कस्तूरीरंगन रिपोर्ट लागू: आर. अशोक ने किसानों की कठिनाइयों पर जताई चिंता, केरल मॉडल अपनाने का सुझाव

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Navbharat Times
कर्नाटक में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता और विपक्ष के नेता आर. अशोक ने सोमवार को कहा कि केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) के आदेश का पालन करते हुए कस्तूरीरंगन रिपोर्ट को लागू करने के लिए अधिसूचना जारी की है, और यह कोई स्वैच्छिक फैसला नहीं है। उन्होंने राज्य सरकार को जमीनी स्तर पर सर्वेक्षण कराने और अदालत में प्रभावी ढंग से अपना पक्ष रखने के लिए योग्य वकीलों की नियुक्ति करने की सलाह दी। अशोक ने चेतावनी दी कि कस्तूरीरंगन रिपोर्ट लागू होने से किसानों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने कांग्रेस मंत्रियों से यह कहना बंद करने को कहा कि यह आदेश प्रधानमंत्री ने जारी किया है, और इस मुद्दे पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह आदेश एनडीए सरकार ने नहीं, बल्कि अदालत के निर्देशों के आधार पर तैयार किया गया था। उन्होंने सुझाव दिया कि कर्नाटक को केरल मॉडल अपनाना चाहिए, जहाँ राज्य सरकार ने जमीनी सर्वेक्षण कर बागानों और घरों की पहचान की थी और अपनी रिपोर्ट एनजीटी व केंद्र सरकार को सौंपी थी, जिससे पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ईएसए) का दायरा कम करने में मदद मिली थी।

आर. अशोक ने बताया कि कस्तूरीरंगन रिपोर्ट में कर्नाटक के 1,576 गांवों और 20,668 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र बताया गया है, जो सभी राज्यों में सबसे अधिक है। उन्होंने कहा कि सैटेलाइट तस्वीरों में खेतों और कॉफी बागानों को गलती से जंगल के रूप में दर्ज कर दिया गया है, जिससे 10 जिलों के लाखों किसानों के सामने समस्याएं खड़ी हो गई हैं। भाजपा नेता ने कहा कि वन विभाग और राजस्व विभाग के बीच तालमेल की कमी के कारण गांवों में सड़कों का निर्माण प्रभावित हो रहा है। उन्होंने कहा, “मानसून में यदि कोई पुल टूट जाता है तो उसकी मरम्मत तक नहीं हो सकती। बिजली कनेक्शन देने में भी दिक्कत आती है। अगर वन विभाग बफर जोन बनाता है तो समस्याएं और बढ़ जाएंगी।”
आर. अशोक ने राज्य सरकार से जमीनी सर्वेक्षण रिपोर्ट तैयार कर उसे केंद्र सरकार और एनजीटी को भेजने की अपील की। साथ ही, उन्होंने पर्यावरण मामलों के विशेषज्ञ वकीलों की नियुक्ति कर सुप्रीम कोर्ट में प्रभावी पैरवी करने का भी सुझाव दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि राज्य सरकार ने समय रहते कदम नहीं उठाए, तो एनजीटी केंद्र सरकार को रिपोर्ट लागू करने का निर्देश दे सकता है।

पश्चिमी घाट के महत्व का जिक्र करते हुए अशोक ने कहा कि यह क्षेत्र छह राज्यों में फैला हुआ है और 1,64,280 वर्ग किलोमीटर इलाके को कवर करता है। यह 40 लाख टन कार्बन अवशोषित करता है और यहाँ आठ जैव विविधता हॉटस्पॉट तथा 325 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं। उन्होंने याद दिलाया कि 2010 में गठित माधव गाडगिल समिति ने कड़े प्रतिबंधों की सिफारिश की थी। विरोध के बाद कस्तूरीरंगन समिति बनाई गई, जिसने 37 प्रतिशत क्षेत्र (59,940 वर्ग किलोमीटर) को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील घोषित करने का सुझाव दिया।

