Jhadan Symbol Of Neglect Stagnation And Inactivity Know Its Deep Meaning
झाड़न हटा दो
Contributed by: दिलीप लाल|नवभारत टाइम्स•
झाड़न शब्द का अर्थ है धूल, गर्द और मैल। यह सफाई के बाद निकली गंदगी है। लंबे समय तक सफाई न होने पर झाड़न जम जाती है। यह उपेक्षा और ठहराव का संकेत है। मूल क्रिया 'झाड़ना' से बना यह शब्द भारतीय भाषाओं में अलग-अलग नामों से मौजूद है। यह हटती है तो ताजगी देती है।
झाड़न, जो सुनने में भले ही एक आम शब्द लगे, असल में हमारे जीवन से गहराई से जुड़ा है। इसका सीधा मतलब है धूल, गर्द और मैल। सफाई के बाद जो गंदगी निकलती है, उसे ही झाड़न कहते हैं। झाड़ू लगाने से निकलने वाली धूल-मिट्टी भी झाड़न ही है। कभी-कभी तो धूल-मिट्टी झाड़ने वाले कपड़े को भी झाड़न कह दिया जाता है। जब हम कहते हैं कि किसी कमरे, किताब या फाइल पर झाड़न जम गई है, तो इसका मतलब है कि उसे बहुत समय से साफ नहीं किया गया है। इस तरह, झाड़न उपेक्षा, ठहराव और निष्क्रियता का प्रतीक बन जाती है। यह शब्द मूल क्रिया 'झाड़ना' से बना है, जिसका अर्थ है साफ करना या गंदगी हटाना। संस्कृत में यह शब्द सीधे तौर पर नहीं मिलता, लेकिन इसके भाव को समझने के लिए संस्कृत के शब्द 'धूलि' और 'रजः' (धूल और मैल के लिए) और 'मार्जन' व 'अपमार्जन' (सफाई की क्रिया के लिए) को देखा जा सकता है। लोकभाषाओं में यही 'मार्जन' सरल होकर 'झाड़ना' बन गया। भारतीय भाषाओं में झाड़न के अलग-अलग नाम हैं, जैसे कहीं 'धूल', कहीं 'गुबार', बांग्ला में 'धुलो' और तमिल में 'तूसी'। यह हटती है तो ताजगी ले आती है।
झाड़न का सीधा संबंध सफाई से है। जब हम किसी चीज को साफ करते हैं, तो जो गंदगी निकलती है, वही झाड़न कहलाती है। यह सिर्फ धूल-मिट्टी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह किसी भी तरह की अशुद्धि या मैल हो सकती है जिसे हम हटाते हैं। उदाहरण के लिए, अगर किसी किताब पर धूल की मोटी परत जम गई है, तो हम कहेंगे कि उस पर झाड़न जम गई है। इसका मतलब है कि किताब की देखभाल नहीं की गई।यह शब्द हमें यह भी सिखाता है कि अगर हम चीजों की नियमित सफाई न करें, तो वे उपेक्षित हो जाती हैं। झाड़न का जमना इस बात का संकेत है कि कोई चीज लंबे समय से इस्तेमाल नहीं हुई है या उसकी देखभाल नहीं की गई है। यह एक तरह का ठहराव और निष्क्रियता को दर्शाता है। जैसे किसी पुरानी अलमारी में रखी किताबों पर झाड़न जम जाती है, वैसे ही अगर हम अपने जीवन में कुछ नया न करें, तो हम भी निष्क्रियता की झाड़न में फंस सकते हैं।
'झाड़न' शब्द की जड़ें संस्कृत में हैं, भले ही यह सीधे तौर पर वहां न मिले। संस्कृत में धूल के लिए 'धूलि' और 'रजः' जैसे शब्द हैं। सफाई की क्रिया के लिए 'मार्जन' और 'अपमार्जन' जैसे शब्दों का प्रयोग होता है। समय के साथ, लोकभाषाओं में यही 'मार्जन' शब्द सरल होकर 'झाड़ना' बन गया। यह दिखाता है कि कैसे भाषाएं बदलती हैं और नए शब्द बनते हैं।
भारतीय भाषाओं में झाड़न के कई नाम हैं। हर भाषा में इसे अलग-अलग तरह से पुकारा जाता है। जैसे, कहीं इसे 'धूल' कहते हैं, कहीं 'गुबार'। बांग्ला में यह 'धुलो' है, तो तमिल में 'तूसी'। यह विविधता दिखाती है कि सफाई और गंदगी का अनुभव हर जगह एक जैसा है, बस नाम अलग हैं। जब यह झाड़न हटती है, तो एक नई ताजगी आती है। यह हमें याद दिलाता है कि सफाई सिर्फ भौतिक नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक भी हो सकती है।