मार्केट में मूली

नवभारत टाइम्स

मार्केट में मूली की बहार आई है। दाम गिरने से यह सस्ती हो गई है। लोग इसे नजरअंदाज कर रहे हैं। वहीं, गाजर की खूब पूछ है। गाजर का सलाद और हलवा बन रहा है। मूली को यह भेदभाव समझ नहीं आ रहा। रंग के कारण यह उपेक्षा झेल रही है। समाज में रंगभेद की सोच गहरी है।

cheap radish season a treasure trove of health but why ignored
मूली का सीजन आ गया है और बाज़ार में छा गई है। जो मूली हफ्तेभर पहले 50 रुपये में तीन मिल रही थी, वही अब 5 रुपये में तीन मिल रही है। मूली पसंद करने वालों के लिए तो यह सोने पे सुहागा है। मूली सब्ज़ी में, सलाद में, पराठे में, हर चीज़ में इस्तेमाल हो रही है। सुबह, दोपहर, रात, हर खाने में मूली ही मूली। इतनी मूली कि जिन्हें यह पसंद नहीं, वे भी इसे घूर-घूर कर देख रहे हैं। चांदी जैसी सफेद मूली बाज़ार में आ गई है, लेकिन चांदी के दाम आसमान छू रहे हैं, वहीं मूली सस्ते में मिल रही है। यह मूली का सीजन है, पेट को ठीक करने और तरह-तरह की बीमारियों को दूर भगाने का समय है। जो भी उल्टा-सीधा खाया है, उसका असर मूली खत्म कर देगी। मूली कह रही है कि इस बार वह सस्ती है, लेकिन हर बार इतनी सस्ती नहीं मिलेगी।

लेकिन दुख की बात यह है कि मूली को नज़रअंदाज़ किया जा रहा है। खेतों से ताज़ी-ताज़ी लाई गई मूली को वह सम्मान नहीं मिल रहा जिसकी वह हकदार है। जब 50 रुपये में तीन मिल रही थी, तब उसकी बहुत इज़्ज़त थी और सेहत के लिए भी उसे बहुत फायदेमंद माना जाता था। लेकिन अब जब वह 5 रुपये में तीन मिल रही है, तो उसे हेय दृष्टि से देखा जा रहा है, जैसे वह जबरदस्ती गले पड़ रही हो। दरअसल, हमारे समाज की सोच ही ऐसी है कि महंगी चीज़ों को ही अच्छी क्वालिटी का माना जाता है।
मूली के बगल में ही गाजर रखी है, लेकिन उसके साथ बिल्कुल अलग बर्ताव हो रहा है। गाजर की खूब आवभगत हो रही है। लोग पांच-पांच किलो गाजर खरीद रहे हैं। गाजर सलाद में तो जाती ही है, उसका हलवा भी बनता है। बेचारी मूली सोच रही है कि काश, उसका भी हलवा बन पाता! ज़रा सोचिए, इस दुनिया में कितना भेदभाव है। गाजर और मूली की कद-काठी एक जैसी है। दोनों खेतों में एक ही तरह से उगती हैं और बाज़ार में भी एक ही तरीके से पहुंचती हैं। फिर इतना भेदभाव क्यों? नादान मूली यह बात नहीं समझ पाती कि दोनों के रंग अलग हैं। हमारे समाज में रंग बहुत मायने रखता है। इसी रंगभेद ने तो हमारे समाज को इतना बेरंग बना दिया है!

मूली का सस्ता होना लोगों को पसंद नहीं आ रहा। जब चीज़ महंगी होती है, तब उसकी कद्र होती है। लोग सोचते हैं कि महंगी चीज़ में ही कुछ खास होगा। लेकिन जब वही चीज़ सस्ती हो जाती है, तो उसे बेकार समझा जाने लगता है। मूली के साथ भी यही हो रहा है। वह सस्ती है, इसलिए लोग उसे भाव नहीं दे रहे। जबकि सेहत के लिए वह उतनी ही फायदेमंद है, जितनी महंगी होने पर थी।

मूली को नज़रअंदाज़ करना हमारी सोच की कमी को दर्शाता है। हमें चीज़ों की कीमत के बजाय उनके गुणों पर ध्यान देना चाहिए। मूली एक पौष्टिक सब्ज़ी है जो कई बीमारियों से लड़ने में मदद करती है। इसे सस्ता होने की वजह से नज़रअंदाज़ करना सही नहीं है। हमें अपनी सोच बदलनी होगी और हर चीज़ को उसके गुणों के आधार पर आंकना होगा, न कि उसकी कीमत के आधार पर।

मूली का सीजन कुछ समय के लिए ही होता है। इस मौके का फायदा उठाकर हमें इसका भरपूर सेवन करना चाहिए। यह पेट को दुरुस्त रखने और कई तरह की बीमारियों को दूर भगाने में मदद करती है। जो भी हमने उल्टा-सीधा खाया है, उसका असर मूली खत्म कर देगी। इसलिए, मूली को सस्ता समझकर नज़रअंदाज़ न करें, बल्कि इसे अपनी डाइट में शामिल करें और इसके फायदों का लाभ उठाएं।