मंगल पर जीवन ढूंढने के बजाय, जीवन में मंगल तलाशना बेहतर

Contributed byजैन मुनिश्री तरुणसागरजी|नवभारतटाइम्स.कॉम

मंगल ग्रह पर जीवन की खोज जारी है। लेखक का मानना है कि हमें मंगल ग्रह की बजाय अपने जीवन में मंगल खोजना चाहिए। जीवन स्वयं में मंगल है, पर हमारी नासमझी इसे संघर्ष का मैदान बना देती है।

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मंगल (ग्रह) पर जीवन है या नहीं, दुनिया में इस बात पर बहस चल रही है। लेकिन, जीवन में मंगल है या नहीं, इस बात की किसी को फिक्र नहीं। मैं निवेदन करूंगा कि मंगल पर जीवन ढूंढने की बजाय जीवन में यदि मंगल ढूंढा जाए तो ज्यादा बेहतर होगा। जीवन मंगल है, मगर हमारी नासमझी के कारण वह दंगल बना हुआ है।

भोजन में और सब कुछ हो, सिर्फ नमक न हो तो भोजन बेकार है। मंदिर में और सब कुछ हो, सिर्फ मूर्ति न हो तो मंदिर बेकार है। अस्पताल में और सब कुछ हो, सिर्फ डॉक्टर न हो तो अस्पताल बेकार है। गाड़ी में और सब कुछ हो, सिर्फ ब्रेक न हो तो गाड़ी बेकार है। जीवन में और सब कुछ हो, सिर्फ मन की शांति न हो तो जीवन बेकार है। जो केवल 'अपना' भला चाहे वह दुर्योधन है, जो 'अपनों' का भला चाहे वह युधिष्ठिर है और जो 'सबका' भला चाहे वह श्रीकृष्ण है। केवल अपना भला चाहने वाला पापात्मा है, अपनों का भला चाहने वाला पुण्यात्मा है और सबका भला चाहने वाला परमात्मा है। दुर्योधन पापात्मा है, युधिष्ठिर पुण्यात्मा और श्रीकृष्ण परमात्मा। सोचिए! आप क्या हैं?

(साभार : डायमंड बुक्स)