केन्याई शरणार्थी शिविर में फुटबॉल कोच जने इस्साक अधन, युवाओं को अपराध से दूर रखने का अभियान
केन्याई शरणार्थी शिविर में फुटबॉल कोच जने इस्साक अधन, युवाओं को अपराध से दूर रखने का अभियान
NewsPoint•
नई दिल्ली, 21 जुलाई (आईएएनएस)। केन्या के दादाब रिफ्यूजी कॉम्प्लेक्स में, 41 वर्षीय सोमाली शरणार्थी और 12 बच्चों की मां जने इस्साक अधन फुटबॉल को सामाजिक बदलाव के हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं। वह सैकड़ों युवा शरणार्थियों को अपराध, नशे और निराशा से दूर रखकर एक बेहतर भविष्य की राह दिखा रही हैं। अधन, जो खुद दादाब कॉम्प्लेक्स के डगाहाले रिफ्यूजी कैंप में रहती हैं, ने पांच साल पहले महसूस किया कि कैंप के युवाओं के पास कोई सकारात्मक दिशा नहीं है। बेरोजगारी, सीमित अवसर और भविष्य की अनिश्चितता के कारण वे नशे की लत, आपराधिक गिरोहों या यूरोप पहुंचने की खतरनाक यात्राओं में फंस रहे थे। इसी गंभीर स्थिति ने उन्हें फुटबॉल कोच बनने के लिए प्रेरित किया, भले ही रूढ़िवादी सोच वाले समुदाय के कुछ लोगों ने महिलाओं के फुटबॉल से जुड़ने पर आपत्ति जताई और उन्हें आलोचनाओं का सामना करना पड़ा।
अधन ने इन बाधाओं को पार किया और युवाओं को एक ऐसा मंच प्रदान किया जहाँ वे अपनी ऊर्जा को सही दिशा में लगा सकें और भविष्य के लिए बेहतर निर्णय ले सकें। हर प्रशिक्षण सत्र और टूर्नामेंट के बाद, वह व्यक्तिगत रूप से खिलाड़ियों से बात करती हैं और उन्हें नशे, अपराध और गलत संगत से दूर रहने की सलाह देती हैं। 1991 में सोमालिया से पलायन कर केन्या आने वाली अधन ने शरणार्थी जीवन की कठिनाइयों को करीब से देखा है। उन्होंने बताया कि हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय फंडिंग में कटौती से हालात और मुश्किल हो गए हैं। खाद्य राशन कम हो गया है, पानी और अन्य बुनियादी सेवाओं पर असर पड़ा है, जबकि युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है। रोजगार के अवसरों की कमी ने उनकी परेशानियों को और बढ़ा दिया है।इन चुनौतियों के बावजूद, अधन हार मानने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने स्थानीय युवाओं को संगठित कर फुटबॉल टीमें बनाई हैं। हालांकि, संसाधनों की कमी के कारण उन्हें फुटबॉल, जर्सी और अन्य खेल सामग्री जुटाने में काफी संघर्ष करना पड़ता है। कई बार वह अपनी जेब से खिलाड़ियों के लिए फुटबॉल और यूनिफॉर्म खरीदती हैं ताकि आर्थिक तंगी किसी युवा के सपनों के बीच दीवार न बन सके। अधन का मानना है कि यदि दादाब में बेहतर खेल सुविधाएं विकसित की जाएं, तो कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच सकते हैं। उन्होंने दानदाताओं और मानवीय संस्थाओं से अपील की है कि वे फुटबॉल मैदान, खेल उपकरण और युवा विकास कार्यक्रमों में निवेश करें ताकि शरणार्थी युवाओं को सकारात्मक अवसर मिल सकें।
