Indias Export Trust Concrete Steps To Reduce Uncertainty In Budget 2024 25
एक्सपोर्ट के लिए भरोसा जीतने निकला भारत
नवभारत टाइम्स•
भारत अब दुनिया में ज्यादा निर्यात कर भरोसेमंद साथी बनना चाहता है। इसके लिए देश के भीतर की अनिश्चितताओं को दूर किया जाएगा। बजट में इंफ्रास्ट्रक्चर, छोटे उद्योगों और कस्टम प्रक्रियाओं को सुधारा जा रहा है। इन कदमों से भारतीय कंपनियां वैश्विक बाजार में टिक पाएंगी। यह प्रयास भारत को एक मजबूत निर्यातक के रूप में स्थापित करेगा।
औद्योगिक क्रांति के समय सबसे बड़ा बदलाव मशीनों या तकनीक में नहीं, बल्कि जोखिम में आया था। पहले आर्थिक झटके कम लगते थे, लेकिन जैसे-जैसे उद्योग बढ़े, अनिश्चितता भी बढ़ती गई। मांग में कमी, परिवहन में दिक्कतें और वित्तीय संकट ने कई व्यापारों को प्रभावित किया। जिन देशों ने इस चुनौती का सामना किया, उन्होंने जोखिम को खत्म नहीं किया, बल्कि उसकी जिम्मेदारी तय की और नियम बनाए। इस साल के बजट में भी भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धा में सबसे बड़ी बाधा लागत या उत्पादकता को नहीं, बल्कि घरेलू अनिश्चितता को माना गया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि वैश्विक व्यापार दबाव में है, आपूर्ति अस्थिर है और नियमों में अनिश्चितता बढ़ी है। इसलिए भारत ज्यादा निर्यात के साथ एक भरोसेमंद भागीदार बनना चाहता है, जिसके लिए अनिश्चितता को कम करना बहुत ज़रूरी है।
किसी भी कंपनी के लिए निर्यात का फैसला बहुत अहम होता है। इसके लिए सर्टिफिकेशन, नियमों का पालन, लॉजिस्टिक्स, विदेशी खरीदारों से समझौते और अतिरिक्त पूंजी जुटाने जैसे कई काम करने पड़ते हैं। अगर देश में इंफ्रास्ट्रक्चर, भुगतान व्यवस्था और नीतियां साफ-सुथरी नहीं हैं, तो निर्यात को टालना ही समझदारी का काम होता है। यही वजह है कि भारत में सिर्फ कुछ ही कंपनियां निर्यातक बन पाती हैं। इस बजट में अनिश्चितता को कई तरीकों से संभालने की कोशिश की गई है। केपेक्स (पूंजीगत व्यय) को 12.2 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ाना सिर्फ मांग बढ़ाना नहीं है, बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी अनिश्चितता को कम करना भी है। जब सड़कें, रेल नेटवर्क और बंदरगाह समय पर पूरे होते हैं, तो निर्यातकों को कम लागत में एक भरोसेमंद सप्लाई चेन मिलती है।छोटे और मझोले उद्यमों (MSMEs) के लिए अनिश्चितता थोड़ी अलग होती है। वित्त मंत्री ने बताया कि TReDS प्लेटफॉर्म के ज़रिए अब तक 7 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा के बिल डिस्काउंट किए जा चुके हैं। इसके अलावा, केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (CPSE) की खरीद को TReDS से जोड़ना, क्रेडिट गारंटी बढ़ाना और बकाया रकम को वित्तीय साधनों में बदलना जैसे प्रस्ताव MSMEs की अनिश्चितता को कम करने में मदद करते हैं।
बजट में कस्टम ड्यूटी और व्यापार को आसान बनाने के लिए भी कदम उठाए गए हैं। निर्यात प्रतिस्पर्धा सिर्फ उत्पादन और लॉजिस्टिक्स पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि सीमा पर मिलने वाले अनुभव से भी तय होती है। कस्टम ड्यूटी को आसान बनाना, फालतू शुल्क हटाना और इनपुट पर ड्यूटी कम करने का मकसद भी अनिश्चितता को कम करना है। जब शुल्क की व्यवस्था बहुत जटिल होती है, तो कंपनियां भविष्य की लागत का सही अंदाज़ा नहीं लगा पातीं। कस्टम प्रक्रिया में भरोसे पर आधारित सिस्टम, पहले से लिए गए फैसलों की मान्यता, तेज़ी से क्लीयरेंस और जोखिम के आधार पर जांच निर्यातकों के लिए बहुत ज़रूरी है। व्यापार में माल के औसत क्लीयरेंस टाइम से ज़्यादा उसकी अनिश्चितता मायने रखती है। अगर किसी कंपनी को यह पता ही नहीं कि उसका माल कहां और कब रुकेगा या किस वजह से रुकेगा, तो वह ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा कैसे बन पाएगी? इन सुधारों से नतीजों को पहले से जानने में मदद मिलेगी।
