मिलेनियम सिटी में ‘दुर्लभ’ हो रहा रेयर डिज़ीज़ का इलाज

नवभारत टाइम्स

गुड़गांव में दुर्लभ बीमारियों का इलाज मिलना मुश्किल हो रहा है। शहर के निजी अस्पताल महंगे हैं, इसलिए मरीज दिल्ली के सरकारी अस्पतालों पर निर्भर हैं। ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी, म्यूकोपॉलीसैकेराइडोसिस और स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी जैसी बीमारियों के लिए विशेष जांच और इलाज की जरूरत होती है।

मिलेनियम सिटी में ‘दुर्लभ’ हो रहा रेयर डिज़ीज़ का इलाज
गुड़गांव, जो दुनिया भर में साइबर हब और मिलेनियम सिटी के नाम से जाना जाता है, वहां दुर्लभ बीमारियों (रेयर डिजीज) के इलाज के लिए आज भी दिल्ली के सरकारी अस्पतालों पर निर्भरता बनी हुई है। शहर के निजी अस्पतालों में इन बीमारियों का इलाज तो है, लेकिन यह इतना महंगा है कि आम लोग इसका खर्च नहीं उठा पाते। इस वजह से, गुड़गांव के डॉक्टर दुर्लभ बीमारियों का पता चलने पर मरीजों को आगे के इलाज के लिए दिल्ली के विशेष केंद्रों में भेज देते हैं।

सेक्टर-10 सिविल अस्पताल में ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्रॉफी (DMD), म्यूकोपॉलीसैकेराइडोसिस (MPS) या स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) जैसी दुर्लभ बीमारियां सामने आने पर मरीजों को दिल्ली के विशेष केंद्रों में रेफर किया जाता है। इन बीमारियों के इलाज के लिए खास जेनेटिक टेस्टिंग, एंजाइम एनालिसिस और न्यूरो-मस्कुलर विशेषज्ञों की जरूरत होती है। यह इलाज लंबा चलता है और बहुत महंगा भी होता है। उदाहरण के तौर पर, SMA के इलाज में लगने वाली थेरेपी और इंजेक्शन की कीमत करोड़ों रुपये तक जा सकती है। गुड़गांव में इन बीमारियों के इलाज के लिए जरूरी हाई-एंड सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। इसलिए, डॉक्टर शुरुआती पहचान के बाद मरीजों को दिल्ली के सरकारी अस्पतालों में भेजते हैं, जहां विशेषज्ञों की टीम और विशेष क्लीनिक मौजूद हैं।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) इंडियन अकादमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के साथ मिलकर शहर में दुर्लभ बीमारियों के बारे में जागरूकता फैलाने और सहयोग करने का काम कर रहा है। IMA, एनजीओ की मदद से पंजीकृत मरीजों का इलाज एम्स में सुनिश्चित कराने की कोशिश कर रहा है। IMA के अध्यक्ष डॉ. अजय अरोड़ा कहते हैं कि दुर्लभ बीमारियों के मामले भले ही कम हों, लेकिन ये एक परिवार के लिए जीवन भर की लड़ाई बन जाती हैं। खासकर SMA जैसी बीमारी में एक इंजेक्शन की कीमत करोड़ों रुपये तक होती है। ऐसे में, एम्स में पंजीकरण होने पर मरीजों को प्राथमिकता के आधार पर दवाएं और इंजेक्शन मिल पाते हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि अगर गुड़गांव में ही जेनेटिक डायग्नोस्टिक और रेयर डिजीज ट्रीटमेंट सेंटर खोले जाएं, तो परिवारों को बार-बार दिल्ली जाने की मजबूरी से छुटकारा मिल सकता है। इससे लोगों को बहुत फायदा होगा। इन सेंटरों में दुर्लभ बीमारियों की पहचान और इलाज की सुविधा मिलने से मरीजों को समय पर सही इलाज मिल सकेगा और उन्हें आर्थिक बोझ से भी राहत मिलेगी।

दुर्लभ बीमारियां वे होती हैं जो बहुत कम लोगों को होती हैं। इनकी पहचान करना अक्सर मुश्किल होता है और इनके इलाज के लिए विशेष ज्ञान और संसाधनों की आवश्यकता होती है। भारत में ऐसी बीमारियों के इलाज के लिए अभी भी बहुत कम सुविधाएं उपलब्ध हैं, खासकर छोटे शहरों में। गुड़गांव जैसे बड़े शहर का दिल्ली पर निर्भर रहना, स्वास्थ्य सेवाओं में मौजूद कमियों को उजागर करता है।

IMA जैसी संस्थाएं जागरूकता फैलाकर और सरकारी अस्पतालों से संपर्क करके मरीजों की मदद करने की कोशिश कर रही हैं। यह एक सराहनीय कदम है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए स्थानीय स्तर पर सुविधाओं का विकास बहुत जरूरी है। जब तक गुड़गांव में ही ऐसे विशेष केंद्र नहीं खुलते, तब तक मरीजों और उनके परिवारों को दिल्ली के चक्कर लगाने पड़ेंगे, जो अपने आप में एक बड़ी चुनौती है।