मित्र के लिए त्याग

नवभारत टाइम्स

पाटलिपुत्र में कौटिल्य ने चंद्रगुप्त मौर्य का राज्याभिषेक करवाया। धनानंद के मंत्री अमात्य को पकड़ने के प्रयास में उसके मित्र चंदनदास को पकड़ा गया। मित्र को बचाने के लिए अमात्य सामने आया। कौटिल्य ने उसे चंद्रगुप्त के प्रति निष्ठा की शपथ लेने को कहा। अमात्य ने शपथ ली और राज्य की सेवा स्वीकार की।

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पाटलिपुत्र में नंदवंश के अंत के बाद, कौटिल्य ने चंद्रगुप्त मौर्य का राज्याभिषेक उसी महल में करवाया जहाँ कभी उनका अपमान हुआ था। यह सिर्फ सत्ता का बदलना नहीं था, बल्कि एक संकल्प की जीत थी। राज्याभिषेक के समय, कौटिल्य ने अपनी खुली चोटी दिखाते हुए कहा कि राज्य तब तक पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो सकता जब तक धनानंद का वफादार मंत्री अमात्य उनके अधीन न आ जाए। अमात्य को खोजने के आदेश दिए गए, लेकिन वह नहीं मिला। हालांकि, उसका करीबी दोस्त चंदनदास पकड़ा गया। दोस्ती निभाते हुए, चंदनदास ने अमात्य का ठिकाना बताने से इनकार कर दिया। कौटिल्य ने उसे मौत की सज़ा सुनाई और इसकी घोषणा करवाई। जब यह खबर अमात्य तक पहुंची, तो वह खुद सामने आया और अपने दोस्त की जान बचाने की गुहार लगाई। कौटिल्य ने शर्त रखी कि अमात्य चंद्रगुप्त के प्रति वफादारी की कसम खाए। अमात्य ने शक जताया कि पूर्व शत्रु का मंत्री होने के नाते उस पर भरोसा कैसे किया जा सकता है। कौटिल्य ने जवाब दिया, "सच्ची निष्ठा ही विश्वास का आधार है।" आखिरकार, अपने दोस्त को बचाने के लिए अमात्य ने कसम खाई और राज्य की सेवा स्वीकार की।

यह घटना सिर्फ एक राजा का बदलना नहीं थी, बल्कि यह दिखाती है कि कैसे कौटिल्य ने अपनी बुद्धि और दृढ़ संकल्प से चंद्रगुप्त मौर्य को सत्ता दिलाई। पाटलिपुत्र का वही महल, जहाँ कभी कौटिल्य को नंद राजा धनानंद ने अपमानित किया था, अब चंद्रगुप्त मौर्य के राज्याभिषेक का गवाह बना। यह कौटिल्य के लिए व्यक्तिगत अपमान का बदला भी था और एक मजबूत साम्राज्य की नींव रखने का संकल्प भी।
कौटिल्य जानते थे कि असली खतरा अभी टला नहीं है। उन्होंने अपनी खुली चोटी की ओर इशारा करते हुए कहा, "राज्य तब तक पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो सकता, जब तक धनानंद का निष्ठावान मंत्री अमात्य उनके अधीन न आ जाए।" अमात्य को पकड़ने के लिए फौरन आदेश दिए गए, लेकिन वह चालाक निकला और हाथ नहीं आया।

हालांकि, अमात्य का एक करीबी दोस्त चंदनदास पकड़ा गया। चंदनदास ने अपनी दोस्ती निभाई और अमात्य का पता बताने से साफ इनकार कर दिया। कौटिल्य ने चंदनदास को मौत की सज़ा सुना दी। इस खबर ने अमात्य को हिला दिया। वह अपने दोस्त की जान बचाने के लिए खुद सामने आ गया।

कौटिल्य ने अमात्य के सामने एक शर्त रखी। उन्होंने कहा कि अगर वह चंद्रगुप्त मौर्य के प्रति पूरी वफादारी की कसम खाए, तभी उसके दोस्त की जान बख्शी जाएगी। अमात्य को शक हुआ। उसने पूछा, "पूर्व शत्रु का मंत्री होने की वजह से उस पर विश्वास कैसे होगा?" कौटिल्य ने इसका सीधा जवाब दिया, "सच्ची निष्ठा ही विश्वास का आधार है।"

आखिरकार, अपने प्यारे दोस्त की जान बचाने के लिए अमात्य ने चंद्रगुप्त मौर्य के प्रति निष्ठा की शपथ ली और राज्य की सेवा स्वीकार कर ली। इस तरह, कौटिल्य ने न केवल एक शक्तिशाली दुश्मन को अपने साथ मिलाया, बल्कि अपनी बुद्धिमत्ता से राज्य को और भी मजबूत बनाया। यह कहानी हमें सिखाती है कि दोस्ती और वफादारी कितनी बड़ी ताकत हो सकती है।