पारितोष त्रिपाठी ने पिता प्रोफेसर रामायण तिवारी को याद किया, नौ साल बाद भी है गहरा दर्द
पारितोष त्रिपाठी ने पिता प्रोफेसर रामायण तिवारी को याद किया, नौ साल बाद भी है गहरा दर्द
NewsPoint•
अभिनेता पारितोष त्रिपाठी ने अपने पिता प्रोफेसर रामायण तिवारी को याद करते हुए सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट शेयर किया है। नौ साल पहले पिता को खोने के दर्द को उन्होंने मेले में बिछड़े बच्चे से तुलना करते हुए बयां किया है। पारितोष ने बताया कि कैसे पिता का अचानक जाना उनके लिए आज भी एक अनसुलझा दर्द है और हर अच्छे-बुरे मौके पर उनकी कमी खलती है। उन्होंने उस फोन कॉल को भी याद किया जिसने उनकी जिंदगी बदल दी और पिता के न होने के खालीपन को गहराई से महसूस किया। अपनी बेटी मीशा के जन्म और उसके बढ़ते कदमों का जिक्र करते हुए, पारितोष ने पिता की सीख और ज्ञान को अपनी बेटी तक पहुंचाने की इच्छा जताई है।
पारितोष त्रिपाठी ने अपने पिता प्रोफेसर रामायण तिवारी को याद करते हुए एक मार्मिक पोस्ट लिखा है। उन्होंने बताया कि पिता को गए हुए नौ साल बीत गए हैं, लेकिन आज भी उन्हें ऐसा लगता है जैसे वे कहीं गए ही नहीं हैं। पारितोष ने कहा कि पिता का इतनी जल्दी चले जाना जरूरी नहीं था, क्योंकि जिंदगी में उन्हें अभी बहुत कुछ देखना बाकी था। आज हर खुशी और गम के मौके पर वे अपने पिता को अपने साथ महसूस करते हैं, और यह सब सहना उनके लिए बहुत मुश्किल है।अभिनेता ने उस फोन कॉल को याद किया जब उन्हें अपने पिता के निधन की खबर मिली थी। उन्होंने लिखा, "हर इंसान उस कॉल से घबराता है और वो एक दिन हर किसी के हिस्से में जरूर आती है।" जुलाई 2017 की बात बताते हुए पारितोष ने कहा कि एक कॉल आई, फोन के दूसरी तरफ की खामोशी, किसी के रोने की आवाज और जब तक आप उस कॉल को समझ पाते, तब तक सब कुछ अतीत बन चुका होता है।
पिता का न होना, पारितोष के अनुसार, मेले में किसी बच्चे का हाथ छूट जाने जैसा है। उन्होंने कहा कि यह बच्चा इस दुनिया के मेले में अपने पिता का हाथ ढूंढ रहा है। हर साल यादों की भीड़ बढ़ती जाती है, लेकिन पिता का हाथ ओझल होता जा रहा है।
पारितोष ने लिखा कि समय के साथ, उनके बेटे का हाथ मजबूत हो रहा है, और उनकी उंगलियां शब्दों को पिरोना सीख रही हैं। लेकिन अंदर से उनका बेटा जोर-जोर से रो रहा है, ताकि बच्चे की आवाज मेले को चीर कर उसके पापा तक पहुंच सके। उन्होंने कहा कि उन्हें पता है कि उनके पिता यह सब जानते होंगे, फिर भी वे लिखकर बता रहे हैं।
उन्होंने अपनी बेटी मीशा का जिक्र करते हुए कहा कि उसकी 'बाबा' कहने वाली पोती हुई है। जब वह धीरे से रोती है, तो उनकी आंखें खुल जाती हैं, ठीक वैसे ही जैसे उनके पिता उनके बचपन में जागते होंगे। पारितोष को लगता है कि उनके पिता सब कुछ छोड़कर, हर मौके पर, हर मोड़ पर उन्हें कुछ न कुछ सिखाते रहे होंगे।
पारितोष की बेटी मीशा अब 'मां, पापा, बाबा, जय जय' और काफी कुछ बोलने लगी है। जब वह नहाकर पूजा करने जाते हैं तो घंटी की आवाज सुनकर भाग के आती है। पारितोष ने कहा कि जब मीशा की विद्या आरंभ होगी, तो पहला अक्षर वे खुद सिखाएंगे और उसके बाद कोई और अक्षर उनके हाथ से नहीं लिखा जाएगा।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि वे अपनी बेटी को जरूर बताएंगे कि उसके बाबा अंग्रेजी के बड़े विद्वान थे और संस्कृत के पंडित थे। पारितोष ने लिखा, "काश मीशा को उसके बाबा पहला अक्षर लिखना और बोलना वो सिखाते।"
पारितोष को यह एहसास है कि उनके पिता उनके पास हैं, जिसे वे महसूस कर सकते हैं। उन्होंने कहा, "आज जो हूं आपसे हूं…और सब ठीक है, पापा, यात्रा चल रही है, अभिनय यात्रा भी और जीवन यात्रा भी।"