Rahul Gandhis New Foreign Policy The Gamble Of Foreign Politics At Home
राहुल की घर में विदेश वाली राजनीति
नवभारत टाइम्स•
राहुल गांधी अब मोदी सरकार की विदेश नीति पर सीधा हमला कर रहे हैं। वह सरकार पर वैश्विक शक्तियों के दबाव में काम करने का आरोप लगा रहे हैं। डेटा वॉर और एपस्टीन फाइल जैसे मुद्दों को उठाकर वह सरकार की नीतियों पर सवाल उठा रहे हैं।
राहुल गांधी अब सिर्फ सरकार की आलोचना नहीं कर रहे, बल्कि विदेश नीति जैसे मोदी सरकार के मजबूत माने जाने वाले पक्ष पर सीधा हमला बोल रहे हैं। वे चीन-अमेरिका की रस्साकशी, डेटा वॉर और एपस्टीन फाइल जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दों को उठाकर सरकार की विदेश नीति को कमजोर और दबाव में दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। यह कांग्रेस की नई रणनीति है, जिसका मकसद मोदी सरकार की उस छवि को तोड़ना है, जिसमें वे भारत को एक उभरती हुई महाशक्ति के रूप में पेश करते हैं।
कांग्रेस के रणनीतिकारों का मानना है कि पिछले एक दशक में मोदी सरकार ने विदेश नीति को सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे एक राजनीतिक नैरेटिव में बदल दिया। 'ऑपरेशन सिंदूर' और रूस-यूक्रेन युद्ध में पीएम मोदी के शांति प्रयासों जैसे मुद्दों को भुनाकर उन्होंने एक ऐसी तस्वीर बनाई, जिसमें भारत पीएम मोदी के नेतृत्व में एक उभरती हुई महाशक्ति के रूप में दिखा। कांग्रेस के रणनीतिकारों के अनुसार, यही नैरेटिव सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनी। अब राहुल गांधी इसी ताकत पर चोट कर रहे हैं।राहुल गांधी की नई रणनीति यह है कि वे सिर्फ यह नहीं कह रहे कि सरकार की विदेश नीति गलत है, बल्कि वे सीधे तौर पर यह आरोप लगा रहे हैं कि सरकार की विदेश नीति स्वतंत्र नहीं है, बल्कि वैश्विक शक्तियों के दबाव में काम कर रही है। उदाहरण के लिए, रूस और अमेरिका के बीच चल रही खींचतान के बीच, राहुल गांधी वॉशिंगटन के इस दावे को सही ठहरा रहे हैं कि भारत अब मॉस्को से तेल नहीं खरीद रहा है। इसके जरिए वे यह दिखाना चाहते हैं कि भारत एक स्वतंत्र शक्ति के तौर पर संतुलन नहीं बना पा रहा है।
मोदी सरकार ने विदेश नीति को घरेलू राजनीति का हिस्सा बना दिया है। ये मुद्दे अब चुनावी राजनीति के प्रतीक बन गए हैं। राहुल गांधी इन प्रतीकों को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। वे यह दिखाना चाहते हैं कि ये सब सिर्फ दिखावा है, कोई असली रणनीतिक शक्ति नहीं।
इस नई रणनीति में कुछ जोखिम भी हैं। 'डेटा वॉर' का मुद्दा भी इसी का हिस्सा है। आज के समय में डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, क्लाउड सिस्टम, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और साइबर सुरक्षा देश की सुरक्षा के नए पहलू बन गए हैं। जब राहुल गांधी कहते हैं कि भारतीय डेटा एक महत्वपूर्ण संपत्ति है और इसे ट्रेड डील या अंतरराष्ट्रीय समझौतों में गिरवी रखा जा रहा है, तो वे सरकार की उस नीति पर सवाल उठाते हैं। वे यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में भारत वैश्विक शक्तियों के दबाव में अपने हितों से समझौता कर रहा है।
एपस्टीन फाइल जैसे अंतरराष्ट्रीय संदर्भों का इस्तेमाल करके भी राहुल गांधी एक नया दांव खेल रहे हैं। वे एपस्टीन फाइल में सरकार के मंत्रियों के नाम आने का आरोप लगाकर यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि सरकार ने किसी दबाव में आकर ट्रेड डील की है।
चीन के मुद्दे पर भी राहुल गांधी की भाषा इसी दिशा में है। वे यह संदेश देना चाहते हैं कि सरकार निर्णय लेने में हिचकिचाती है। इससे वे सरकार की नेतृत्व वाली छवि पर सवाल खड़ा करते हैं। हालांकि, राजनीतिक रूप से यह एक बड़ा जोखिम है। विदेश नीति, सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे लोगों की भावनाओं से जुड़े होते हैं। इन मुद्दों पर सरकार के पास संस्थागत और नैरेटिव, दोनों तरह की मजबूत पकड़ होती है। अब यह देखना बाकी है कि राहुल गांधी किस हद तक लोगों के बीच विदेश नीति और प्रधानमंत्री की ग्लोबल इमेज पर प्रभावी ढंग से प्रहार कर पाते हैं, या फिर उनका यह दांव उल्टा पड़ जाता है।
राहुल गांधी की यह नई चाल मोदी सरकार के उस मजबूत पक्ष पर हमला है, जिसे वे अपनी सबसे बड़ी ताकत मानते आए हैं। वे विदेश नीति को सिर्फ कूटनीतिक दांव-पेंच से निकालकर एक बड़े राजनीतिक मुद्दे में बदल रहे हैं। वे यह दिखाना चाहते हैं कि भारत की विदेश नीति स्वतंत्र नहीं, बल्कि वैश्विक शक्तियों के इशारों पर चल रही है।
उदाहरण के तौर पर, रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारत का रूस से तेल खरीदना एक संवेदनशील मुद्दा रहा है। राहुल गांधी इस बात को उठा रहे हैं कि भारत अब मॉस्को से तेल नहीं खरीद रहा है, और इसे वे इस बात का सबूत मानते हैं कि भारत वैश्विक शक्तियों के दबाव में है और स्वतंत्र रूप से संतुलन नहीं बना पा रहा है।
'डेटा वॉर' जैसे मुद्दे को उठाकर राहुल गांधी यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि भारत की डिजिटल संपत्ति को अंतरराष्ट्रीय समझौतों में दांव पर लगाया जा रहा है। वे यह आरोप लगा रहे हैं कि सरकार की नीतियों के कारण भारत के हित खतरे में पड़ रहे हैं।
एपस्टीन फाइल जैसे अंतरराष्ट्रीय संदर्भों का इस्तेमाल करके राहुल गांधी यह संदेश दे रहे हैं कि सरकार पर किसी तरह का दबाव है, जिसके चलते वह ट्रेड डील जैसे फैसले ले रही है। वे मंत्रियों के नाम का जिक्र करके सरकार की मंशा पर सवाल उठा रहे हैं।
चीन के मुद्दे पर राहुल गांधी की आलोचना का तरीका भी यही है कि वे सरकार पर निर्णय लेने में हिचकिचाने का आरोप लगा रहे हैं। इससे वे सरकार की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठा रहे हैं।
यह रणनीति कांग्रेस के लिए जोखिम भरी हो सकती है, क्योंकि विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे लोगों की भावनाओं से जुड़े होते हैं। सरकार के पास इन मुद्दों पर मजबूत पकड़ होती है। अब देखना यह है कि राहुल गांधी इस मुद्दे को जनता के बीच कितना प्रभावी ढंग से ले जा पाते हैं और क्या वे मोदी सरकार की ग्लोबल इमेज को चुनौती दे पाते हैं।