पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ का आतंकवाद पर नया दावा, लेकिन क्या है सच?

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Navbharat Times
नई दिल्ली। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने हाल ही में कहा था कि उनके देश की सरकारें पिछले 30 वर्षों से आतंकवादियों का समर्थन कर रही हैं। यह बयान 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए हमले के कुछ दिन बाद आया, जिसमें 26 नागरिकों की जान गई। अब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने खुद यूएन में स्वीकार किया है कि उनके देश में आतंकवादी मौजूद रहे हैं, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि अब उन पर नियंत्रण पा लिया गया है। पाकिस्तान की ओर से आतंकवाद के खिलाफ अपने रुख में बदलाव के दावे संदिग्ध हैं, खासकर जब कई विश्वसनीय रिपोर्टें पाकिस्तान की सेना के कुछ तत्वों पर आतंकवादी संगठनों जैसे लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद को प्रशिक्षण देने और उनकी मदद करने के आरोप लगाती हैं।

कुछ महीने पहले तस्वीरें सामने आई थीं, जिसमें प्रधानमंत्री के राजनीतिक मामलों के सलाहकार राणा सनाउल्लाह खान, जो पाकिस्तान के एक वरिष्ठ नेता हैं, को नामित आतंकवादी हाफिज तल्हा सईद के साथ देखा गया था। तल्हा सईद लश्कर-ए-तैयबा के संस्थापक हाफिज सईद का बेटा है। ख्वाजा आसिफ ने अपने उस इंटरव्यू में कहा, "लश्कर बीते समय का नाम है। अब उसका अस्तित्व नहीं है।" उन्होंने यह टिप्पणी लश्कर से जुड़े द रेजिस्टेंस फ्रंट की उस जिम्मेदारी के संदर्भ में की, जिसमें उसने पहलगाम हमले की जिम्मेदारी ली थी।
ऐसा कहा जाता है कि पाकिस्तान के सैन्य मुख्यालय, जो रावलपिंडी में स्थित है, का इस्लामाबाद की नागरिक सरकार पर काफी प्रभाव है। हाल ही में पाकिस्तान के सेना प्रमुख सैयद आसिम मुनीर की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मामलों में सक्रिय भूमिका ने यह बात और स्पष्ट कर दी है। प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के लिए सेना के शक्तिशाली प्रमुख के खिलाफ बोलना संभव नहीं होता, विशेषकर जब उनकी शक्तियों में हाल के कानूनी बदलावों से और वृद्धि हुई है।

पाकिस्तान को लंबे समय से आतंकवादी नेटवर्क की सक्रियता के लिए अंतरराष्ट्रीय जांच और आरोपों का सामना करना पड़ रहा है। इसका प्रमुख उदाहरण लश्कर-ए-तैयबा है, जिसके सदस्यों पर 2008 के मुंबई आतंकी हमलों की साजिश में शामिल होने का आरोप है और जिसमें 166 लोग मारे गए थे। इस संगठन के संस्थापक हाफिज सईद को संयुक्त राष्ट्र द्वारा आतंकवादी घोषित किया गया है। हालिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हत्या की कई कोशिशों के मद्देनजर, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई ने हाफिज सईद की सुरक्षा बढ़ा दी है और उसे लाहौर में एक कड़ी सुरक्षा वाले स्थान पर रखा गया है।

ओवेन एल. सिर्स ने एक पुस्तक में लिखा है कि आईएसआई एक सैन्य एजेंसी है और यह सैन्य नेतृत्व के निर्देशों के तहत कार्य करती है। उनके अनुसार, आईएसआई पर प्रधानमंत्री के बजाय सेना प्रमुख का प्रभाव रहता है। इसी तरह, जैश-ए-मोहम्मद का प्रमुख मसूद अजहर भी पाकिस्तान में मौजूद होने के आरोपों के कारण चर्चा में रहा है। जैश-ए-मोहम्मद पर 2001 में भारतीय संसद और 2019 में पुलवामा आत्मघाती हमले में शामिल होने का आरोप है।

लेख में 2005 में लंदन में हुए बम धमाकों और 2010 में न्यूयॉर्क के टाइम्स स्क्वायर में हमले की नाकाम कोशिश से जुड़े लोगों के संबंधों का भी जिक्र किया गया है। साथ ही, यह भी बताया गया है कि 2003 में अल-कायदा के सदस्य खालिद शेख मोहम्मद को रावलपिंडी से गिरफ्तार किया गया था। वह 11 सितंबर 2001 को अमेरिका में हुए आतंकी हमलों की साजिश में शामिल था। इसके बाद, 2011 में अल-कायदा के प्रमुख ओसामा बिन लादेन को पाकिस्तान के एबटाबाद में पकड़ा गया, जिसका ठिकाना एक प्रमुख सैन्य अकादमी के करीब था।

इस लेख में मीर ऐमल कांसी का भी उल्लेख किया गया है, जिसे अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए के मुख्यालय के बाहर होने वाले हमले में शामिल होने के बाद पाकिस्तान से पकड़ा गया था। इसके अतिरिक्त, 2002 में वॉल स्ट्रीट जर्नल के पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या का मामला भी उठाया गया है। पर्ल, पाकिस्तान में चरमपंथी संगठनों और अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी नेटवर्क के संबंधों की जांच कर रहे थे।

इन सभी घटनाओं के मद्देनजर, यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान में आतंकवादी संगठनों के इतिहास को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वहां की सरकार, खासकर सेना और खुफिया एजेंसियों की भूमिका पर सवाल उठते हैं। इस साल जून में, कुछ नेताओं को आतंकवादी संगठनों से जुड़े मामलों में पाकिस्तान के पूर्व तेज गेंदबाज शोएब अख्तर के भाई के अंतिम संस्कार में देखा गया था। इसमें लश्कर-ए-तैयबा के उप प्रमुख सैफुल्लाह कसूरी और पाकिस्तान मरकजी मुस्लिम लीग के अध्यक्ष इनाम-उर-रहमान कम्बोह जैसे लोग शामिल थे।

लेख में कसूरी को अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकवादी हमले का साजिशकर्ता बताया गया है, जबकि पीएमएमएल को लश्कर का राजनीतिक चेहरा बताया गया है। इन घटनाओं को देखते हुए पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व के आतंकवाद समाप्त करने के दावों पर गंभीर सवाल उठते हैं। जब तक आतंकवादी संगठनों के प्रमुख और कमांडर पाकिस्तान में बिना प्रभावी कार्रवाई के मौजूद रहेंगे, तब तक आतंकवाद को खत्म करने के उसके दावों की विश्वसनीयता संदिग्ध रहेगी।

इस लेख में अंत में कहा गया है कि आतंकवाद केवल बयानों से खत्म नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान के नेता मंज़ूर कर सकते हैं कि उन्होंने अतीत में गलतियां की हैं, लेकिन जब तक ये आतंकवादी संगठन प्रभावी कार्रवाई के बिना सक्रिय हैं, तब तक उनके दावों पर सवाल उठते रहेंगे।

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