बंगाल में अपने दम पर चुनाव लड़े कांग्रेस

नवभारत टाइम्स

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस एक अहम मोड़ पर है। गठबंधन पर निर्भरता से पार्टी कमजोर हुई है। 2021 में लेफ्ट के साथ मिलकर कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला था। अब पार्टी अकेले चुनाव लड़ने पर विचार कर रही है। यह कठिन रास्ता है लेकिन संगठन को मजबूत करने का यही एकमात्र तरीका हो सकता है।

congresss decision to contest elections on its own strength in bengal will it pave the way for the partys resurgence
पश्चिम बंगाल की राजनीति में कांग्रेस एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ उसे कठिन लेकिन अहम फैसला लेना है। सालों तक लेफ्ट के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाली कांग्रेस अब उनसे अलग होने के संकेत दे रही है। यह सिर्फ सीटों के बंटवारे का मामला नहीं है, बल्कि कांग्रेस के अंदर एक बड़ी बहस का नतीजा है। पार्टी अपने भविष्य और अस्तित्व को लेकर चिंतित है।

कांग्रेस और वाम दलों का गठबंधन 2016 से पश्चिम बंगाल में चला आ रहा था। 2019 के लोकसभा चुनाव में दोनों अलग हुए, लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में फिर से साथ आए। हालांकि, यह गठबंधन कांग्रेस के लिए अक्सर नुकसानदायक ही साबित हुआ। 2021 के विधानसभा चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। तब कांग्रेस ने लेफ्ट के साथ मिलकर 92 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन पार्टी का खाता भी नहीं खुल सका। कांग्रेस का वोट शेयर घटकर सिर्फ 3% रह गया था।
इसके विपरीत, 1996 में कांग्रेस पश्चिम बंगाल में मुख्य विपक्षी दल थी। उसने 294 में से 288 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और 82 सीटें जीतकर 39.48% वोट हासिल किए थे। 2001 में, तृणमूल कांग्रेस (TMC) के साथ गठबंधन करके उसने 60 सीटों पर चुनाव लड़ा और 26 सीटें जीतीं। 2011 में कांग्रेस ने 42 सीटें जीतीं। 2016 में लेफ्ट के साथ मिलकर उसने 44 सीटें जीतीं। लेकिन इसके बाद पार्टी का प्रदर्शन तेजी से गिरा।

कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग मानता है कि दो दशकों से गठबंधनों पर निर्भर रहने की वजह से पार्टी अंदर से खोखली हो गई है। राज्य के दो-तिहाई विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस का झंडा और चुनाव चिह्न सालों से दिखाई ही नहीं दिया। ऐसे में, संगठन का विस्तार कैसे हो, नए कार्यकर्ता कैसे जुड़ें और मतदाताओं के बीच पार्टी की पहचान कैसे बने, यह एक बड़ा सवाल है। पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता मानते हैं कि राजनीतिक सुविधा को छोड़कर कांग्रेस को अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लेना चाहिए, भले ही शुरुआत में नुकसान हो।

केरल का उदाहरण यहां महत्वपूर्ण हो जाता है। केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाला UDF और वाम मोर्चा सीधे मुकाबले में हैं। भारतीय जनता पार्टी (BJP) लंबे समय से इसी मुद्दे पर कांग्रेस को घेरती रही है कि वह पश्चिम बंगाल में लेफ्ट के साथ गठबंधन करती है, लेकिन केरल में उन्हीं के खिलाफ लड़ती है। हाल के स्थानीय निकाय चुनावों में जीत के बाद, कांग्रेस केरल में कोई जोखिम नहीं उठाना चाहती। इसका असर राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की राजनीति की सोच पर भी पड़ रहा है।

विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. के दो प्रमुख सदस्य होने के बावजूद, कांग्रेस और लेफ्ट ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर अब तक कोई औपचारिक बातचीत नहीं की है। यह स्थिति 2021 से बिल्कुल अलग है, जब दिसंबर 2020 में ही दोनों ने साथ चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया था। उस समय बना संयुक्त मोर्चा पूरी तरह विफल रहा था।