अधन की मेहनत का असर खिलाड़ियों पर साफ दिखाई देता है। वलालाह एफसी के कप्तान लिबान अब्दिकादिर बताते हैं कि अधन के नेतृत्व में टीम ने कम से कम तीन टूर्नामेंट जीते हैं। वह कहते हैं कि 12 बच्चों की जिम्मेदारी निभाने के बावजूद अधन हर शुक्रवार और शनिवार खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के लिए समय निकालती हैं। उन्होंने टीम को पहली बार गरिसा शहर तक फ्रेंडली मैच खेलने का अवसर भी दिलाया, जिससे खिलाड़ियों का आत्मविश्वास बढ़ा। टीम के खिलाड़ी मोहम्मद अहमद भी मानते हैं कि अधन केवल फुटबॉल नहीं सिखातीं, बल्कि जीवन के महत्वपूर्ण सबक भी देती हैं। वह नियमित रूप से खिलाड़ियों को नशे और अपराध से दूर रहने की सलाह देती हैं। उनके प्रयासों की वजह से कई युवा गलत रास्ते पर जाने से बच सके हैं और अब खेल के जरिए अपना भविष्य संवारने का सपना देख रहे हैं।
जने इस्साक अधन ने सीमित संसाधनों, सामाजिक विरोध और कठिन परिस्थितियों के बावजूद फुटबॉल को उम्मीद का हथियार बनाया है। वह एक ऐसी प्रेरणा हैं जो दिखाती हैं कि कैसे खेल के माध्यम से जीवन को बदला जा सकता है। अधन का यह अभियान सिर्फ फुटबॉल खेलने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह युवाओं को एक नई पहचान, आत्मविश्वास और एक सुरक्षित भविष्य की ओर ले जाने का एक सशक्त माध्यम है।
दादाब रिफ्यूजी कॉम्प्लेक्स, जो पूर्वी केन्या में स्थित है, दुनिया के सबसे बड़े शरणार्थी शिविरों में से एक है। यहां लाखों सोमाली शरणार्थी दशकों से रह रहे हैं। इन शिविरों में रहने वाले युवाओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती भविष्य की अनिश्चितता और अवसरों की कमी है। इसी माहौल में जने इस्साक अधन ने एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने देखा कि कैसे युवा निराशा और हताशा में गलत रास्तों पर जा रहे हैं। नशे की लत, अपराध और यहां तक कि जानलेवा यात्राएं उनके जीवन का हिस्सा बन रही थीं। अधन, जो खुद एक शरणार्थी हैं और इन कठिनाइयों को बहुत करीब से जानती हैं, उन्होंने महसूस किया कि कुछ करने की जरूरत है।
उन्होंने फुटबॉल को चुना। यह एक ऐसा खेल है जो युवाओं को एकजुट करता है, उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत बनाता है, और उन्हें एक लक्ष्य देता है। लेकिन एक महिला के रूप में फुटबॉल कोच बनना आसान नहीं था, खासकर एक ऐसे समुदाय में जहां महिलाओं की भूमिकाएं पारंपरिक रूप से सीमित हैं। अधन को कई लोगों की आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। कुछ लोगों ने तो उनके परिवार वालों से संपर्क कर उन्हें यह काम छोड़ने के लिए मनाने की कोशिश की। उनका मानना था कि फुटबॉल महिलाओं के लिए नहीं है। लेकिन अधन ने हार नहीं मानी। उन्होंने कहा, "मेरे पास नकारात्मक बातों पर ध्यान देने का समय नहीं है।" उनका ध्यान सिर्फ युवाओं को एक सकारात्मक दिशा देने पर था।
अधन का मानना है कि खेल युवाओं को अपनी ऊर्जा को सही जगह लगाने का मौका देता है। यह उन्हें सिखाता है कि कैसे टीम वर्क करना है, कैसे हार को स्वीकार करना है और कैसे जीत के लिए प्रयास करना है। ये सब जीवन के महत्वपूर्ण सबक हैं जो उन्हें भविष्य में बेहतर निर्णय लेने में मदद करते हैं। हर प्रशिक्षण सत्र के बाद, वह खिलाड़ियों से व्यक्तिगत रूप से बात करती हैं। वह उनसे पूछती हैं कि वे कैसा महसूस कर रहे हैं, उन्हें क्या परेशान कर रहा है। और फिर वह उन्हें नशे, अपराध और गलत संगत से दूर रहने की सलाह देती हैं। यह व्यक्तिगत ध्यान ही है जो खिलाड़ियों को अधन से जोड़ता है।
