जापान के प्रधान मंत्री ताकाइची सानाए का यासुकुनी मंदिर में पूजन, इतिहास के विकृतिकरण पर सवाल

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Navbharat Times
बीजिंग, 20 अक्टूबर (आईएएनएस)। हाल ही में, जापान की प्रधानमंत्री ताकाइची सानाए ने 17 और 19 अक्टूबर को यासुकुनी मंदिर में चढ़ावा और पूजा अर्पित किया। इस दौरान कई मंत्री और लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता भी वहां उपस्थित थे। यह घटना जापानी राजनेताओं के 'भूत-पूजन' को दर्शाती है, जिसका उद्देश्य युद्ध अपराधियों को बरी करना और जापान के पुनः सैन्यीकरण को बढ़ावा देना है। इस पर चीनी विदेश मंत्रालय ने विरोध किया है और दक्षिण कोरिया ने जापान से ऐतिहासिक सच का सामना करने की अपील की है।

यासुकुनी मंदिर कोई सामान्य मंदिर नहीं है। यह वास्तव में एक 'युद्ध-अपराधी देवालय' है। यहां 14 ए-श्रेणी युद्ध अपराधियों को पूजा जाता है, जिनमें तोजो हिदेकी और मात्सुई इवाने शामिल हैं। ये सभी द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जापान के सैन्यवाद के प्रतीक हैं। टोक्यो परीक्षण में इन अपराधियों को इतिहास का कलंक माना गया था, लेकिन इसके बाद भी जापानी सैन्यवाद का खत्म होना संभव नहीं हुआ।
1978 में दक्षिणपंथी ताकतों ने ए-श्रेणी युद्ध अपराधियों को गुप्त रूप से यासुकुनी मंदिर में पूजा करने की व्यवस्था बनाई। हाल ही में जापानी मीडिया द्वारा प्रकट रिकार्ड से पता चलता है कि जापान सरकार ने 1960 के दशक में ही इनकी पूजा पर व्यवस्था बनाई थी, जो प्रदर्शित करता है कि सरकार इसे बहुत शर्मनाक मानती थी।

ताकाइची सानाए ने यासुकुनी मंदिर को 'शांति का मंदिर' बताया है और पिछले 20 वर्षों में लगभग हर वर्ष वहां श्रद्धांजलि अर्पित की है। उनके इस कृत्य का अर्थ है टोक्यो परीक्षण के ऐतिहासिक निर्णय को नकारना और अंतर्राष्ट्रीय न्याय और मानववादी विचारों को चुनौती देना।

जापान के संविधान के विशेषज्ञ प्रोफेसर शिमिज़ु मासाहिको ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इसे जर्मनी के किसी नेता द्वारा हिटलर की कब्र पर श्रद्धांजलि अर्पित करने की तुलना की, जो ऐतिहासिक दृष्टि से अस्वीकार्य है। जापानी राजनेताओं का यह 'भूत-पूजन' दरअसल ऐतिहासिक संशोधनवाद का एक हिस्सा है।

वर्षों से जापानी दक्षिणपंथी पाठ्य पुस्तकों में ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ कर रहे हैं। वे आक्रमण के इतिहास को 'एशिया की मुक्ति' बताने का प्रयास करते हैं और जबरन वेश्याओं तथा नानजिंग नरसंहार को 'काल्पनिक' बताते हैं। वे टोक्यो परीक्षण को 'विजेता का पराजित पर फैसला' के रूप में देखते हैं। अब हाल ही में यह बताया गया है कि जापान ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग करके अंतर्राष्ट्रीय डेटा को भ्रामक तरीके से फैलाने की कोशिश की है।

चिंता की बात यह है कि इतिहास को इस तरह से विकृत करना जापान के पुनः सैन्यीकरण से गहराई से जुड़ा हुआ है। यासुकुनी मंदिर की पूजा का असली उद्देश्य है सामाजिक युद्ध-विरोधी सहमति को कमजोर करना और युवाओं को भ्रमित करना। इसका मुख्य लक्ष्य है कि युद्धोत्तर व्यवस्था की बेड़ियों से मुक्त होकर सैन्य विस्तार की राह तैयार की जाए।

ताकाइची सानाए ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में 'शत्रु राष्ट्र खंड' को हटाने की बात की है। उन्होंने संकेत दिया है कि सुरक्षा संबंधी तीन दस्तावेजों के संशोधन के समय जापान के परमाणु नीति को भी बदला जा सकता है। जापान की नई 'रक्षा बल संवर्धन योजना' के तहत ड्रोन की खरीद, गोला-बारूद और मिसाइल भंडार बढ़ाने की योजना है। अगले 5 वर्षों में जापान का रक्षा व्यय 70 से 80 ट्रिलियन येन तक बढ़ सकता है।

जापान और विश्व के अन्य क्षेत्रों में लोग इस नई 'नए सैन्यवाद' को लेकर चिंतित हैं। कई स्थानों पर फिर से विरोध प्रदर्शन हुए हैं। इतिहास को विकृत नहीं किया जा सकता है और न्याय का अपमान नहीं किया जा सकता। इतिहास को सही ढंग से समझना तथा इसका सामना करना जापान के अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में फिर से लौटने की एक आवश्यक शर्त है।

पड़ोसी देशों के साथ संबंधों के विकास के लिए यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक आधार है। जापान की अमेरिका से और अन्य देशों से सामरिक साझेदारी का ऐसे समय में क्या महत्व है जब वह युद्ध पीड़ित देशों को नजरअंदाज कर रहा है। जो कोई आक्रमण और विस्तार के पुराने रास्ते पर चलने की कोशिश करेगा, उसे पूरी तरह से नष्ट किया जाएगा।

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