End Of Naxalism Near Big Success For Security Forces In Chhattisgarh Target Of Complete Liberation By March
नक्सलवाद ख़ात्मे की ओर, पर सतर्कता ज़रूरी
नवभारत टाइम्स•
सरकार देश को नक्सलवाद से मुक्त करने के लक्ष्य के करीब है। बड़े माओवादी नेताओं के मारे जाने और समर्पण से उनकी गतिविधियां सिमट गई हैं। सुरक्षा बलों की कार्रवाई, बेहतर कनेक्टिविटी और पुनर्वास योजनाओं से लोगों का भरोसा बढ़ा है। मार्च तक लक्ष्य हासिल होने की उम्मीद है, पर सतर्कता आवश्यक है।
सरकार ने देश को नक्सलवाद से मुक्त करने का जो लक्ष्य 31 मार्च तक तय किया है, उसे हासिल करने के करीब है। छत्तीसगढ़ में बड़े माओवादी नेताओं के मारे जाने और कईयों के आत्मसमर्पण करने से नक्सली गतिविधियां अब सिर्फ दक्षिण बस्तर तक सिमट गई हैं। सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई, बेहतर सड़क कनेक्टिविटी, मोबाइल और बैंकिंग सेवाओं की पहुंच और प्रभावी पुनर्वास योजनाओं ने लोगों का भरोसा जीता है। पूर्व पुलिस महानिदेशक आर. के. विज ने इस मुद्दे पर खुलकर बात करते हुए बताया कि कैसे माओवादी आंदोलन कमजोर हुआ है और आगे की राह क्या है।
सरकार का मार्च तक देश को नक्सल मुक्त करने का लक्ष्य हकीकत बनने के बहुत करीब है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवाद) के महासचिव बसवराजू जैसे बड़े माओवादी नेताओं के मारे जाने और केंद्रीय व दंडकारण्य स्पेशल जोन कमिटी के कई सदस्यों के खात्मे के बाद, आंदोलन की कमर टूट गई है। वेणुगोपाल ‘सोनू’, रूपेश, रामदेर, संग्राम और देवजी जैसे बड़े नेताओं ने अपने साथियों के साथ आत्मसमर्पण कर दिया है। पीपल्स लिबरेशन गोरिल्ला आर्मी की बटालियन-1 का कमांडर मांडवी हिडमा भी आंध्र प्रदेश में मारा गया। महाराष्ट्र-मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ (MMC) स्पेशल जोन के सचिव कबीर सहित कई माओवादियों ने भी आत्मसमर्पण किया है। इन घटनाओं के बाद, नक्सली गतिविधियां अब मुख्य रूप से दक्षिण बस्तर के कुछ हिस्सों तक ही सीमित रह गई हैं। बाकी इलाकों में सशस्त्र संघर्ष लगभग खत्म हो चुका है।माओवाद आंदोलन 2012 से ही मुश्किलों का सामना कर रहा है। 2010 में जब यह आंदोलन महासमुंद जिले तक पहुंचा, तो इसका विस्तार रुक गया। उसी साल माओवादियों ने अपनी आखिरी PLGA कंपनी नंबर-10 का गठन किया था। 2012 में माओवादियों ने दूसरी बटालियन बनाई, लेकिन 2014 तक उन्हें उसे कंपनियों में बदलना पड़ा। इसके बाद, सभी सैन्य टुकड़ियों में सदस्यों की कमी होने लगी। अगस्त 2024 में, पार्टी के पोलित ब्यूरो ने बचाव का रास्ता खोजने की कोशिश की, लेकिन वे सफल नहीं हुए। पिछले साल मई में बसवराजू के मारे जाने और अक्टूबर में वेणुगोपाल के आत्मसमर्पण के बाद, पार्टी के एक गुट ने शांति वार्ता की वकालत की। वहीं, केंद्रीय कमिटी सदस्य देवजी का समूह संघर्ष जारी रखना चाहता था, लेकिन अंततः उसने भी आत्मसमर्पण कर दिया। इस विभाजन के कारण पार्टी कमजोर हो गई। फरवरी तक, देश में माओवाद से प्रभावित सिर्फ 7 जिले बचे थे।
दक्षिण बस्तर को छोड़कर बाकी इलाकों में माओवादियों की भर्ती समय के साथ काफी कम हो गई है। 2024 तक कुछ भर्तियां हुईं, लेकिन पिछले साल एक भी नई भर्ती नहीं हुई। माओवादी आंदोलन अब पिछड़ गया है और माओवादी भी सुरक्षित रणनीति अपना रहे हैं। उनकी गतिविधियां भी लगभग बंद हो गई हैं।
