Brics विस्तार: नए सदस्य देशों को जोड़ने की प्रक्रिया और पार्टनर कंट्री का विकल्प
BRICS विस्तार: नए सदस्य देशों को जोड़ने की प्रक्रिया और पार्टनर कंट्री का विकल्प
NewsPoint•
नई दिल्ली 12-13 सितंबर को BRICS सम्मेलन की मेजबानी करने के लिए तैयार है, जो दुनिया की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है। हाल के वर्षों में इस समूह का तेजी से विस्तार हुआ है, और कई देश इसमें शामिल होने की इच्छा जता रहे हैं। हालांकि, किसी भी देश को पूर्ण सदस्य बनाने की प्रक्रिया केवल आवेदन करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए सदस्य देशों के बीच लंबी कूटनीतिक बातचीत और आपसी सहमति की आवश्यकता होती है। BRICS में नए सदस्य को शामिल करने का सबसे बड़ा आधार 'सर्वसम्मति' का सिद्धांत है। इच्छुक देश अपनी सदस्यता में रुचि अध्यक्ष देश या किसी मौजूदा सदस्य के सामने रखते हैं। इसके बाद, मौजूदा सदस्य देश उस उम्मीदवार की उम्मीदवारी पर आपस में चर्चा करते हैं। इस प्रक्रिया में सभी पूर्ण सदस्यों की सहमति अनिवार्य है। इसका मतलब है कि अगर अधिकांश देश किसी उम्मीदवार के पक्ष में हैं, लेकिन कोई एक सदस्य भी गंभीर आपत्ति जताता है, तो उसकी सदस्यता अटक सकती है।
नए सदस्यों को शामिल करने की प्रक्रिया को व्यवस्थित करने के लिए, 2023 में दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में हुए BRICS शिखर सम्मेलन में सदस्यता के लिए एक रूपरेखा और बुनियादी मापदंड तय किए गए थे। जब किसी उम्मीदवार पर सभी मौजूदा सदस्य देशों की सहमति बन जाती है, तो उसे आधिकारिक तौर पर BRICS में शामिल होने का निमंत्रण दिया जाता है। संबंधित देश द्वारा निमंत्रण स्वीकार करने के बाद, वार्षिक शिखर सम्मेलन में उसकी सदस्यता की औपचारिक घोषणा की जाती है।BRICS की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत और चीन के समूह के रूप में हुई थी। दक्षिण अफ्रीका 2010 में इसमें शामिल हुआ, और इसके बाद समूह का विस्तार लगातार होता रहा। 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब को समूह में शामिल किया गया। जनवरी 2025 में इंडोनेशिया के पूर्ण सदस्य बनने के बाद, BRICS में पूर्ण सदस्यों की संख्या 11 हो जाएगी। इस विस्तार ने समूह के आर्थिक और भू-राजनीतिक महत्व को और बढ़ाया है।
BRICS ने इच्छुक देशों को जोड़ने के लिए 'पार्टनर कंट्री' की एक अलग श्रेणी भी शुरू की है। 2024 में रूस के कजान में हुए शिखर सम्मेलन के दौरान इस मॉडल को आगे बढ़ाया गया। इसका उद्देश्य उन देशों को BRICS के साथ जोड़ना है जो पूर्ण सदस्यता की स्थिति में अभी नहीं हैं या जिन्हें तत्काल पूर्ण सदस्य का दर्जा नहीं दिया गया है। पार्टनर देशों को आर्थिक, व्यापारिक और सहयोग से जुड़े क्षेत्रों में BRICS देशों के साथ काम करने का अवसर मिलता है।
मौजूदा पार्टनर देशों में बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम शामिल हैं। इस श्रेणी के जरिए BRICS का दायरा पूर्ण सदस्यता बढ़ाए बिना भी व्यापक हो रहा है।
