Bangladesh Needs Indias Support Hope For New Relations After Elections
बांग्लादेश को चाहिए भारत का साथ
नवभारत टाइम्स•
बांग्लादेश में हुए चुनावों ने भारत के साथ संबंधों को नई दिशा दी है। नई सरकार के गठन से राजनीतिक स्थिरता की उम्मीद है। बांग्लादेश की आर्थिक स्थिति को देखते हुए भारत का सहयोग महत्वपूर्ण होगा। दोनों देशों के बीच सुरक्षा और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी जैसे मुद्दे अहम रहेंगे। नई दिल्ली को भी सहयोग बढ़ाना चाहिए।
बांग्लादेश में हाल ही में हुए चुनावों ने दक्षिण एशिया की राजनीति में एक नया अध्याय खोला है, जिससे वहां राजनीतिक पुनर्निर्माण और भारत-बांग्लादेश संबंधों में नई शुरुआत की उम्मीद जगी है। लंबे समय की राजनीतिक अनिश्चितता के बाद आई निर्वाचित सरकार से संस्थागत स्थिरता और क्षेत्रीय विश्वास मजबूत होने की आशा है। बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी (BNP) को मिले स्पष्ट जनादेश के पीछे अवामी लीग को चुनावी प्रक्रिया से बाहर रखा जाना एक अहम कारण रहा। चुनाव से पहले BNP नेता तारिक रहमान ने भारत के प्रति सकारात्मक संदेश दिया, जो इस बात का संकेत है कि BNP भी समझती है कि बांग्लादेश की तरक्की भारत के साथ अच्छे संबंधों पर निर्भर करती है। हालांकि, 2001 से 2006 के दौरान खालिदा जिया के नेतृत्व में BNP के भारत विरोधी रुख की यादें भी ताजा हैं, पर यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि इतिहास दोहराया जाएगा।
साल 2000 के बाद से दक्षिण एशिया की आर्थिक और भू-राजनीतिक तस्वीर काफी बदल गई है। भारत इस क्षेत्र की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बनकर उभरा है और पड़ोसी देशों के लिए विकास का एक बड़ा इंजन माना जा रहा है। वहीं, बांग्लादेश इस समय आर्थिक दबाव झेल रहा है। उसका बाहरी कर्ज 100 अरब डॉलर से अधिक हो गया है और विदेशी मुद्रा भंडार पिछले चार सालों में लगभग आधा रह गया है। ऐसे में, बांग्लादेश के लिए क्षेत्रीय सहयोग बहुत जरूरी हो गया है।बांग्लादेश की स्थिरता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि क्या BNP सिर्फ अपनी चुनावी जीत पर निर्भर रहने के बजाय 1971 के मुक्ति संग्राम की भावना को साथ लेकर एक बड़ा और समावेशी गठबंधन बना पाती है। इस चुनाव में जमात-ए-इस्लामी ने भी अब तक का सबसे शानदार प्रदर्शन किया है। नैशनल सिटीजन पार्टी (NCP), जो जुलाई 2024 के आंदोलन से निकली है, भी इस गठबंधन का हिस्सा थी, हालांकि इसका प्रदर्शन उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहा।
आने वाले महीनों में यह साफ हो जाएगा कि क्या BNP ऐसी नीतियां बना पाती है जो वैचारिक दबावों और आर्थिक जरूरतों के बीच संतुलन साध सकें। चुनाव प्रचार के दौरान तारिक रहमान ने भारत को लेकर भले ही सकारात्मक बातें कही हों, लेकिन उनकी असली परीक्षा नीतिगत फैसलों से ही होगी।
बांग्लादेश की आर्थिक महत्वाकांक्षाएं, जैसे निवेशकों का भरोसा वापस लाना, अर्थव्यवस्था को स्थिर करना और बेरोजगारी से निपटना, सीधे तौर पर क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और व्यापार से जुड़ी हैं। दक्षिण एशिया में भारत की बढ़ती आर्थिक भूमिका बांग्लादेशी नेतृत्व के लिए ऐसे अवसर प्रदान करती है जिनका वह फायदा उठा सकता है। इस तरह, भारत के साथ करीबी सहयोग सिर्फ एक कूटनीतिक लक्ष्य नहीं, बल्कि घरेलू राजनीति को मजबूत करने का एक जरिया भी बन सकता है।
बांग्लादेश पर भारत की नीति जल्दबाजी में नहीं बदलती; यह स्थिरता और लंबे समय के हितों पर केंद्रित रहती है। दोनों देशों की सीमाएं आपस में गहराई से जुड़ी हुई हैं और उनके बीच व्यापार, आर्थिक रिश्ते और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे साझा हैं। जब रिश्ते एक नए दौर में प्रवेश कर रहे हैं, तो सुरक्षा, कट्टरपंथ को रोकने के प्रयास और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी जैसे मुद्दे अहम रहेंगे।
बांग्लादेश को पाकिस्तान की भारत के खिलाफ किसी भी साजिश का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। इसी तरह, बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा दोनों देशों के रिश्तों पर असर डालती है। अगर नई सरकार भारत की चिंताओं पर ध्यान देती है, तो नई दिल्ली को भी उसी के अनुरूप सहयोग बढ़ाना चाहिए। इस चुनाव का महत्व केवल जीत के बड़े अंतर में नहीं, बल्कि उसके बाद लिए जाने वाले राजनीतिक फैसलों में छिपा है। बांग्लादेश एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां सरकार के निर्णय तय करेंगे कि यह राजनीतिक बदलाव देश को नई स्थिरता की ओर ले जाएगा या फिर बिखराव की स्थिति पैदा करेगा।
