पूर्वोत्तर भारत को भू राजनीतिक प्रवेश द्वार के रूप में विकसित करने की चर्चा, विशेषज्ञों की राय
पूर्वोत्तर भारत को भू-राजनीतिक प्रवेश द्वार के रूप में विकसित करने की चर्चा, विशेषज्ञों की राय
NewsPoint•
भारत का पूर्वोत्तर क्षेत्र दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक प्रमुख प्रवेश द्वार के रूप में उभर रहा है। यह बात हाल ही में गुवाहाटी में आयोजित शैक्षणिक विमर्श के दौरान विशेषज्ञों द्वारा कही गई। 4 और 5 नवंबर को चिंतन रिसर्च फाउंडेशन (सीआरएफ), गिरिजानंद चौधरी विश्वविद्यालय (जीसीयू) और असम डॉन बॉस्को विश्वविद्यालय (एडीबीयू) के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में कनेक्टिविटी, सीमा प्रबंधन, आर्थिक एकीकरण और रणनीतिक अवसरों पर चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने कहा कि पूर्वोत्तर भारत को केवल सीमावर्ती क्षेत्र के तौर पर नहीं, बल्कि भारत की क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय सहभागिता का सक्रिय भागीदार माना जाना चाहिए।
इस संवाद में उपस्थित वक्ताओं ने बताया कि पूर्वोत्तर भारत की निकटता बांग्लादेश, भूटान और म्यांमार जैसे देशों से इसकी विशेषता को बढ़ाती है। यह निकटता सीमा पार व्यापार, ऊर्जा सहयोग और संपर्क परियोजनाओं के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है। हालांकि, इसके साथ चुनौतियां भी हैं, जैसे कि सुरक्षा, अवैध प्रवासन, बुनियादी ढांचे की कमी और सीमावर्ती समुदायों की अपेक्षाएं। इन सभी पहलुओं पर संतुलित तरीके से ध्यान देने की आवश्यकता है।सीआरएफ के अध्यक्ष शिशिर प्रियदर्शी ने बांग्लादेश के साथ लगातार संवाद और सहयोग के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने "वुडपेकर अप्रोच" का उल्लेख करते हुए कहा, "धैर्य और निरंतर प्रयासों के माध्यम से दोनों पक्षों के बीच सहयोग को और मजबूत किया जा सकता है।" उन्हें यह भी महसूस होता है कि भारत की विदेश नीति में पूर्वोत्तर भारत के दृष्टिकोण को अधिक महत्व मिलना चाहिए।
विशेषज्ञों ने बांग्लादेश के बंदरगाहों, अंतर्देशीय जलमार्गों और सीमा पार परिवहन नेटवर्क की भूमिका पर ध्यान केंद्रित किया, जिससे पूर्वोत्तर भारत की कनेक्टिविटी में सुधार हो सके। उन्होंने बंगाल की खाड़ी के बढ़ते भू-राजनीतिक महत्व और बाहरी शक्तियों के प्रभाव पर भी चर्चा की। जीसीयू में आयोजित "बांग्लादेश-पूर्वोत्तर भारत इंटरफेस" कार्यक्रम में इस तरह के विचार साझा किए गए।
दूसरे दिन एडीबीयू में आयोजित संगोष्ठी में कुलपति जोस पालेली ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को केवल सुरक्षा दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि आर्थिक अवसरों और सामाजिक संपर्क के केंद्र के रूप में देखना चाहिए। उन्होंने सीमावर्ती समुदायों को विकास और शासन व्यवस्था का महत्वपूर्ण भागीदार बनाने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
दुनिया की राजनीति में चीन की बढ़ती उपस्थिति और यारलुंग त्सांगपो नदी से जुड़े जल सुरक्षा मुद्दों पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने सिलीगुड़ी कॉरिडोर के महत्व, सीमा पार मादक पदार्थों की तस्करी की चुनौतियों और म्यांमार तथा बांग्लादेश की राजनीतिक परिस्थितियों पर विचार किए। विशेषज्ञों ने भारत की "एक्ट ईस्ट" नीति और "नेबरहुड फर्स्ट" नीति के महत्व को बताया।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि संपर्क परियोजनाओं का लाभ स्थानीय समुदायों तक पहुंचना चाहिए। साथ ही, बिम्सटेक जैसे क्षेत्रीय मंचों के जरिये सहयोग बढ़ाने की संभावनाओं की चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने निरंतर कूटनीतिक संवाद, प्रभावी सीमा प्रशासन, क्षेत्रीय सहयोग, समावेशी विकास और सीमावर्ती समुदायों की सक्रिय भागीदारी जरूरी बताई।
निर्णय के अनुसार, पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के रणनीतिक प्रवेश द्वार के रूप में विकसित करने के लिए सिर्फ बुनियादी ढांचे का निर्माण करना ही पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए सक्रिय भागीदारी और विकास योजनाएँ भी आवश्यक होंगी।
इस विमर्श ने स्पष्ट किया कि पूर्वोत्तर भारत को एक संवेदनशील एवं समाहित दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। सीमावर्ती समुदायों की अपेक्षाएँ, स्थानीय विकास, और सीमा अवसंरचना को मजबूत करते हुए यह सुनिश्चित करना होगा कि पूर्वोत्तर क्षेत्र न केवल कनेक्टिविटी का माध्यम बने, बल्कि क्षेत्रीय सहयोग का एक बड़ा लाभार्थी भी बने।
इस प्रकार, संवाद में सभी विशेषज्ञों ने एक सुर में कहा कि बाहरी सहयोग का आकार लेना, स्थानीय समुदायों का विकास करना और विभिन्न परियोजनाओं को सफल बनाने के लिए एक ठोस नीति अपनानी होगी। इससे पूर्वोत्तर भारत का समग्र विकास संभव होगा।