेल को भरोसेमंद और प्रभावी बनाया जाए। छात्रों की मौत जैसे गंभीर मामलों की स्वतंत्र जांच हो और उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। काउंसलिंग की व्यवस्था पर्याप्त हो। अगर किसी अधिकारी को हटाने की जरूरत है, तो फैसला संस्थागत प्रक्रिया और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर होना चाहिए।

(IITian और स्टार्टअप फाउंडर, लेखक के निजी विचार हैं)

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