Ugcs New Rules Equality For Sc st Obc Or Neglect Of Savarnas
संतुलन की ज़रूरत
नवभारत टाइम्स•
उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता के लिए यूजीसी के नए नियम विवादों में हैं। ये नियम एससी-एसटी और ओबीसी छात्रों के सम्मान की रक्षा के लिए लाए गए हैं। हालांकि, सवर्ण समाज को लगता है कि उनके प्रति होने वाले भेदभाव को इसमें शामिल नहीं किया गया है। नियमों के दुरुपयोग की चिंता भी जताई जा रही है।
उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता लाने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा बनाए गए नए नियमों पर विवाद गहराता जा रहा है। ये नियम अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के छात्रों के सम्मान की रक्षा के लिए लाए गए हैं, लेकिन सवर्ण समाज इसे लेकर चिंतित है। नियमों की मंशा पर किसी को आपत्ति नहीं है, पर इसमें संतुलन की कमी को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में भी एक याचिका दायर की गई है।
UGC ने 13 जनवरी को 'Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations' को अधिसूचित किया था। इन नियमों में SC-ST और OBC छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव को परिभाषित किया गया है और उन्हें रोकने के उपाय बताए गए हैं। हालांकि, विरोध करने वालों का कहना है कि इन नियमों में सवर्ण छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव का कोई जिक्र नहीं है। ऐसा लगता है जैसे सवर्ण छात्रों को स्वाभाविक रूप से दोषी मान लिया गया है।यह नियम एक साल की मशक्कत के बाद लागू हो पाए हैं। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2025 तक UGC को नए नियम बनाने का आदेश दिया था। जो ड्राफ्ट सामने आया था, वह अंतिम नियमों से काफी अलग था। ड्राफ्ट में झूठी शिकायत करने पर जुर्माने का प्रावधान था। लेकिन, दिग्विजय सिंह की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति के सुझाव पर इस प्रावधान को हटा दिया गया।
समिति का तर्क था कि जुर्माने के डर से पीड़ित छात्र शिकायत करने से कतराएंगे। यह सोच शायद सही हो, लेकिन झूठी शिकायतों से निपटने के लिए कुछ तो उपाय होने चाहिए थे। इसी तरह, यह मान लेना कि सवर्ण छात्रों के साथ भेदभाव नहीं हो सकता, यह भी सही नहीं है।
नियमों का पालन और निगरानी के लिए संस्थानों में समिति और उप-समितियां बनाने का प्रावधान है। लेकिन, इन समितियों में भी सवर्ण समाज की नुमाइंदगी नहीं रखी गई है। इन वजहों से नियमों के दुरुपयोग की चिंता बढ़ गई है। सरकार भले ही भरोसा दिलाने की कोशिश कर रही हो, लेकिन BJP में भी स्थानीय स्तर पर कुछ नेताओं के इस्तीफे से लगता है कि इसका कोई खास असर नहीं हो रहा है।
जातिगत भेदभाव समाज की एक कड़वी सच्चाई है। आंकड़े बताते हैं कि 2019-20 में संस्थानों में ऐसी 173 शिकायतें दर्ज हुईं थीं। यह संख्या 2023-24 में बढ़कर 378 हो गई। इन शिकायतों को रोकने के लिए सख्त नियमों की जरूरत है। लेकिन, नियमों से किसी भी वर्ग को ऐसा महसूस नहीं होना चाहिए कि उसकी अनदेखी की जा रही है।
नए नियमों के तहत, उच्च शिक्षण संस्थानों में SC-ST और OBC छात्रों के साथ होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। इन नियमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी छात्रों को समान अवसर मिलें और किसी भी छात्र के साथ उसकी जाति के आधार पर भेदभाव न हो।
हालांकि, सवर्ण समाज के कुछ लोगों का मानना है कि इन नियमों में उनके हितों का ध्यान नहीं रखा गया है। उनका कहना है कि झूठी शिकायतों से बचाव के लिए कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। इससे उन्हें बेवजह परेशान किया जा सकता है।
यह भी चिंता का विषय है कि नियमों के पालन के लिए बनाई जाने वाली समितियों में सवर्ण समाज का प्रतिनिधित्व नहीं है। इससे नियमों के दुरुपयोग की आशंका बढ़ जाती है। सरकार की ओर से भरोसा दिलाने के बावजूद, जमीनी स्तर पर स्थिति अलग दिख रही है।
यह सच है कि जातिगत भेदभाव एक गंभीर समस्या है। आंकड़ों से यह साफ है कि ऐसी शिकायतों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसलिए, सख्त नियमों की आवश्यकता है। लेकिन, इन नियमों को इस तरह से बनाया जाना चाहिए कि वे सभी वर्गों के लिए न्यायसंगत हों और किसी को भी उपेक्षित महसूस न हो।
यह एक नाजुक संतुलन बनाने का मामला है। एक तरफ, हमें यह सुनिश्चित करना है कि वंचित समुदायों के छात्रों को समान अवसर मिलें और उनके साथ कोई भेदभाव न हो। दूसरी तरफ, हमें यह भी ध्यान रखना है कि किसी भी निर्दोष व्यक्ति को झूठे आरोपों में न फंसाया जाए।
UGC को इन चिंताओं को दूर करने के लिए और अधिक कदम उठाने की जरूरत है। नियमों में सुधार करके और सभी वर्गों को शामिल करके ही इस विवाद को सुलझाया जा सकता है। तभी उच्च शिक्षण संस्थानों में सच्ची समानता स्थापित हो पाएगी।