बेस ईयर वह साल होता है, जिसकी कीमतों को आधार बनाकर रियल ग्रोथ की गणना होती है। 2011-12 के बजाय 22-23 होने से इकॉनमी के ताजा बदलाव बेहतर ढंग से दिखेंगे। नई सीरीज में असंगठित क्षेत्र की इकाइयों के सालाना सर्वे, PLFS जैसे सर्वेक्षणों का उपयोग होगा। GST, पब्लिक फाइनैंस मैनेजमेंट सिस्टम, ई-वाहन जैसे नए स्रोतों और डिजिटल इकॉनमी जैसे सेक्टरों को कवर करने से ज्यादा सटीक तस्वीर दिखेगी। आंकड़ों पर IMF जैसी संस्थाओं के सवाल अब दूर हो सकते है।

