राजेंद्र प्रसाद की चिंता

नवभारत टाइम्स

26 नवंबर 1949 को संविधान सभा में डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान के सफल कार्यान्वयन पर जोर दिया। उन्होंने ऐसे लोगों की आवश्यकता बताई जो ईमानदार हों और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें। संविधान निर्माण में योगदान देने वाले विद्वानों और अस्थायी कर्मचारियों के प्रति उन्होंने कृतज्ञता व्यक्त की।

rajendra prasads concern expressed apprehension about the implementation of the constitution emphasized prioritizing national interest
26 नवंबर 1949 का दिन भारतीय संविधान सभा के लिए खास था। सालों की मेहनत के बाद संविधान बनकर तैयार हो गया था। लेकिन, सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद को संविधान के सही ढंग से लागू होने की चिंता थी। उन्होंने कहा, "संविधान चाहे कितना ही उत्तम क्यों न लिखा गया हो, उसकी सफलता सही ढंग से लागू होने में है। हमें ऐसे लोगों की जरूरत है, जो ईमानदार हों और राष्ट्रहित को स्वयं से ऊपर रखें।"

संविधान बनने के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान निर्माण में लगे विद्वानों को धन्यवाद दिया। साथ ही, उन्होंने उन अस्थायी कर्मचारियों को भी याद किया जिन्होंने सालों तक निष्ठा से काम किया था। उन्होंने उनके योगदान को पहचानते हुए उन्हें स्थायी नौकरी देने का वादा किया। यह सुनकर कई लोगों की आंखें नम हो गईं। ऐसा लगा जैसे तीन साल की मेहनत का फल मिल गया हो।
बाद में, राष्ट्रपति बनने पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने यह कहकर अपना पूरा वेतन लेने से मना कर दिया कि यह एक गरीब देश के लिए बहुत ज्यादा है। उनका जीवन और उनके विचार, संविधान की सच्ची भावना को दर्शाते थे। उन्होंने दिखाया कि कैसे एक नेता को देशहित को सबसे ऊपर रखना चाहिए।

संविधान सभा में उस दिन सिर्फ संविधान पर हस्ताक्षर ही नहीं हुए थे, बल्कि एक नई सोच की शुरुआत हुई थी। डॉ. राजेंद्र प्रसाद की बातों ने यह साफ कर दिया था कि सिर्फ एक अच्छा संविधान बनाना ही काफी नहीं है। उसे सही तरीके से लागू करने के लिए ईमानदार और देशहित सोचने वाले लोगों की जरूरत है। उन्होंने यह भी दिखाया कि कैसे छोटे से छोटे कर्मचारी का योगदान भी महत्वपूर्ण होता है।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद का यह कदम, कि उन्होंने राष्ट्रपति के तौर पर पूरा वेतन लेने से इनकार कर दिया, उनकी सादगी और देश के प्रति समर्पण को दिखाता है। उन्होंने साबित किया कि वे सिर्फ शब्दों के नेता नहीं थे, बल्कि अपने कामों से भी मिसाल पेश करते थे। उनका जीवन आज भी हमें सिखाता है कि कैसे हमें अपने देश के लिए जीना चाहिए।