आर. अशोक ने कहा कि गोवा फाउंडेशन लगातार गाडगिल रिपोर्ट को लागू करने की मांग कर रहा है और इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटा चुका है। एनजीटी ने निर्देश दिया है कि 2017 की अधिसूचना में कोई बदलाव न किया जाए और केंद्र सरकार अधिकरण के निर्देशों के अनुसार कई बार अधिसूचनाएं जारी कर चुकी है। आर. अशोक ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार ने अब संजय कुमार की अध्यक्षता में एक समिति गठित की है, जिसका कार्यकाल 2027 तक रहेगा।

यह पूरा मामला कस्तूरीरंगन रिपोर्ट से जुड़ा है, जिसे पर्यावरण को बचाने के लिए बनाया गया था। इस रिपोर्ट में पश्चिमी घाट के कुछ इलाकों को 'पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र' (ईएसए) घोषित करने की बात कही गई है। इसका मतलब है कि इन इलाकों में कुछ खास तरह की गतिविधियों पर रोक लग जाएगी, जैसे कि निर्माण कार्य या खेती में बदलाव।

आर. अशोक का कहना है कि यह रिपोर्ट जमीनी हकीकत से दूर है। सैटेलाइट तस्वीरों से यह पता लगाना मुश्किल है कि कौन सा इलाका जंगल है और कौन सा खेत या बागान। इस वजह से, किसानों की जमीनें भी संवेदनशील क्षेत्र में आ सकती हैं, जिससे उनकी रोजी-रोटी पर खतरा मंडराएगा। उन्होंने कहा कि कर्नाटक में 1,576 गांवों और 20,668 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को संवेदनशील बताया गया है, जो बहुत बड़ा हिस्सा है।

उन्होंने राज्य सरकार को सलाह दी कि वह खुद जमीनी स्तर पर जाकर सर्वे कराए। यानी, अधिकारी खुद जाकर देखें कि कौन सी जमीन किस काम आ रही है। इसके बाद, जो रिपोर्ट बने, उसे केंद्र सरकार और एनजीटी को भेजा जाए। साथ ही, उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष मजबूती से रखने के लिए अच्छे वकीलों की नियुक्ति की जानी चाहिए।

आर. अशोक ने केरल का उदाहरण दिया। केरल सरकार ने भी ऐसा ही सर्वे कराया था और अपनी रिपोर्ट सौंपी थी, जिससे संवेदनशील क्षेत्र का दायरा कम हो गया था। उन्होंने कहा कि कर्नाटक को भी यही तरीका अपनाना चाहिए।

उन्होंने यह भी साफ किया कि यह फैसला केंद्र सरकार का अपना नहीं है, बल्कि यह एनजीटी के आदेश का पालन है। एनजीटी एक अदालत की तरह है जो पर्यावरण से जुड़े मामलों को देखती है। इसलिए, कांग्रेस के मंत्रियों को यह नहीं कहना चाहिए कि यह प्रधानमंत्री का फैसला है। इस मुद्दे पर राजनीति करने से किसानों की समस्या हल नहीं होगी।

उन्होंने बताया कि पश्चिमी घाट एक बहुत महत्वपूर्ण इलाका है। यह कई राज्यों में फैला है और बहुत सारे कार्बन को सोखता है। यहाँ कई तरह के पेड़-पौधे और जीव-जंतु पाए जाते हैं। पहले माधव गाडगिल समिति ने और भी सख्त नियम बनाने की सिफारिश की थी, लेकिन विरोध के बाद कस्तूरीरंगन समिति बनाई गई।

आर. अशोक ने चिंता जताई कि अगर राज्य सरकार ने जल्दी कदम नहीं उठाए, तो एनजीटी केंद्र सरकार को रिपोर्ट लागू करने का आदेश दे सकता है, जिससे किसानों की मुश्किलें और बढ़ जाएंगी। उन्होंने यह भी बताया कि केंद्र सरकार ने अब संजय कुमार की अध्यक्षता में एक नई समिति बनाई है, जो 2027 तक काम करेगी। यह समिति शायद इन समस्याओं का कोई समाधान निकालने की कोशिश करेगी।

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