शिवसेना (यूबीटी) का भाजपा पर हमला: नीट पेपर लीक आंदोलन से सरकार की छवि को झटका, धर्मेंद्र प्रधान बने पहले शिकार
शिवसेना (यूबीटी) का भाजपा पर हमला: नीट पेपर लीक आंदोलन से सरकार की छवि को झटका, धर्मेंद्र प्रधान बने पहले शिकार
NewsPoint•
मुंबई, 27 जुलाई (आईएएनएस)। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। पार्टी का कहना है कि नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर 35 दिनों तक चले युवाओं और छात्र नेताओं के आंदोलन के दौरान भाजपा नीत एनडीए सरकार देशभर में हंसी का पात्र बन गई। पार्टी के मुखपत्र 'सामना' में छपे एक संपादकीय में कहा गया है कि नीट परीक्षा पेपर लीक के खिलाफ इस लंबे आंदोलन ने केंद्र सरकार को उसकी असलियत दिखा दी और उसकी छवि को बड़ा झटका पहुंचाया।
शिवसेना (यूबीटी) का दावा है कि इस आंदोलन ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इसका पहला राजनीतिक शिकार बना दिया। शुरुआत में सरकार इस्तीफे के पक्ष में नहीं थी। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि एनडीए की कार्यशैली में इस्तीफे शामिल नहीं हैं। लेकिन, जनता के बढ़ते गुस्से के सामने सरकार को आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेना ही पड़ा।संपादकीय ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के आधिकारिक कारण को भी खारिज कर दिया। प्रधान ने कहा था कि उन्होंने राष्ट्रीय एकता बनाए रखने और राष्ट्रविरोधी ताकतों को आंदोलन का फायदा उठाने से रोकने के लिए इस्तीफा दिया है। इस पर संपादकीय ने सवाल उठाया कि जंतर-मंतर या देशभर के प्रदर्शनों में उन्हें कौन-सी राष्ट्रविरोधी ताकतें दिखाई दीं? संपादकीय में कहा गया, "छात्र नेताओं और जलवायु कार्यकर्ताओं को राष्ट्रविरोधी बताना पूरे देश में मौजूद वास्तविक आक्रोश का अपमान है। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का राष्ट्रीय एकता से कोई संबंध नहीं है। देश तो नीट पेपर लीक के कारण जान गंवाने वाले 20 युवाओं के बलिदान से एकजुट हुआ था।"
संपादकीय में उन प्रमुख चेहरों का भी जिक्र किया गया, जिन्होंने 35 दिनों के आंदोलन को आगे बढ़ाया। इनमें अमेरिका से लौटे अभिजीत दीपके शामिल हैं, जिन्होंने पेपर लीक के खिलाफ लोगों को एकजुट करने के लिए 'कॉकरोच जनता पार्टी' बनाई। जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और छात्र नेता नेहा बोरा भी इस आंदोलन का हिस्सा थे।
पार्टी ने सरकार के रुख में विरोधाभास होने का भी आरोप लगाया। संपादकीय में कहा गया कि एक तरफ भाजपा ने सोनम वांगचुक को विदेशी एजेंट बताने की कोशिश की, वहीं दूसरी तरफ उसके मंत्री उनसे मिलकर अनशन समाप्त करने की अपील करते नजर आए। यह साफ दिखाता है कि सरकार की नीतियां कितनी विरोधाभासी हैं।
संपादकीय में कहा गया कि इस पूरे मामले का राजनीतिक असर केवल धर्मेंद्र प्रधान तक सीमित नहीं रह सकता। इसमें केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को छात्रों पर कथित लाठीचार्ज के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया गया। साथ ही, प्रधानमंत्री मोदी से इस मामले में आधिकारिक माफी की मांग की गई। यह मांग इसलिए की गई क्योंकि सरकार ने छात्रों पर लाठीचार्ज करवाया, जो कि बिल्कुल गलत था।
ठाकरे गुट ने सरकार द्वारा लाए गए नए एंटी-पेपर लीक विधेयक को भी महज एक दिखावा बताया। पार्टी का आरोप है कि यह पुराना कानून ही है, जिसमें सिर्फ सजा और जुर्माने की रकम बदलकर छात्रों और अभिभावकों को भ्रमित करने की कोशिश की गई है। यह नया कानून असल में कोई बदलाव नहीं लाता, बल्कि लोगों को गुमराह करने का एक तरीका है।
