Renunciation Of Desires Find Peace And Success Without Leaving Home
अगर इच्छाएं छोड़ दीं, तो घर छोड़ने की ज़रूरत नहीं
नवभारत टाइम्स•
इच्छाओं का त्याग ही सच्चा त्याग है। इससे घर छोड़ने की जरूरत नहीं पड़ती। त्याग का अर्थ है सब कुछ रखते हुए भी खोने का भय न रखना। श्रीराम ने राजसुख त्याग कर मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। पेट में भोजन के अवशेष छोड़ने पर ही नई भूख लगती है।
त्याग का असली मतलब चीजों को छोड़ना या फेंकना नहीं है, बल्कि यह समझना है कि हमारे पास सब कुछ रहे, पर उसके खोने या पाने का डर न हो। श्रीराम ने राजसुख का त्याग करके ही मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। कुछ भी हासिल करने के लिए कुछ न कुछ छोड़ना पड़ता है। एक चीज को छोड़ने पर ही दूसरी चीज मिलती है, जैसे कदम आगे बढ़ाने के लिए पिछला कदम उठाना पड़ता है। पेट में खाना पचाने के लिए पहले का भोजन छोड़ना पड़ता है, और साफ हवा लेने के लिए फेफड़ों से अशुद्ध हवा बाहर निकालनी पड़ती है। नया शरीर पाने के लिए पुराने, जर्जर शरीर को छोड़ना पड़ता है। जिस तरह रुका हुआ पानी सड़ जाता है, उसी तरह पेट में खाना जमा रहने से बीमारियां होती हैं। इच्छाओं का त्याग ही सच्चा त्याग है, इसके लिए घर छोड़ने की जरूरत नहीं। मन की उन इच्छाओं को छोड़ना चाहिए जिनसे आलस बढ़ता है। झूठ, चापलूसी, चुगली, कड़वी बातें और बेकार की बातों को छोड़ने से जीवन में शांति आती है। बुरे काम, बुरे विचार और बुरी बातें हमेशा छोड़ देनी चाहिए। पद, अधिकार के साथ अहंकार भी छोड़ना चाहिए। ईर्ष्या, दूसरों का हक छीनने की सोच, दिल दुखाने वाले शब्द और क्रोध, जो हमें और दूसरों को जला देता है, इन सबका त्याग करना चाहिए। जीवन में अशुभ और बदसूरत चीजों को छोड़ने से ही शुभ और सुंदरता आती है।
त्याग का मतलब सिर्फ चीजों को छोड़ देना नहीं है। इसका गहरा अर्थ है कि हमारे पास सब कुछ बना रहे, लेकिन उसके खोने या पाने का डर हमारे मन में न रहे। यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है जहाँ हम चीजों से मोह नहीं रखते। दुनिया में कुछ भी बड़ा हासिल करने के लिए हमें कुछ न कुछ कीमत चुकानी पड़ती है, और यह कीमत अक्सर हमारे आराम, हमारी इच्छाओं या हमारे अहंकार के रूप में होती है।इसका एक बहुत अच्छा उदाहरण हमें श्रीराम के जीवन से मिलता है। उन्होंने राजसुख का त्याग किया। यह त्याग ही था जिसने उन्हें 'मर्यादा पुरुषोत्तम' बनाया। यह हमें सिखाता है कि जब हम किसी बड़ी चीज को पाने की इच्छा रखते हैं, तो हमें उसके लिए कुछ छोड़ना पड़ता है। यह एक प्राकृतिक नियम की तरह है। जैसे, जब हम एक कदम आगे बढ़ाते हैं, तो हमें पिछला कदम उठाना ही पड़ता है। तभी हम आगे बढ़ पाते हैं।
हमारे शरीर के अंदर भी यह नियम काम करता है। जब हमारा पेट भोजन को पचा लेता है, तभी हमें फिर से भूख लगती है और हम नया भोजन ग्रहण कर पाते हैं। इसी तरह, जब हम ताज़ी और शुद्ध हवा अंदर लेते हैं, तो हमारे फेफड़े पहले से मौजूद अशुद्ध हवा को बाहर निकालते हैं। जीवन चक्र में भी, एक नया शरीर धारण करने के लिए पुराने, कमजोर शरीर को छोड़ना पड़ता है।
यह सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक स्तर पर भी लागू होता है। हमारे पूर्वजों ने कहा है, "जिसने इच्छा का त्याग कर दिया उसे घर छोड़ने की कोई जरूरत नहीं, और जो इच्छाओं से बंधा है, उसके वन में चले जाने पर भी कोई लाभ नहीं।" इसका मतलब है कि असली त्याग घर छोड़ने में नहीं, बल्कि मन की इच्छाओं को छोड़ने में है। अगर मन में इच्छाएं भरी हैं, तो कहीं भी चले जाओ, शांति नहीं मिलेगी।
हमें अपने मन की उन इच्छाओं और रुचियों को छोड़ना चाहिए जो हमें आलसी बनाती हैं। जैसे, अगर किसी को देर तक सोना पसंद है और इससे उसका काम रुकता है, तो उसे इस आदत को छोड़ना चाहिए। हमें झूठ बोलना, चापलूसी करना, दूसरों की बुराई करना, कड़वी बातें बोलना और बेकार की बातें करना भी छोड़ देना चाहिए। ऐसा करने से हमारे जीवन में झगड़े, पछतावा और अशांति नहीं फैलेगी।
किसी भी हालत में बुरे काम करना, बुरा सोचना और बुरा कहना, यह सब त्यागने लायक है। जब हम किसी ऊँचे पद पर होते हैं या हमारे पास अधिकार होता है, तो हमें अहंकार को भी छोड़ना चाहिए। यह अहंकार हमें दूसरों से दूर कर देता है।
हमें उस ईर्ष्या को भी छोड़ना चाहिए जो हमारे रिश्तों में दरार डालती है। उस सोच को भी छोड़ना चाहिए जो हमें किसी का हक छीनने पर मजबूर करती है। उन शब्दों को भी छोड़ना चाहिए जो किसी के दिल को चोट पहुँचाते हैं। और उस क्रोध को भी छोड़ना चाहिए जो हमें और दूसरों को जला देता है।
संक्षेप में, हमें जीवन के हर क्षेत्र से बुरी और बदसूरत चीजों को हटाना चाहिए। तभी हमारे जीवन में अच्छाई और सुंदरता का उदय होगा। यह त्याग ही हमें एक बेहतर इंसान बनाता है और हमारे जीवन को खुशहाल बनाता है।