'फुल मेंबर' और 'पार्टनर कंट्री' में मुख्य अंतर उनकी भागीदारी और प्रभाव में है। पूर्ण सदस्य BRICS के प्रमुख नीतिगत फैसलों और एजेंडे से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वहीं, पार्टनर देशों की भागीदारी सीमित होती है और उन्हें चुनिंदा बैठकों तथा चर्चाओं में शामिल होने का अवसर मिलता है। पूर्ण सदस्य BRICS की संस्थागत गतिविधियों में ज्यादा प्रभाव रखते हैं, जबकि पार्टनर देशों को मुख्य रूप से व्यापार, निवेश और आर्थिक सहयोग के अवसर मिलते हैं। सीधे शब्दों में कहें तो, फुल मेंबरशिप जहां निर्णय लेने की प्रक्रिया में व्यापक भागीदारी देती है, वहीं पार्टनर कंट्री का दर्जा BRICS के साथ जुड़ने और सहयोग बढ़ाने का रास्ता खोलता है।
लगातार नए देशों के जुड़ने और पार्टनर देशों की नई व्यवस्था के कारण BRICS का वैश्विक प्रभाव बढ़ रहा है। हालांकि, समूह के विस्तार में सबसे अहम भूमिका अभी भी मौजूदा सदस्यों की आपसी सहमति की है। यही वजह है कि किसी भी इच्छुक देश के लिए BRICS की पूर्ण सदस्यता हासिल करना एक लंबी और महत्वपूर्ण कूटनीतिक प्रक्रिया मानी जाती है। यह सिर्फ एक क्लब में शामिल होना नहीं है, बल्कि एक ऐसे समूह का हिस्सा बनना है जहाँ हर किसी की बात सुनी जाती है और हर निर्णय सोच-समझकर लिया जाता है।
BRICS का यह विस्तार सिर्फ सदस्यों की संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि यह वैश्विक मंच पर एक मजबूत आवाज बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह समूह दुनिया की आधी से ज्यादा आबादी का प्रतिनिधित्व करता है और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में इसका बड़ा योगदान है। नए सदस्यों के जुड़ने से BRICS की आर्थिक शक्ति और बढ़ेगी, जिससे यह अंतरराष्ट्रीय आर्थिक और राजनीतिक एजेंडे को प्रभावित करने में और अधिक सक्षम होगा।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि BRICS में शामिल होने की प्रक्रिया इतनी जटिल क्यों है। इसका मुख्य कारण यह है कि BRICS एक ऐसा मंच है जहाँ सदस्य देश अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों को बनाए रखते हुए सहयोग करते हैं। इसलिए, किसी भी नए सदस्य को शामिल करने से पहले यह सुनिश्चित किया जाता है कि वह समूह के सिद्धांतों और लक्ष्यों के साथ पूरी तरह से संरेखित हो। यह सुनिश्चित करता है कि समूह की एकता और प्रभावशीलता बनी रहे।
भारत, जो इस बार BRICS सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है, समूह के विस्तार और इसके बढ़ते प्रभाव में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। भारत का लक्ष्य BRICS को एक ऐसे मंच के रूप में विकसित करना है जो वैश्विक चुनौतियों का सामना करने और विकासशील देशों के हितों की रक्षा करने में सक्षम हो। नई दिल्ली में होने वाला यह सम्मेलन BRICS के भविष्य की दिशा तय करने में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है।
पार्टनर कंट्री की व्यवस्था BRICS को और अधिक लचीला बनाती है। यह उन देशों को भी समूह के साथ जुड़ने का मौका देती है जो अभी पूर्ण सदस्य बनने के लिए तैयार नहीं हैं। इससे BRICS का प्रभाव क्षेत्र बढ़ता है और विभिन्न देशों के बीच सहयोग के नए रास्ते खुलते हैं। यह एक तरह से BRICS के दरवाजे खोलता है, जिससे अधिक से अधिक देश वैश्विक सहयोग में भाग ले सकें।
संक्षेप में, BRICS का विस्तार एक सुनियोजित और कूटनीतिक प्रक्रिया का परिणाम है। यह समूह न केवल आर्थिक रूप से मजबूत हो रहा है, बल्कि वैश्विक राजनीति में भी अपनी छाप छोड़ रहा है। भारत की मेजबानी में होने वाला यह सम्मेलन BRICS के भविष्य के लिए नई दिशाएं तय करेगा और दुनिया भर के देशों के लिए सहयोग के नए अवसर खोलेगा।