सिर्फ सुरक्षा अभियानों से नक्सलवाद का खात्मा संभव नहीं है। माओवाद प्रभावित इलाकों को तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है। पहला, अत्यधिक प्रभावित क्षेत्र, जहां सुरक्षा के बिना विकास कार्य संभव नहीं हैं। दूसरा, वह क्षेत्र जहां संघर्ष और विकास कार्य साथ-साथ चल सकते हैं। तीसरा, वह इलाका जहां माओवाद पनप सकता है। इसलिए, अगर समय रहते इन इलाकों में विकास कार्य किए जाएं, तो आंदोलन को जड़ें जमाने का मौका नहीं मिलेगा। प्रभावित इलाकों की विशिष्ट स्थिति के अनुसार विकास कार्य किए जाने चाहिए।
केंद्र और राज्य सरकार की आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीतियां काफी आकर्षक साबित हुई हैं। जिन्होंने आत्मसमर्पण किया है, उन्हें इसका फायदा मिला है। कई लोग नौकरी की तलाश में हैं, जबकि कई गांव लौटने की इच्छा रखते हैं। ग्रामीण भी सरकारी कामकाज में सहयोग कर रहे हैं। जैसे-जैसे विकास कार्य बढ़ेंगे, ग्रामीणों का भरोसा और बढ़ेगा। पहले आत्मसमर्पण करने वालों को 'गद्दार' कहकर बदला लिया जाता था, लेकिन अब स्थिति बदल गई है, जिससे असुरक्षा की भावना कम हुई है। हालांकि, जहां माओवादी गतिविधियां अभी भी जारी हैं, वहां सतर्क रहना आवश्यक है।
छत्तीसगढ़ में माओवादी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए एक विशेष सूचना शाखा खोली गई थी। इंटेलिजेंस ब्यूरो और राज्य की विशेष सूचना शाखा मिलकर समन्वय से काम कर रही हैं। केंद्रीय बलों की 50 से ज्यादा बटालियनें अभी छत्तीसगढ़ में तैनात हैं, और छत्तीसगढ़ पुलिस की भी 22 बटालियनें हैं। राज्य बनने के बाद से छत्तीसगढ़ पुलिस बल 22-23 हजार से बढ़कर 80 हजार हो गया है। स्पेशल टास्क फोर्स (STF) और जिला रिजर्व गार्ड (DRG) भी काफी प्रभावी साबित हुए हैं।
सुरक्षा बल मार्च तक नक्सलवाद को पूरी तरह खत्म करने के लक्ष्य के बहुत करीब हैं। माओवादी अब सिर्फ दक्षिण पश्चिम बस्तर तक सीमित रह गए हैं। अगर मार्च तक कुछ माओवादी बच भी जाते हैं, तो वे लंबी लड़ाई लड़ने की स्थिति में नहीं होंगे। फिर भी, स्थिति पर लगातार नजर रखना महत्वपूर्ण है।
पूर्व डीजीपी आर. के. विज ने कहा, "हां, सरकार मार्च तक देश को नक्सल मुक्त करने का लक्ष्य हासिल करने के करीब है।" उन्होंने आगे बताया कि बसवराजू सहित कई बड़े माओवादी नेताओं के मारे जाने और देवजी जैसे नेताओं के आत्मसमर्पण करने के बाद, उनकी गतिविधियां अब दक्षिण बस्तर तक ही सिमट गई हैं। विज ने यह भी स्पष्ट किया कि माओवाद आंदोलन 2012 से ही कमजोर पड़ रहा था और सदस्यों की कमी के कारण उनकी सैन्य टुकड़ियां भी कमजोर हो गईं। उन्होंने कहा कि सरकार की पुनर्वास नीतियां सफल रही हैं और ग्रामीणों का भरोसा बढ़ा है। विज के अनुसार, "अगर समय रहते वहां विकास कार्य किए गए, तो आंदोलन जोड़ नहीं पकड़ेगा।" उन्होंने खुफिया तंत्र की मजबूती और सुरक्षा बलों की बढ़ती संख्या पर भी प्रकाश डाला। अंत में, उन्होंने कहा कि भले ही मार्च तक पूरी तरह से नक्सलवाद खत्म न हो, लेकिन बचे हुए माओवादी लंबी लड़ाई नहीं लड़ पाएंगे।