असली सुरक्षा कब

नवभारतटाइम्स.कॉम
when is real security girls on the road at midnight bihar incident raises questions amidst claims and reality
देश में किसी भी सरकार को अपने शासन की कानून-व्यवस्था का बखान करना हो, तो एक उदाहरण कमोबेश हर तरफ से आता है, कि लड़कियां आधी रात को भी सड़क पर निकल सकती हैं। सुरक्षा का यह ऐसा पैमाना है, जिससे मान लिया जाता है कि लॉ एंड ऑर्डर बिल्कुल दुरुस्त है। यह उदाहरण ही अपने आप में बताने के लिए पर्याप्त है कि महिला सुरक्षा देश में कितना बड़ा मुद्दा है। लेकिन, दावों और हकीकत के बीच अब भी एक बड़ा अंतर है और बिहार के जमुई की घटना यही जाहिर करती है।

विपक्ष आक्रामक । सोशल मीडिया पर वायरल हुए दो विडियो से यह मामला सामने आया। नाबालिग लड़की साथ पढ़ने वाले एक लड़के के साथ कोचिंग से लौट रही थी, जब कुछ लोगों ने उन्हें रोका और बदतमीजी की। घटना के तूल पकड़ने पर पुलिस ने तेजी दिखाई और कुछ आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। घटना राजनीतिक रंग ले चुकी है और राज्य सरकार को विपक्ष घेरने में लगा है। सम्राट चौधरी सरकार ने अपराध नियंत्रण को मुख्य मुद्दा बनाया है, तो उन्हें विपक्ष के तीखे सवालों का सामना करना पड़ेगा।
सुरक्षा का भरोसा । लेकिन, राजनीति से ज्यादा इससे जुड़े सामाजिक पहलुओं को समझने की जरूरत है। घटना के तुरंत बाद पीड़ित परिवार ने पुलिस में शिकायत नहीं की थी। आमतौर पर इसके पीछे की वजहें एक जैसी होती हैं - आरोपियों का डर, सामाजिक दबाव और बदनामी की आशंका। इससे न्याय की आवाज कई बार दब जाती है। ऐसे में पुलिस-प्रशासन और सरकार की जिम्मेदारी है कि वे पीड़ितों को सुरक्षा का भरोसा दिलाएं।

चिंताजनक आंकड़े । आंकड़ों के मुताबिक, साल 2024 में देशभर में महिलाओं के खिलाफ अपराध के लगभग 4.41 लाख केस दर्ज किए गए थे। इसमें करीब 84 हजार केस छेड़खानी के थे, जबकि 29 हजार से ज्यादा मामले रेप के। सबसे खतरनाक बात, महिलाएं घर तक में सुरक्षित नहीं हैं। ये आंकड़े समाज और व्यवस्था के लिए बहुत बड़ा सवाल छोड़ते हैं।

करियर से समझौता । इस तरह की वारदातों की वजह से ही तमाम लड़कियों को पढ़ाई और करियर के साथ समझौता करना पड़ता है। कई बार सुरक्षा के नाम पर परिवार की तरफ से उन पर बंदिशें लाद दी जाती हैं। उन्हें देर तक बाहर न रहने, अकेले न जाने और अपनी सुरक्षा के लिए लगातार सावधान रहने की सलाह दी जाती है, लेकिन यह समाधान नहीं है। कानून तो अपना काम करेगा ही, समाज को भी सोचना होगा कि कैसे लड़कियां सड़कों पर सुरक्षित रह सकती हैं।

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