सिंगल विमिन की अनदेखी क्यों

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भारत में इस समय कितनी सिंगल विमिन हो सकती हैं? सीधे जवाब पर पहुंचने से पहले कुछ आंकड़ों को देख लेते हैं। 2001 में सिंगल विमिन की संख्या करीब 5.12 करोड़ थी, जो 2011 तक बढ़कर लगभग 7.14 करोड़ हो गई। यानी, महज 10 बरसों में 39% का इजाफा। इस गणना के हिसाब से 2026 में देश में सिंगल विमिन की संख्या 12.6 करोड़ के आसपास हो चली है।

बढ़ती हिस्सेदारी । 2001 में इस वर्ग विशेष की जनसंख्या में जितनी हिस्सेदारी थी, आज उससे दोगुने से भी अधिक है। और तो और, यह आंकड़ा जापान की कुल आबादी (12.3 करोड़) से भी ज्यादा है। इसके बावजूद क्या कारण है कि सरकारी नीतियों, चर्चाओं, विमर्श और कानून से लेकर कॉरपोरेट गाइडलाइंस तक में इस वर्ग की अनदेखी होती है।
सिंगल विमिन क्या । इसका मतलब है वे महिलाएं, जो अपनी इच्छा या परिस्थितियों की वजह से अविवाहित हैं। या फिर, परित्यक्त या तलाक/वैधव्य के चलते सिंगल हुईं 20 से अधिक उम्र की महिलाएं। वह महिला जिसने कभी विवाह किया नहीं और अगर किया भी तो अब विवाह की परिधि से बाहर है और बिना जीवनसाथी के रह रही है। सिंगल विमिन का शाब्दिक अनुवाद एकल महिला हो सकता है। अपने आस-पास नजर दौड़ाइए, पिछले दशक के मुकाबले आपको अब इस वर्ग की कई महिलाएं दिख जाएंगी।

आंकड़ों का खेल । यहां इस्तेमाल किए गए 2001 और 2011 के आंकड़े जनगणना आधारित हैं, जबकि वृद्धि दर और 2026 का डेटा इन्हीं जनगणना आंकड़ों के आधार पर लगाया गया अनुमान। इन आंकड़ों के आधार पर अगर बहुत पारंपरिक ढंग से अनुमान लगाएं और मान कर चलें कि वृद्धि दर धीमी पड़ सकती है, तो भी सिंगल विमिन की संख्या 9.8 करोड़ से 10 करोड़ के बीच मिलेगी। हालांकि, वृद्धि दर कम करके देखना हालात से मुंह चुराने जैसा है। वहीं अगर पिछले दशकों में दिखे सामाजिक और जनसांख्यिकीय रुझान ऐसे ही मजबूत बने रहे, तो यह संख्या 12.6 करोड़ से बढ़कर 14.8 करोड़ तक भी पहुंच सकती है।

सामाजिक बदलाव । संख्या में भारी इजाफे की वजह है मौजूदा सामाजिक रुझान - युवा पीढ़ी का विवाह से दूरी बनाना, परिवार के पितृसत्तात्मक ढांचे से तिलमिलाहट, विवाह की आयु का आगे खिसकना, तमाम पीढ़ियों में तलाक की बढ़ती दरें, शिक्षा, जागरूकता, बदलती सोच और अपेक्षाएं। शहर-कस्बों में अधिकांश लड़कियां आत्मनिर्भरता और साथी के चुनाव में हड़बड़ी न करने पर फोकस करती हैं। वैसे ये परिवर्तन वर्तमान अनुमान से भी तेजी से होते हैं, तो एकल लोगों की आबादी में ऐतिहासिक इजाफा होगा।

वैश्विक परिदृश्य । अमेरिका, यूरोप, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में भी विवाह दर लगातार घट रही है। अमेरिका में 2023 तक 25-34 आयु वर्ग की 41% महिलाएं सिंगल थीं। इसलिए यह प्रवृत्ति केवल भारत में नहीं है, पूरी दुनिया में सामाजिक परिदृश्य बदल रहा है।

योजनाओं में गौण । आबादी में इतनी बड़ी मौजूदगी होने के बावजूद मौजूदा नियम-कानूनों में सिंगल विमिन की अलग पहचान लगभग नहीं के बराबर है। विवाहित या विधवा महिलाओं को पेंशन और योजनाओं के लाभ मिलते हैं, पर अविवाहित महिलाओं के लिए ऐसी आर्थिक सुरक्षा नहीं है। इससे उनकी सामाजिक-आर्थिक असुरक्षा बढ़ती है, खासकर उम्र बढ़ने पर।

मुश्किल स्थिति । महिला सुरक्षा ही अपने आप में बड़ा मुद्दा है, ऐसे में सिंगल विमिन की स्थिति और नाजुक हो जाती है। समाज का ताना-बाना ऐसा है कि कई मामलों में वह शारीरिक-आर्थिक संदर्भ में विवाहित महिला के मुकाबले अधिक संवेदनशील होती है। परित्यक्त, तलाकशुदा अक्सर ही सोशल बॉयकॉट का सामना करती हैं। कई बार महिला सिंगल होती है, पर बुजुर्ग माता-पिता, बच्चों या अन्य तरह के आश्रितों की जिम्मेदारी उन पर होती है।

दृष्टिकोण बदलें । समय आ गया है कि सिंगल विमिन के हितों-चुनौतियों पर भी वैसी ही चर्चा हो, जैसी समाज के अन्य वर्गों को लेकर होती है। फिलहाल कल्याणकारी योजनाएं मुख्य रूप से परिवार और विवाह आधारित ढांचे पर टिकी हैं, जिनका दायरा बढ़ाया जाना चाहिए। समाज में स्वीकार्यता धीरे-धीरे आ रही है। लेकिन, नियमों-कानूनों में बदलाव समय से हो।