सोमालिया से 1991 में केन्या आकर शरण लेने वाली अधन ने दादाब रिफ्यूजी कॉम्प्लेक्स की स्थापना के समय से ही यहां के हालात देखे हैं। उन्होंने देखा है कि कैसे शरणार्थी जीवन की कठिनाइयां समय के साथ बढ़ती गई हैं। खासकर हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय फंडिंग में कटौती ने हालात को और खराब कर दिया है। खाद्य राशन कम हो गया है, जिसका मतलब है कि लोगों को पर्याप्त भोजन नहीं मिल रहा है। पानी और अन्य बुनियादी सेवाएं भी प्रभावित हुई हैं। ऐसे में, जब युवाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है, तो रोजगार के अवसर न के बराबर हैं। यह स्थिति युवाओं के लिए बहुत निराशाजनक है।
लेकिन इन सब मुश्किलों के बावजूद, जने इस्साक अधन ने हिम्मत नहीं हारी है। उन्होंने स्थानीय युवाओं को इकट्ठा किया और फुटबॉल टीमें बनाईं। यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन असली चुनौती संसाधनों की कमी है। उनके पास पर्याप्त फुटबॉल नहीं हैं, जर्सी पुरानी हैं, और अन्य खेल सामग्री भी बहुत कम है। कई बार तो उन्हें अपनी जेब से पैसे खर्च करके खिलाड़ियों के लिए फुटबॉल और यूनिफॉर्म खरीदनी पड़ती है। वह नहीं चाहतीं कि किसी भी युवा का सपना पैसों की कमी के कारण अधूरा रह जाए।
अधन का एक बड़ा सपना है कि दादाब में खेल की सुविधाएं बेहतर हों। उनका मानना है कि अगर यहां अच्छे फुटबॉल मैदान और उपकरण हों, तो कई ऐसे प्रतिभाशाली खिलाड़ी निकल सकते हैं जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल सकें। उन्होंने दानदाताओं और मानवीय संस्थाओं से अपील की है कि वे खेल के मैदानों, खेल उपकरणों और युवा विकास कार्यक्रमों में निवेश करें। उनका मानना है कि इससे शरणार्थी युवाओं को सकारात्मक अवसर मिलेंगे और वे अपने जीवन को बेहतर बना पाएंगे।
अधन की मेहनत का असर साफ दिख रहा है। वलालाह एफसी के कप्तान लिबान अब्दिकादिर बताते हैं कि अधन के नेतृत्व में उनकी टीम ने कम से कम तीन टूर्नामेंट जीते हैं। वह कहते हैं कि अधन 12 बच्चों की मां होने के बावजूद, हर शुक्रवार और शनिवार को खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देने के लिए समय निकालती हैं। उन्होंने टीम को पहली बार गरिसा शहर तक फ्रेंडली मैच खेलने का मौका भी दिलाया, जिससे खिलाड़ियों का आत्मविश्वास बहुत बढ़ा। यह एक ऐसा अनुभव था जिसने उन्हें दिखाया कि वे भी कुछ हासिल कर सकते हैं।
टीम के एक और खिलाड़ी, मोहम्मद अहमद, कहते हैं कि अधन सिर्फ फुटबॉल नहीं सिखातीं, बल्कि जीवन के महत्वपूर्ण सबक भी सिखाती हैं। वह नियमित रूप से खिलाड़ियों को नशे और अपराध से दूर रहने की सलाह देती हैं। उनके प्रयासों की वजह से कई युवा गलत रास्ते पर जाने से बच गए हैं। अब वे खेल के जरिए अपना भविष्य बनाने का सपना देख रहे हैं। यह जने इस्साक अधन की सबसे बड़ी जीत है। उन्होंने सीमित संसाधनों, सामाजिक विरोध और कठिन परिस्थितियों के बावजूद फुटबॉल को उम्मीद का हथियार बनाया है। वह एक ऐसी महिला हैं जो दिखाती हैं कि कैसे एक व्यक्ति भी अपने समुदाय में बड़ा बदलाव ला सकता है।