नवरात्रि पर घटस्थापना में जौ बोने की परंपरा और उसके अर्थ

NewsPoint•
Navbharat Times
नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना के समय जौ बोने की प्रथा काफी पुरानी है। इस दिन मां दुर्गा की उपासना की जाती है। जौ के बीज को मिट्टी के पात्र में बोया जाता है, जिससे हरे अंकुर निकलते हैं। ये अंकुर जीवन, ऊर्जा, वृद्धि और समृद्धि का प्रतीक होते हैं। मिट्टी में बोने की खासियत यह है कि मिट्टी को पृथ्वी तत्व माने जाने के कारण, यह प्रकृति और जीवन चक्र को दर्शाता है। जौ का अंकुरण पौधे में बदलकर जीवन की महत्ता को दर्शाता है।

घटस्थापना के समय आमतौर पर चौड़े और गहरे मिट्टी के पात्र का इस्तेमाल होता है। इस पात्र में मिट्टी भरकर जौ के बीज बोए जाते हैं। इस प्रक्रिया में जल और कलश को भी रखा जाता है। ये चारों तत्व मिलकर देवी शक्ति और प्राकृतिक जीवन के प्रति श्रद्धा का प्रतीक होते हैं। माना जाता है कि जौ सृष्टि के पहले अनाजों में से एक है। इसलिए इसे जीवन और वृद्धि का प्रतीक भी मानते हैं।
नवरात्रि में नौ दिनों के दौरान जौ के अंकुरों का बढ़ना महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता के अनुसार, घर में सुख, समृद्धि और उन्नति की कामनाओं को जौ के विकास से जोड़ा जाता है। इसके बढ़ने का मतलब होता है कि घर में खुशहाली आएगी। जौ को प्राचीन समय से प्रमुख अनाज माना जाता रहा है। इसलिए इसे अन्न, समृद्धि और खुशहाली की कामना से भी जोड़ा गया है।

इसके अलावा, घटस्थापना की विधियों में 'सप्तधान्य' का भी उल्लेख होता है। सप्तधान्य में सात प्रकार के अनाज आते हैं, जैसे जौ, तिल, धान, मूंग, कंगनी, चना और गेहूं। इससे यह स्पष्ट होता है कि घटस्थापना केवल पूजा की विधि नहीं है, बल्कि ये प्रकृति, अन्न, जीवन और समृद्धि के प्रति हमारी आस्था को भी दर्शाती है।

इस प्रकार नवरात्रि के दौरान जौ बोने की यह परंपरा धार्मिक मान्यताओं के साथ जीवन के विभिन्न पहलुओं से जुड़ी होती है। यह न केवल देवी की पूजा करती है, बल्कि हमारे अन्न के प्रति कृतज्ञता और प्रकृति के प्रति भावनाएँ भी व्यक्त करती है। इस कारण से नवरात्रि का पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और जीवन की महत्ता को भी उजागर करता है।

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