हाल ही में बांग्लादेश में हुए चुनावों ने दक्षिण एशिया की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ ला दिया है। इन चुनावों के नतीजों से वहां राजनीतिक पुनर्निर्माण का एक नया अवसर पैदा हुआ है। साथ ही, भारत और बांग्लादेश के संबंधों में भी एक नई शुरुआत की उम्मीद जगी है। लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक अनिश्चितता और अंतरिम सरकार के मुश्किल दौर के बाद, अब वहां एक निर्वाचित सरकार आई है। इससे देश में संस्थागत स्थिरता बहाल होने और क्षेत्रीय स्तर पर विश्वास को मजबूती मिलने की उम्मीद है।
बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी (BNP) को इस चुनाव में स्पष्ट जनादेश मिला है। इसके पीछे एक अहम कारण यह भी रहा कि अवामी लीग को चुनावी प्रक्रिया से बाहर रखा गया था। यह एक महत्वपूर्ण बात है कि चुनावों से पहले BNP नेता तारिक रहमान ने भारत को लेकर सकारात्मक संदेश दिया था। BNP इस बात को अच्छी तरह समझती है कि बांग्लादेश की प्रगति भारत के साथ रचनात्मक संबंधों पर निर्भर करती है। हालांकि, हमें इस पार्टी के पिछले शासनकाल की यादें भी ताजा हैं, जो बहुत अच्छी नहीं रहीं। 2001 से 2006 के शासनकाल में तारिक रहमान की मां खालिदा जिया के नेतृत्व में BNP ने भारत विरोधी कदम उठाए थे। फिर भी, यह मान लेना सही नहीं होगा कि अतीत दोहराया जाएगा।
साल 2000 के शुरुआती दौर के बाद से दक्षिण एशिया की आर्थिक और भू-राजनीतिक तस्वीर काफी बदल चुकी है। भारत इस क्षेत्र की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा है। उसे पड़ोसी देशों के लिए विकास के एक बड़े इंजन के तौर पर देखा जा रहा है। दूसरी ओर, बांग्लादेश इस समय आर्थिक दबाव में है। उसका बाहरी कर्ज 100 अरब डॉलर से भी ज्यादा हो चुका है। विदेशी मुद्रा भंडार पिछले चार सालों में लगभग आधा रह गया है। ऐसी स्थिति में, उसके लिए क्षेत्रीय सहयोग अत्यंत आवश्यक है।
बांग्लादेश की स्थिरता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि क्या BNP सिर्फ अपनी चुनावी जीत पर भरोसा करने के बजाय 1971 के मुक्ति संग्राम की भावना को साथ लेकर एक बड़ा और व्यापक गठबंधन बनाने में सफल हो पाती है। इस चुनाव में जमात-ए-इस्लामी ने भी अब तक का अपना सबसे शानदार प्रदर्शन किया है। इस गठबंधन में नैशनल सिटीजन पार्टी (NCP) भी शामिल थी। यह पार्टी जुलाई 2024 के आंदोलन से निकली थी। हालांकि, इसका प्रदर्शन उम्मीदों के मुताबिक नहीं रहा।
आने वाले महीनों में यह स्पष्ट हो जाएगा कि क्या BNP ऐसी नीति बना पाती है, जो वैचारिक दबावों और आर्थिक जरूरतों के बीच संतुलन स्थापित कर सके। चुनाव प्रचार के दौरान तारिक रहमान ने भारत को लेकर सकारात्मक भाषा का इस्तेमाल किया था, लेकिन उनकी असली परीक्षा नीतिगत फैसलों से ही होगी।
बांग्लादेश की आर्थिक महत्वाकांक्षाएं, जैसे निवेशकों का भरोसा वापस लाना, अर्थव्यवस्था को स्थिर करना और बेरोजगारी की समस्या से निपटना, सीधे तौर पर क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और व्यापार से जुड़ी हुई हैं। दक्षिण एशिया में भारत की बढ़ती आर्थिक भूमिका ऐसे अवसर प्रदान करती है, जिनका फायदा बांग्लादेशी नेतृत्व उठा सकता है। इस प्रकार देखा जाए तो भारत के साथ करीबी सहयोग केवल एक कूटनीतिक लक्ष्य नहीं है, बल्कि यह घरेलू राजनीति को मजबूत करने का एक साधन भी बन सकता है।
बांग्लादेश पर भारत की नीति में जल्दबाजी नहीं होती; यह स्थिरता और लंबे समय के हितों पर ध्यान केंद्रित करती है। दोनों देशों की सीमाएं आपस में गहराई से जुड़ी हुई हैं। दोनों के बीच व्यापार, आर्थिक रिश्ते और सुरक्षा से जुड़े मुद्दे साझा हैं। जब रिश्ते एक नए दौर में प्रवेश कर रहे हैं, तो सुरक्षा, कट्टरपंथ को रोकने के प्रयास और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी जैसे मुद्दे अत्यंत महत्वपूर्ण रहेंगे।
बांग्लादेश को पाकिस्तान की भारत के खिलाफ किसी भी साजिश का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। इसी तरह, बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों की सुरक्षा दोनों देशों के रिश्तों पर गहरा असर डालती है। अगर नई सरकार भारत की चिंताओं पर ध्यान देती है, तो नई दिल्ली को भी उसी के अनुरूप अपना सहयोग बढ़ाना चाहिए। इस चुनाव का महत्व केवल जीत के बड़े अंतर में नहीं छिपा है, बल्कि उसके बाद लिए जाने वाले राजनीतिक फैसलों में छिपा है। बांग्लादेश एक ऐसे मोड़ पर है, जहां सरकार के निर्णय यह तय करेंगे कि यह राजनीतिक बदलाव देश को नई स्थिरता की ओर ले जाएगा या फिर बिखराव की स्थिति पैदा करेगा।