रक्षा उद्योग को सेना का भरोसा भी जीतना होगा

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defense industry winning the armys trust is the key to self reliance
पूनम पाण्डे

भारत डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भरता को अपनी रणनीतिक प्राथमिकता बना चुका है। सहयोगी देशों के साथ होने वाली रक्षा साझेदारियों में भी ‘मेक इन इंडिया’ एक अहम शर्त बनता जा रहा है। कुछ दिनों पहले फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बातचीत में रक्षा प्लेटफॉर्म और उन्नत तकनीकों के संयुक्त डिजाइन, संयुक्त विकास और संयुक्त उत्पादन को बढ़ावा देने पर सहमति बनी। फ्रांस भी स्पष्ट कर चुका है कि भविष्य की रक्षा डील में ‘मेक इन इंडिया’ अहम तत्व होगा।
सीनियर मिलिट्री अधिकारी बार-बार कह चुके हैं कि यदि उनकी ऑपरेशनल जरूरतों का 75-80% हिस्सा भी स्वदेशी कंपनियां पूरा कर देती हैं तो वे ऐसे उत्पाद स्वीकार करने को तैयार हैं। यह स्वदेशी डिफेंस इंडस्ट्री के प्रति भरोसे और प्रतिबद्धता का संकेत है।

टाइमलाइन का ख्याल जरूरी

लेकिन आत्मनिर्भरता की इस यात्रा की एक अहम फैक्टर है भरोसा कायम रखना। सेनाओं का अनुभव बताता है कि कई स्वदेशी कंपनियों को समयसीमा और गुणवत्ता, दोनों मोर्चों पर अभी लंबा सफर तय करना है। एयरफोर्स दो सालों से स्वदेशी लड़ाकू विमान तेजस मार्क-1A की डिलिवरी का इंतजार कर रही है। स्थिति यह है कि रक्षा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी को हाल में कहना पड़ा कि अब हम नई टाइमलाइन भी नहीं बता रहे हैं क्योंकि डेडलाइन इतनी बार आगे बढ़ चुकी है कि उसका रेकॉर्ड रखना भी मुश्किल हो गया है। वॉटर ड्रोन के एक कॉन्ट्रैक्ट में कंपनी ने 50 मील की रेंज का वादा किया, लेकिन बाद में कहा कि वह कम्युनिकेशन रेंज सिर्फ 10 मील की ही दे सकते हैं। एक सीनियर अधिकारी ने कहा कि कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने या जुर्माना लगाने का विकल्प तो होता है, लेकिन उसका सबसे बड़ा नुकसान हमें ही उठाना पड़ता है। पूरी प्रक्रिया दोबारा शुरू करनी पड़ती है और उपकरण मिलने में कई साल और लग जाते हैं।

यही वजह है कि सेनाएं अब स्पष्ट संदेश दे रही हैं कि जितना संभव हो, उतना ही वादा करें। अधिक वादे और कम प्रदर्शन से सिर्फ किसी एक प्रोजेक्ट को नुकसान नहीं होता बल्कि पूरी इंडस्ट्री की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।

सोच-समझकर करें वादा

रक्षा मंत्रालय के आंकड़े देखें तो भारत में रक्षा उत्पादन वित्त वर्ष 2025-26 में बढ़कर अब तक के सबसे ऊंचे स्तर 1.78 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। यह पिछले वित्त वर्ष 2025 के 1.54 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले 15.6% अधिक है। सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा कंपनियों और अन्य सरकारी उपक्रमों का देश के कुल रक्षा उत्पादन में लगभग 76% योगदान रहा। प्राइवेट सेक्टर की हिस्सेदारी बढ़कर 24% हो गई, जो 2024-25 में 22% थी। भारत सिर्फ हथियारों का आयातक नहीं, बल्कि प्रमुख निर्यातक बनने की दिशा में बढ़ रहा है। लेकिन इसमें सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि स्वदेशी कंपनियां अपनी क्षमताओं का सही आकलन करें, वही समयसीमा तय करें जिसे पूरा कर सकें और क्वॉलिटी से समझौता न करें। क्योंकि रक्षा क्षेत्र में कीमती सिर्फ तकनीक नहीं बल्कि भरोसा भी होता है।