इस बजट का असर GDP के आंकड़ों में तुरंत नहीं दिखेगा। यह तब दिखेगा जब ज़्यादा भारतीय कंपनियां निर्यात शुरू करेंगी, वैश्विक बाज़ार में अपनी जगह बनाएंगी और भारत को एक भरोसेमंद निर्यातक के तौर पर देखा जाएगा। इतिहास गवाह है कि किसी भी मज़बूत उद्योग की नींव अनिश्चितताओं को समझदारी से संभालने में ही होती है। यह बजट भी इसी दिशा में एक गंभीर और ठोस प्रयास है।
औद्योगिक क्रांति के समय सबसे बड़ा बदलाव मशीनों या तकनीक में नहीं, बल्कि जोखिम में आया था। पहले आर्थिक झटके कम लगते थे, लेकिन जैसे-जैसे उद्योग बढ़े, अनिश्चितता भी बढ़ती गई। मांग में कमी, परिवहन में दिक्कतें और वित्तीय संकट ने कई व्यापारों को प्रभावित किया। जिन देशों ने इस चुनौती का सामना किया, उन्होंने जोखिम को खत्म नहीं किया, बल्कि उसकी जिम्मेदारी तय की और नियम बनाए। इस साल के बजट में भी भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धा में सबसे बड़ी बाधा लागत या उत्पादकता को नहीं, बल्कि घरेलू अनिश्चितता को माना गया है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि वैश्विक व्यापार दबाव में है, आपूर्ति अस्थिर है और नियमों में अनिश्चितता बढ़ी है। इसलिए भारत ज्यादा निर्यात के साथ एक भरोसेमंद भागीदार बनना चाहता है, जिसके लिए अनिश्चितता को कम करना बहुत ज़रूरी है।
किसी भी कंपनी के लिए निर्यात का फैसला बहुत अहम होता है। इसके लिए सर्टिफिकेशन, नियमों का पालन, लॉजिस्टिक्स, विदेशी खरीदारों से समझौते और अतिरिक्त पूंजी जुटाने जैसे कई काम करने पड़ते हैं। अगर देश में इंफ्रास्ट्रक्चर, भुगतान व्यवस्था और नीतियां साफ-सुथरी नहीं हैं, तो निर्यात को टालना ही समझदारी का काम होता है। यही वजह है कि भारत में सिर्फ कुछ ही कंपनियां निर्यातक बन पाती हैं। इस बजट में अनिश्चितता को कई तरीकों से संभालने की कोशिश की गई है। केपेक्स (पूंजीगत व्यय) को 12.2 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ाना सिर्फ मांग बढ़ाना नहीं है, बल्कि इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी अनिश्चितता को कम करना भी है। जब सड़कें, रेल नेटवर्क और बंदरगाह समय पर पूरे होते हैं, तो निर्यातकों को कम लागत में एक भरोसेमंद सप्लाई चेन मिलती है।
छोटे और मझोले उद्यमों (MSMEs) के लिए अनिश्चितता थोड़ी अलग होती है। वित्त मंत्री ने बताया कि TReDS प्लेटफॉर्म के ज़रिए अब तक 7 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा के बिल डिस्काउंट किए जा चुके हैं। इसके अलावा, केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (CPSE) की खरीद को TReDS से जोड़ना, क्रेडिट गारंटी बढ़ाना और बकाया रकम को वित्तीय साधनों में बदलना जैसे प्रस्ताव MSMEs की अनिश्चितता को कम करने में मदद करते हैं।
बजट में कस्टम ड्यूटी और व्यापार को आसान बनाने के लिए भी कदम उठाए गए हैं। निर्यात प्रतिस्पर्धा सिर्फ उत्पादन और लॉजिस्टिक्स पर ही निर्भर नहीं करती, बल्कि सीमा पर मिलने वाले अनुभव से भी तय होती है। कस्टम ड्यूटी को आसान बनाना, फालतू शुल्क हटाना और इनपुट पर ड्यूटी कम करने का मकसद भी अनिश्चितता को कम करना है। जब शुल्क की व्यवस्था बहुत जटिल होती है, तो कंपनियां भविष्य की लागत का सही अंदाज़ा नहीं लगा पातीं। कस्टम प्रक्रिया में भरोसे पर आधारित सिस्टम, पहले से लिए गए फैसलों की मान्यता, तेज़ी से क्लीयरेंस और जोखिम के आधार पर जांच निर्यातकों के लिए बहुत ज़रूरी है। व्यापार में माल के औसत क्लीयरेंस टाइम से ज़्यादा उसकी अनिश्चितता मायने रखती है। अगर किसी कंपनी को यह पता ही नहीं कि उसका माल कहां और कब रुकेगा या किस वजह से रुकेगा, तो वह ग्लोबल सप्लाई चेन का हिस्सा कैसे बन पाएगी? इन सुधारों से नतीजों को पहले से जानने में मदद मिलेगी।
इस बजट का असर GDP के आंकड़ों में तुरंत नहीं दिखेगा। यह तब दिखेगा जब ज़्यादा भारतीय कंपनियां निर्यात शुरू करेंगी, वैश्विक बाज़ार में अपनी जगह बनाएंगी और भारत को एक भरोसेमंद निर्यातक के तौर पर देखा जाएगा। इतिहास गवाह है कि किसी भी मज़बूत उद्योग की नींव अनिश्चितताओं को समझदारी से संभालने में ही होती है। यह बजट भी इसी दिशा में एक गंभीर और ठोस प्रयास है।