लाइसेंस-परमिट राज के अवशेष ख़त्म करने होंगे

नवभारत टाइम्स

भारत को अपने जटिल नियमों और कम प्रतिस्पर्धा को दूर करना होगा। औद्योगिक विकास के लिए विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देना जरूरी है। पर्यटन और कृषि में सुधार से रोजगार बढ़ेगा। नौकरशाही कम करने और प्रशासनिक सुधारों से भारत वैश्विक व्यापार समझौतों का लाभ उठा सकेगा। यह देश के विकास के लिए महत्वपूर्ण कदम होंगे।

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भारत और अमेरिका के बीच भले ही व्यापार समझौते पर बात बन गई हो, लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा लगाए गए टैरिफ (आयात शुल्क) के झटके को नहीं भूलना चाहिए। इस झटके ने भारत सरकार को यह अहसास कराया कि देश का सिस्टम बहुत पेचीदा है, नियमों का जाल बिछा है और प्रतिस्पर्धा बहुत कम है। इसी वजह से भारत औद्योगिक विकास में पिछड़ रहा है। आज भी 45% आबादी खेती पर निर्भर है, दुनिया के व्यापार में हमारी हिस्सेदारी सिर्फ 2% है और विदेशी पर्यटक भी बहुत कम आते हैं। चीन से कंपनियां भले ही निकल रही हों, लेकिन वे वियतनाम जा रही हैं, भारत नहीं। यह सच है कि लोकतंत्र में बड़े बदलाव तुरंत नहीं होते, पर कई छोटी-मोटी समस्याएं आसानी से सुलझाई जा सकती हैं।

भारत में कारोबार करना आसान नहीं है। कंपनियों को हजारों नियमों का पालन करना पड़ता है, जिससे उनका काम मुश्किल हो जाता है। एक बड़ी समिति ने सुझाव दिया है कि कई लाइसेंस, परमिट और एनओसी (अनापत्ति प्रमाण पत्र) को खत्म कर देना चाहिए। साथ ही, सभी प्रक्रियाओं को ऑनलाइन करने की भी तैयारी है। यह कदम कारोबार को आसान बनाने में मदद करेगा।
भारत की सबसे बड़ी जरूरत है कि संगठित क्षेत्र में ज्यादा से ज्यादा नौकरियां पैदा हों। इसके लिए मैन्युफैक्चरिंग (सामान बनाने का उद्योग) बहुत महत्वपूर्ण है। अमेरिकी कंपनी एपल का भारत में निवेश इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। आज दुनिया में बिकने वाले हर पांच में से एक आईफोन भारत में बनता है। इससे 2 लाख लोगों को रोजगार मिला है, जिनमें से 75% महिलाएं हैं। जब वियतनाम को एपल की इस योजना के बारे में पता चला, तो वहां के प्रधानमंत्री ने अमेरिकी कंपनी से अपने देश में आईपैड बनाने का अनुरोध किया। भारत के राज्यों को भी इससे सीखना चाहिए और अपने यहां मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स लाने के लिए एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए।

पर्यटन भी रोजगार का एक बड़ा जरिया है। लेकिन, भारत में थाईलैंड जैसे छोटे देशों की तुलना में भी कम विदेशी पर्यटक आते हैं। वहां छुट्टियां बिताना सस्ता पड़ता है। भारत में नियम-कानून बहुत सख्त हैं। उदाहरण के लिए, भारत में होटल खोलने के लिए करीब 98 तरह की मंजूरी लेनी पड़ती है, जबकि दूसरे देशों में सिर्फ 7 से 20 मंजूरियां ही काफी होती हैं।

खेती के क्षेत्र में भी कई दिक्कतें हैं। भारत में लगभग एक-तिहाई फल और सब्जियां कटाई के बाद खराब हो जाती हैं। इससे किसानों को हर साल करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होता है। विदेशों में कोल्ड स्टोरेज (ठंडा गोदाम) की अच्छी व्यवस्था होती है, जिससे सामान खराब नहीं होता।

