Investigation Lapses Courts Verdict In Delhi Excise Policy Case Puts Agencies In The Dock
जांच में कमियां
नवभारत टाइम्स•
दिल्ली आबकारी नीति मामले में अदालत के फैसले ने जांच एजेंसियों की कमियों को उजागर किया है। अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया जैसे नेताओं को जेल भेजने वाली जांच में कोई ठोस सबूत नहीं मिला। अदालत ने जांच के तौर-तरीकों पर भी सवाल उठाए हैं।
दिल्ली की आबकारी नीति से जुड़े कथित भ्रष्टाचार के मामले में अदालत के फैसले ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जुलाई 2022 से चर्चा में रहे इस मामले में अदालत ने मुकदमा शुरू करने लायक भी सबूत न मिलने पर टिप्पणी की, जिससे केंद्रीय एजेंसियों की कमियों और लापरवाही का पर्दाफाश हुआ। इस मामले में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को करीब 5 महीने और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को 17 महीने जेल में बिताने पड़े, जबकि 23 आरोपियों में से किसी के खिलाफ भी पुख्ता सबूत नहीं मिले।
अदालत ने पाया कि जांच एजेंसियों को मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं मिले। इससे भी गंभीर बात यह है कि अदालत ने जांच एजेंसियों के तौर-तरीकों और संवैधानिक दायरे के उल्लंघन पर भी चिंता जताई। एक आरोपी को माफी दिलाकर सरकारी गवाह (अप्रूवर) बनाना और फिर उसी के बयान के आधार पर केस खड़ा करने की कोशिश करना, जांच एजेंसियों के इरादों पर शक पैदा करता है। यह साफ तौर पर दर्शाता है कि एजेंसियां अपने संवैधानिक दायरे से बाहर जाकर काम कर रही थीं।हाल के वर्षों में केंद्रीय एजेंसियों की विश्वसनीयता पर सवाल उठे हैं। दिल्ली से लेकर पश्चिम बंगाल तक, विपक्षी दल लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि इन एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है। दिल्ली का विधानसभा चुनाव भी काफी हद तक इसी आबकारी नीति के मामले के इर्द-गिर्द घूमता रहा। जब भी किसी बड़े राजनीतिक चेहरे के खिलाफ कार्रवाई होती है, तो लोगों का ध्यान आकर्षित होना स्वाभाविक है। लेकिन, सिर्फ आरोपों को हवा देना और उन्हें सजा दिलाना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। सच्चाई यह है कि प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) जैसे मामलों में सजा दिलाने की दर बहुत कम है। जांच में देरी और बेवजह की गिरफ्तारियां भी इस समस्या को बढ़ाती हैं।
CBI ने अदालत के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती देने की बात कही है, जो कि स्वाभाविक है। लेकिन, इस मामले से जुड़े जिम्मेदार अधिकारियों से भी जवाबदेही तय होनी चाहिए। अदालत ने भी विभागीय जांच की सिफारिश की है। इन अधिकारियों की लापरवाही ने एजेंसी की छवि को नुकसान पहुंचाया है। लीपापोती करने के बजाय, सख्त कार्रवाई होनी चाहिए ताकि भविष्य में एजेंसी को ऐसी शर्मिंदगी का सामना न करना पड़े। यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि जांच एजेंसियां निष्पक्ष और कानून के दायरे में रहकर काम करें, न कि राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाएं।
यह मामला इस बात का आईना है कि कैसे जांच एजेंसियां कभी-कभी अपने काम में इतनी जल्दबाजी कर जाती हैं कि वे सबूत जुटाने और कानूनी प्रक्रिया का पालन करने में चूक जाती हैं। जब अदालत में कोई मामला टिकता ही नहीं, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इतनी लंबी जांच और गिरफ्तारियों का क्या मतलब था। आम आदमी पार्टी के नेताओं को जेल में डालना और फिर अदालत द्वारा सबूत न मिलना, यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं सिस्टम में खामी है।
जांच एजेंसियों को यह समझना होगा कि उनका काम सिर्फ आरोप लगाना नहीं, बल्कि पुख्ता सबूतों के आधार पर न्याय दिलाना है। जब वे ऐसा नहीं कर पातीं, तो उनकी विश्वसनीयता कम होती है और जनता का भरोसा भी उठता है। दिल्ली आबकारी नीति का मामला एक चेतावनी है कि एजेंसियों को अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करना होगा और राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर काम करना होगा। तभी वे जनता का विश्वास जीत पाएंगी और न्याय व्यवस्था को मजबूत कर पाएंगी।