इन अनुभवों ने कांग्रेस को आत्ममंथन के लिए मजबूर किया है। पार्टी के रणनीतिकार मानते हैं कि अगर कांग्रेस को पश्चिम बंगाल में फिर से राजनीतिक प्रासंगिकता हासिल करनी है, तो उसे लंबे समय तक संगठन निर्माण, जमीनी स्तर पर संघर्ष और अपनी स्वतंत्र पहचान बनाने पर काम करना होगा। इसके लिए अकेले चुनाव लड़ना मुश्किल जरूर है, लेकिन शायद यही एकमात्र रास्ता है।

कांग्रेस के लिए यह एक कठिन लेकिन निर्णायक मोड़ है। सालों तक लेफ्ट के साथ चुनावी गठबंधन का हिस्सा रही कांग्रेस अब उनसे दूरी बनाने के संकेत दे रही है। यह केवल सीटों के बंटवारे या तात्कालिक चुनावी गणित का सवाल नहीं है, बल्कि कांग्रेस के भीतर चल रही उस गहरी बहस का नतीजा है, जिसमें पार्टी के पुनरुत्थान और संगठनात्मक अस्तित्व पर चिंता साफ झलकती है।

कांग्रेस और वाम दलों का गठबंधन 2016 से पश्चिम बंगाल में सक्रिय रहा। 2019 के लोकसभा चुनाव में दोनों अलग हुए, लेकिन 2021 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में फिर साथ आए। हालांकि, यह प्रयोग कांग्रेस के लिए लगभग हर बार नुकसानदेह ही साबित हुआ। 2021 के विधानसभा चुनाव इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं, जब कांग्रेस ने लेफ्ट के साथ मिलकर 92 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन पार्टी का खाता तक नहीं खुल सका। उसका वोट शेयर घटकर महज 3% रह गया।

इसके उलट, 1996 में कांग्रेस पश्चिम बंगाल में मुख्य विपक्ष थी। उसने 294 में से 288 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और 82 सीटें जीतकर 39.48% वोट हासिल किया। 2001 में, तृणमूल कांग्रेस (TMC) के साथ गठबंधन कर उसने 60 सीटों पर चुनाव लड़ा और 26 सीटें जीत गई। 2011 में 42 सीटें जीतीं। 2016 में लेफ्ट के साथ मिलकर 44 सीटों पर जीत दर्ज की। लेकिन इसके बाद पार्टी का ग्राफ तेजी से गिरा।

कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग मानता है कि दो दशकों से गठबंधनों पर निर्भरता ने पार्टी को खोखला कर दिया है। राज्य के दो-तिहाई विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस का झंडा और चुनाव चिह्न वर्षों तक दिखाई ही नहीं दिया। ऐसे में, संगठन विस्तार, नए कार्यकर्ताओं का जुड़ना और मतदाताओं के बीच पार्टी की पहचान कैसे बने, यह सवाल उठ रहा है। पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि राजनीतिक सुविधा छोड़कर कांग्रेस को अकेले चुनाव लड़ने का फैसला लेना चाहिए, भले ही तात्कालिक नुकसान क्यों न हो।

केरल का संदर्भ यहां अहम हो जाता है। वहां कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF और वाम मोर्चा में सीधा मुकाबला है। BJP लंबे समय से इसी मुद्दे पर कांग्रेस को घेरती रही है कि वह बंगाल में लेफ्ट के साथ गठबंधन करती है, लेकिन केरल में उन्हीं के खिलाफ लड़ती है। हालिया लोकल बॉडी चुनावों में जीत के बाद कांग्रेस केरल में किसी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहती। इसका असर राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन राजनीति की सोच पर भी पड़ रहा है।

विपक्षी गठबंधन I.N.D.I.A. के दो प्रमुख घटक होने के बावजूद कांग्रेस और लेफ्ट ने बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर अब तक कोई औपचारिक बातचीत नहीं की है। यह स्थिति 2021 से बिल्कुल उलट है, जब दिसंबर 2020 में ही दोनों ने साथ चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया था। उस समय बना संयुक्त मोर्चा पूरी तरह विफल रहा।

इन अनुभवों ने कांग्रेस को आत्ममंथन के लिए मजबूर किया है। पार्टी के रणनीतिकार मानते हैं कि अगर कांग्रेस को बंगाल में फिर से राजनीतिक प्रासंगिकता हासिल करनी है तो उसे लंबे समय तक संगठन निर्माण, जमीनी संघर्ष और स्वतंत्र पहचान पर काम करना होगा। इसके लिए अकेले चुनाव लड़ना कठिन जरूर है लेकिन शायद यही एकमात्र रास्ता है।