Balloon Holi Overtakes Lathmar Holi Holis Colors Change In Delhi
लठमार पर भारी गुब्बारों की होली
Contributed by: क्षमा शर्मा|नवभारत टाइम्स•
लेखिका ब्रज की लठमार होली का वर्णन करती हैं। दिल्ली आने पर उन्होंने गुब्बारों से होली खेलने का अनुभव किया। एक दिन बस स्टैंड पर रंगीन गुब्बारों से होली खेलने वाले लड़कों ने उन्हें परेशान किया। लेखिका का कहना है कि होली का आनंद लें पर किसी को परेशान न करें।
ब्रज की लठमार होली की यादों के साथ दिल्ली में गुब्बारे वाली होली का अनुभव साझा करते हुए लेखिका ने बताया कि कैसे सत्तर के दशक में दिल्ली आने पर उन्हें होली के दौरान बस स्टैंड पर रंगीन गुब्बारों से भीगने का अप्रिय अनुभव हुआ। यह घटना तब हुई जब वे एक कॉलेज के पास बस का इंतज़ार कर रही थीं और कॉलेज के बाहर खड़े रंगीन कपड़ों वाले लड़कों ने बस में घुसकर यात्रियों पर गुब्बारे फोड़े, जिससे लेखिका पूरी तरह भीग गईं और उन्हें अगले स्टॉप पर उतरना पड़ा। लेखिका आज भी रंग खेलने वालों से यह अपील करती हैं कि वे होली का आनंद लें, पर किसी को परेशान न करें।
लेखिका अपने पैतृक ब्रज प्रदेश की मशहूर लठमार होली का ज़िक्र करते हुए बताती हैं कि वहां होली के दूसरे दिन सुबह महिलाएं पुराने कपड़ों से कोड़े बनाती थीं। जब रंग खेलने वाले, जिन्हें 'हुरियारे' कहा जाता था, रंग और कीचड़ फेंकते थे, तो महिलाएं उन्हीं कोड़ों से उनकी पिटाई करती थीं। मज़े की बात यह थी कि पिटने के बावजूद हुरियारे खिलखिलाते रहते थे। यह होली का एक ऐसा रूप था जहाँ मज़ाक और शरारत के साथ-साथ एक परंपरा भी जुड़ी थी।सत्तर के दशक में दिल्ली आने के बाद लेखिका ने होली का एक बिल्कुल अलग रूप देखा, जिसे 'गुब्बारे मारने वाली होली' कहा जाता था। यह होली का रंगारंग खेल होली से एक हफ्ता पहले ही शुरू हो जाता था। एक बार लेखिका को किसी काम से बस स्टैंड जाना पड़ा। उस समय दिल्ली में डीटीसी की बसें चलती थीं और उनके आने का कोई निश्चित समय नहीं होता था। ड्राइवर अक्सर बस को स्टैंड से बहुत पीछे या आगे खड़ा कर देते थे, जिससे यात्रियों को भागकर बस तक पहुंचना पड़ता था। होली के दिनों में तो एक और डर सताता था कि कहीं कोई अचानक रंग न डाल दे।
लगभग बीस-पच्चीस मिनट के इंतज़ार के बाद जब बस आई, तो लेखिका दौड़कर उसमें चढ़ गईं। खिड़की के पास एक बुजुर्ग महिला बैठी थीं। उनके साफ़-सुथरे सफेद कुर्ते-सलवार को देखकर लेखिका को लगा कि शायद उन्हें कपड़ों के रंग से खराब होने का डर नहीं है, जिससे लेखिका को भी थोड़ी हिम्मत मिली। कुछ देर बाद उस महिला का स्टॉप आ गया और लेखिका खिड़की वाली सीट पर बैठ गईं। बस अपनी रफ़्तार से चलती रही और स्टॉप दर स्टॉप लोग चढ़ते-उतरते रहे। उस समय मौसम में हल्की ठंडक थी।
बस एक कॉलेज के पास से गुज़र रही थी। कॉलेज के बाहर छात्रों का एक बड़ा जमघट था, जिसमें सिर्फ़ लड़के ही नज़र आ रहे थे, कोई लड़की नहीं थी। जैसे ही बस चलने लगी, अचानक बहुत सारे लड़के बस के सामने आ खड़े हुए, जिससे ड्राइवर को बस रोकनी पड़ी। तभी लेखिका ने देखा कि कई लड़कों के चेहरे, हाथ-पैर और कपड़े तरह-तरह के रंगों से पुते हुए थे। वे लड़के बस की खिड़कियों के पास भी जमा हो गए। लेखिका को तुरंत समझ आ गया कि अब क्या होने वाला है और उन्हें अफसोस होने लगा कि वह खिड़की के पास ही क्यों बैठीं।
उन्होंने खिड़की पर हाथ लगाकर देखा कि वह ठीक से बंद है या नहीं। तभी, एक छोटे कद के, रंगों से सने हुए लड़के ने बाहर से खिड़की के शीशे पर हाथ मारकर उसे खिसकाया। इसके बाद एक के बाद एक कई गुब्बारे सीधे लेखिका के सिर पर फोड़े गए। उनके मुंह पर भी गुब्बारे मारे गए। उन लड़कों ने बस में बैठे दूसरे यात्रियों पर भी रंग फेंकने का प्रयास किया। यात्री उन्हें डांटने लगे, लेकिन लड़के नहीं माने। ड्राइवर ने यह हंगामा देखकर बस को आगे बढ़ाने की कोशिश की और वह सफल भी हुआ।
पूरी तरह भीग जाने के कारण लेखिका कहीं और जाने की स्थिति में नहीं थीं, इसलिए वह अगले स्टॉप पर उतर गईं। परेशान होकर वह घर लौटीं। इस अनुभव के बाद लेखिका आज भी रंग खेलने वालों से यह कहना चाहती हैं कि वे रंग-बिरंगी होली खेलने का आनंद ज़रूर लें, लेकिन किसी को भी परेशान न करें। होली का उल्लास ऐसा हो जिसमें सभी का सम्मान हो और कोई भी असहज महसूस न करे। यह संदेश होली के असली मर्म को दर्शाता है, जहाँ खुशी बांटने का नाम है, न कि किसी को दुख पहुँचाने का।