संपादकीय में दावा किया गया कि आंदोलन में शामिल युवाओं की डिजिटल समझ, तकनीकी क्षमता और स्वतःस्फूर्त संगठन ने एक महीने तक चले आंदोलन के दौरान भाजपा के डिजिटल प्रचार और आईटी सेल को प्रभावहीन बना दिया। यानी, युवाओं ने अपनी सूझबूझ और तकनीक का इस्तेमाल करके सरकार के प्रचार तंत्र को फेल कर दिया।
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) ने चेतावनी दी कि यदि सरकार छात्रों की नाराजगी और प्रशासनिक विफलताओं के मूल कारणों को दूर नहीं करती है, तो देशभर में असंतोष की यह चिंगारी और बढ़ती जाएगी। इसका मतलब है कि अगर सरकार ने अपनी गलतियों को नहीं सुधारा, तो यह गुस्सा और भड़क सकता है।
यह आंदोलन सिर्फ एक परीक्षा के पेपर लीक का मामला नहीं था, बल्कि यह सरकार की जवाबदेही और पारदर्शिता पर भी सवाल उठाता है। युवाओं ने अपनी आवाज बुलंद की और सरकार को उनकी बात सुननी पड़ी। यह दिखाता है कि जब जनता एकजुट होती है, तो सरकार को झुकना पड़ता है।
नीट परीक्षा में पेपर लीक का मामला बहुत गंभीर था। इसने कई छात्रों के भविष्य को खतरे में डाल दिया था। जिन छात्रों ने कड़ी मेहनत की थी, उन्हें निराशा हाथ लगी। इस आंदोलन ने यह भी दिखाया कि कैसे सरकारी तंत्र में खामियां हो सकती हैं और कैसे उन्हें दूर करने के लिए जनता को सड़कों पर उतरना पड़ता है।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा इस बात का संकेत है कि सरकार पर दबाव था। लेकिन, क्या यह इस्तीफा काफी है? शिवसेना (यूबीटी) का मानना है कि यह सिर्फ एक शुरुआत है। सरकार को अपनी गलतियों को स्वीकार करना चाहिए और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।
अभिजीत दीपके, सोनम वांगचुक और नेहा बोरा जैसे युवा नेताओं ने इस आंदोलन को नई दिशा दी। उन्होंने दिखाया कि कैसे युवा अपनी आवाज उठा सकते हैं और बदलाव ला सकते हैं। उनकी हिम्मत और लगन सराहनीय है।
सरकार का यह कहना कि आंदोलन में राष्ट्रविरोधी ताकतें शामिल थीं, बिल्कुल गलत है। यह उन युवाओं का अपमान है जो सिर्फ न्याय की मांग कर रहे थे। सरकार को ऐसे आरोप लगाने से पहले सोचना चाहिए।
यह आंदोलन सिर्फ एक घटना नहीं है, बल्कि यह एक बड़ी समस्या का संकेत है। अगर सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया, तो भविष्य में और भी ऐसे आंदोलन देखने को मिल सकते हैं। युवाओं का गुस्सा बढ़ता रहेगा और सरकार को इसका सामना करना पड़ेगा।
यह महत्वपूर्ण है कि सरकार छात्रों की चिंताओं को समझे और उन्हें दूर करे। केवल दिखावटी कदम उठाने से काम नहीं चलेगा। सरकार को अपनी नीतियों में बदलाव लाना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।
यह पूरा मामला दिखाता है कि कैसे सत्ता में बैठे लोग जनता की आवाज को अनसुना कर सकते हैं। लेकिन, जब जनता एकजुट होती है, तो उन्हें अपनी गलती माननी ही पड़ती है। यह आंदोलन इसी का एक उदाहरण है।
सरकार को यह समझना चाहिए कि युवा देश का भविष्य हैं। उनकी आवाज को दबाने की कोशिश करना गलत है। सरकार को उनकी बात सुननी चाहिए और उनके साथ मिलकर काम करना चाहिए। तभी देश आगे बढ़ सकता है।
यह आंदोलन एक चेतावनी है। सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए और अपनी कार्यशैली में सुधार करना चाहिए। तभी देश में विश्वास और उम्मीद बनी रह सकती है।