रंगों से आगे, यादों और लोकगीतों वाली होली

नवभारत टाइम्स

फरीदाबाद में दूसरे प्रदेशों से आए लोग अपनी होली की परंपराएं निभा रहे हैं। उत्तराखंड समाज के लोग बैठकी और खड़ी होली गाते हैं। राजस्थान समाज के लोग चंग-धमाल पर लोकगीत और नृत्य करते हैं। बन्नुवाल बिरादरी के लोग मीठी रोटी बनाते हैं। लोग आज भी अपनी संस्कृति को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं।

holi in faridabad traditions folk songs and changing customs
फरीदाबाद में बसे दूसरे प्रदेशों के लोग अपनी पुरानी होली की परंपराओं को आज भी निभा रहे हैं, लेकिन उन्हें इस बात का मलाल है कि त्योहारों के वो पुराने दिन अब नहीं रहे। पहले की होली आज की तरह सिर्फ रंगों का खेल नहीं थी, बल्कि लोक संगीत, लोक संस्कृति और मेल-मिलाप का एक बड़ा उत्सव हुआ करती थी। आज के दौर में, खासकर शहरों में, होली का स्वरूप बदल गया है। गांव की चौपाल से निकलकर यह त्योहार अब शहर की सोसाइटियों में पहुंच गया है, जहां डीजे और केमिकल रंगों का बोलबाला है।

होली का नाम सुनते ही अक्सर हुड़दंग का ख्याल आता है, लेकिन यह त्योहार भी समय के साथ बदल गया है। जैसे दूरी बढ़ने से बोली बदल जाती है, वैसे ही त्योहारों के रंग भी बदल जाते हैं। हरियाणा के फरीदाबाद में बसे दूसरे राज्यों के लोग आज भी अपने रीति-रिवाजों को लेकर बहुत सजग हैं। उन्हें यह कमी खलती है कि काश त्योहारों के वो पुराने दिन फिर से लौट आएं। उनका मानना है कि पहले की होली आज की तुलना में कहीं ज्यादा पारंपरिक, लोक-संगीत पर आधारित और सामुदायिक भावना से भरी होती थी। उस समय होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि लोक संस्कृति और लोगों के बीच मेल-मिलाप का एक बड़ा उत्सव हुआ करती थी।
उत्तराखंड समाज की होली: मंदिरों में शास्त्रीय रागों पर आधारित गीत

फरीदाबाद में बसे उत्तराखंड के लोग अपने खास रीति-रिवाजों से होली मनाते हैं। कुमाऊं क्षेत्र से आए लोग तो बसंत पंचमी से ही शाम को घर-घर जाकर होली के गीत गाने लगते हैं। कुमाऊं सांस्कृतिक मंडल के पदाधिकारी प्रताप बताते हैं कि कुमाऊं की होली तीन तरह से मनाई जाती है: बैठकी होली, खड़ी होली और महिला होली। बैठकी होली में लोग एक साथ बैठकर होली के गीत गाते हैं। पुरानी परंपरा के अनुसार, इसमें एक गोल घेरा बनाया जाता है और ढोल, तबला और हारमोनियम की धुन पर होली के गीत गाए जाते हैं। पहले पहाड़ों में लोग मंदिरों में बैठकर शास्त्रीय रागों पर आधारित होली के गीत गाते थे। यह परंपरा आज भी पहाड़ों पर वैसी ही निभाई जाती है, लेकिन फरीदाबाद में बसे लोग इस परंपरा को सिर्फ याद ही कर पाते हैं। यहां अब सिर्फ पानी के रंगों वाली होली पर ही ज्यादा जोर दिया जाता है। गीतों के नाम पर डीजे बजाना आम बात हो गई है। हालांकि, बैठकी होली में महिलाएं एक-दूसरे को गुलाल का टीका लगाकर बधाई देती हैं। बैठकी होली और खड़ी होली गायन में शास्त्रीय गीत गाने की परंपरा भी शामिल है। लोग एक-दूसरे के घर जाकर होली के गीत गाते हैं और गुलाल का टीका लगाकर शुभकामनाएं देते हैं। खड़ी होली में लोग नुकीली टोपी, कुर्ता और चूड़ीदार पायजामा पहनकर एक जगह इकट्ठा होते हैं। वे होली के गीत गाते हैं और साथ ही ढोल-दमाऊ, हुड़के की धुनों पर नाचते भी हैं। फरीदाबाद में कुछ जगहों पर इस परंपरा को जीवित रखने की कोशिश की जा रही है।

राजस्थान समाज की होली: डीजे और केमिकल रंग कम, लोकसंगीत-नृत्य पर झूमते थे सभी

राजस्थान से आए लोगों में भी होली को लेकर खास उत्साह देखने को मिलता है। यहां के लोग अपने दोस्तों और परिचितों के घर इकट्ठा होकर 'चंग-धमाल' का आयोजन करते हैं। चंग की थाप पर पारंपरिक लोकगीत गाए जाते हैं और लोग नाच-गाकर उत्सव का आनंद लेते हैं। रंगों और गुलाल के साथ-साथ पारंपरिक पकवानों का भी विशेष महत्व होता है। फाल्गुन के गीत राजस्थान के लोगों के लिए होली के त्योहार को और भी खास बना देते हैं। उनके बीच यहां भी ये पारंपरिक गीत खूब गूंजते हैं: "चालो देखण ने बाईसा, थारो बीरो नाचे रे चालो देखण ने, ओहो के चालो देखण ने बाईसा, थारो बीरो नाचे रे चालो देखण ने..."। राजस्थान के लोग महाशिवरात्रि से लेकर होली आने तक हर रात ढोल, तबला, हारमोनियम बजाकर फाल्गुन के गीत गाते हैं। इसके बाद होली पर होलिका दहन किया जाता है, जिसमें फूस, लकड़ी और गोबर के कंडे पूजकर जलाए जाते हैं।

'मीठी रोटी बनाने की परंपरा'

पाकिस्तान से आकर एनआईटी में बसे बन्नुवाल बिरादरी के लोगों की होली पर मोटी मीठी रोटी बनाने की एक खास परंपरा है। होली वाले दिन ये लोग व्रत रखते हैं और होलिका दहन के बाद मीठी रोटी को आपस में बांटकर खाते हैं। होली से एक दिन पहले गोबर के उपले से आग जलाकर मीठी गुड़ की रोटी बनाई जाती है। इसे घर की महिलाएं शाम को ड्राई फ्रूट, आटे और गुड़ की चाशनी से तैयार करती हैं।

लोगों ने बताया कि होली के दिन सुबह भगवान कृष्ण की पूजा करने के बाद घर के बुजुर्गों को रंग लगाकर उनका आशीर्वाद लिया जाता है। इसके बाद पार्कों में जाकर एक-दूसरे को बधाई देकर गुलाल लगाया जाता है और खूब मौज-मस्ती की जाती है। यह परंपरा आज भी फरीदाबाद में कई समुदायों द्वारा निभाई जा रही है, जो त्योहारों की असली भावना को दर्शाती है। हालांकि, आधुनिकता की दौड़ में कहीं न कहीं इन पारंपरिक तरीकों का महत्व कम होता जा रहा है, लेकिन इन समुदायों के प्रयास सराहनीय हैं जो अपनी संस्कृति को जीवित रखे हुए हैं।