नौकरशाही (सरकारी अफसरों का तंत्र) को कम करने की भी जरूरत है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) भी नियमों का बोझ कम कर रहा है। इसके अलावा, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में भी नौकरशाही को कम करने की दरकार है। प्रशासनिक और न्यायिक सुधार, घाटे में चल रहे सरकारी उपक्रमों (PSU) का निजीकरण, श्रम, पूंजी और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में बदलाव लाना बहुत जरूरी है। अगर ये कदम उठाए गए, तो भारत वैश्विक व्यापार समझौतों से मिले मौकों का पूरा फायदा उठा सकता है।

ट्रंप टैरिफ के दर्द ने हमें सिखाया कि हमारा सिस्टम जटिल, अत्यधिक नियमों वाला और कम प्रतिस्पर्धी है। इसी वजह से भारत औद्योगिक विकास में पीछे है। 45% लोग अब भी खेती के भरोसे हैं, वैश्विक व्यापार में हिस्सेदारी सिर्फ 2% है और बहुत कम विदेशी पर्यटक यहां आते हैं। बड़ा घरेलू बाजार होने के बावजूद चीन छोड़ने वाली कंपनियां वियतनाम जा रही हैं। इसमें संदेह नहीं कि लोकतंत्र में बड़े सुधार तुरंत नहीं होते, लेकिन कई समस्याएं आसानी से ठीक की जा सकती हैं।

भारत में कंपनियों को हजारों कानून मानने पड़ते हैं, जिससे कारोबार मुश्किल हो जाता है। एक उच्चस्तरीय समिति ने कई लाइसेंस, परमिट और NOC खत्म करने का सुझाव दिया है। साथ ही सभी प्रक्रियाएं ऑनलाइन करने की तैयारी है।

भारत की सबसे बड़ी जरूरत संगठित क्षेत्र में रोजगार बढ़ाना है। इसके लिए मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र अहम है। इस क्षेत्र में अमेरिकी कंपनी एपल का भारत में निवेश बेहद कामयाब रहा है। आज हर पांच में एक आईफोन भारत में बन रहा है, जिससे 2 लाख लोगों को नौकरी मिली है। इनमें भी 75% महिलाएं हैं। वियतनाम को जब एपल के इस प्लान का पता चला तो वहां के प्रधानमंत्री ने अमेरिकी कंपनी से उनके यहां आईपैड बनाने का अनुरोध किया। भारत के राज्य इससे सीख सकते हैं। अपने यहां मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स लाने के लिए प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए।

पर्यटन में रोजगार के बहुत मौके होते हैं। लेकिन, भारत में थाईलैंड जैसे छोटे देशों की तुलना में कम विदेशी पर्यटक आते हैं। वहां छुट्टियां मनाना सस्ता पड़ता है। भारत में नियम-कानून ज्यादा कड़े हैं। यहां होटल खोलने के लिए लगभग 98 तरह की मंजूरी लेनी पड़ती है, जबकि दूसरे देशों में सिर्फ 7-20 मंजूरियां काफी हैं।

कृषि क्षेत्र में भी दिक्कतें हैं। भारत में करीब एक-तिहाई फल और सब्जियां तुड़ाई-कटाई के बाद खराब हो जाती हैं। इससे किसानों को हर साल लगभग 1.5 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होता है। विदेश में कोल्ड स्टोरेज की अच्छी व्यवस्था है, जिससे सामान खराब नहीं होता।

RBI भी नियमों का बोझ कम कर रहा है। इसके अलावा, शिक्षा और स्वास्थ्य में भी नौकरशाही कम करने की दरकार है। प्रशासनिक व न्यायिक सुधार, घाटे वाले PSU का निजीकरण, श्रम, पूंजी और ऊर्जा क्षेत्रों में बदलाव जरूरी हैं। अगर ये कदम उठाए गए, तो भारत वैश्विक व्यापार समझौतों से मिले मौके का पूरा लाभ उठा सकता है।