मन का मैल मिट जाता है, यदि देने का भाव बना रहे

Contributed byश्री श्री आनंदमूर्ति|नवभारतटाइम्स.कॉम
erase the dirt of the mind attain purity through the spirit of giving and hari kirtan
मान लीजिए, आप कहीं बैठे हैं, और वहां किसी व्यक्ति को कोई सम्मान नहीं दे रहा। ऐसे में आप क्या करेंगे? आप स्वयं आगे बढ़कर उसका सम्मान करें। यदि कोई उसे यह कहने वाला नहीं कि ‘आइए, बैठिए’, तो आप मुस्कराकर कहें- ‘आइए, कृपया बैठिए।’ और यदि किसी के सामने कोई नमस्कार करने वाला नहीं है, तो आप उसे नमस्कार करें। इसका सबसे सुंदर परिणाम यह होगा कि दूसरे को सम्मान देते-देते आपका अपना मन निर्मल होने लगेगा।मन की शुद्धि केवल पाने की इच्छा से नहीं, बल्कि देने की भावना से होती है। जब मन में यह लालसा जागती है कि ‘मैं किसी के लिए क्या कर सकता हूं?’, तब भीतर का अहकार धीरे-धीरे पिघलने लगता है। कहा गया है कि वैकुंठ किसी दूर के लोक में नहीं, बल्कि शुद्ध और पवित्र हृदय में स्थापित होता है। लेकिन मन को खाली भी नहीं छोड़ा जा सकता। खाली मन इधर-उधर भटकता है और गलत कामों की ओर भी जा सकता है। इसलिए जब कोई सार्थक काम न हो, तो समय को बेकार न जाने दें। कहा गया है- खाली समय में हरि का कीर्तन करो। इससे मन को सकारात्मक दिशा मिलती है।

जब मन में खालीपन हो, तो उसे प्रेम, सेवा, सम्मान और हरिकीर्तन से भरें। दूसरों को सम्मान देने से मन पर जमा मैल हटता है और आध्यात्मिक यात्रा आगे बढ़ती है।
(प्रस्तुति : दिव्य चेतनानंद अवधूत)

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