86 Lakh Cattle Catching Vehicles Gathering Dust Cattle free City Only On Paper
86 लाख रुपये की पशुओं को पकड़ने वाली गाड़ियां चाट रहीं धूल
नवभारत टाइम्स•
फरीदाबाद नगर निगम ने गोवंश पकड़ने के लिए 86 लाख रुपये की पांच गाड़ियां खरीदीं। ये गाड़ियां ड्राइवरों के अभाव में निगम ऑडोटोरियम परिसर में खड़ी धूल फांक रही हैं। इससे गोवंश को पकड़ने का अभियान बाधित हो रहा है। शहर में आज भी सड़कों पर गोवंश के झुंड देखे जा सकते हैं।
फरीदाबाद नगर निगम ने गोवंश को पकड़ने के लिए भले ही पांच गाड़ियां खरीदी हों, लेकिन ये गाड़ियां ड्राइवरों के बिना निगम ऑडोटोरियम परिसर में धूल फांक रही हैं। इन गाड़ियों पर करीब 86 लाख रुपये खर्च किए गए हैं, लेकिन इनका इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है, जिससे इनकी वारंटी भी खत्म हो रही है। इसी वजह से शहर में गोवंश का आतंक कम नहीं हो रहा है और सड़कों पर झुंड देखे जा सकते हैं। आरटीआई कार्यकर्ता अजय सैनी ने इस मामले में जानकारी मांगी तो अधिकारियों ने सिर्फ गाड़ियों की कीमत बताई, बाकी बिंदुओं पर चुप्पी साध ली।
शहर को कैटल फ्री घोषित करने के बावजूद सड़कों पर गोवंश का जमावड़ा लगा रहता है। निगम और प्राइवेट संस्थाएं गोशालाएं चला रही हैं, जहां गोवंश को पहुंचाया जा रहा है। सरकार भी इस दिशा में काम कर रही है। लेकिन हकीकत यह है कि शहर कागजों में ही कैटल फ्री है, असल में नहीं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब शहर कैटल फ्री है तो फिर गोवंश को पकड़ने के लिए पांच गाड़ियां खरीदने की क्या जरूरत थी?ये गाड़ियां निगम ऑडोटोरियम परिसर में खड़ी हैं और बिना ड्राइवरों के बेकार पड़ी हैं। इन गाड़ियों की वारंटी भी खत्म हो रही है। इससे गोवंश को पकड़ने का अभियान ठीक से नहीं चल पा रहा है। यही कारण है कि आज भी शहर की सड़कों पर गोवंश के झुंड देखे जा सकते हैं। गोवंश का आतंक गांवों, शहरों और कॉलोनियों में फैला हुआ है। ये झुंड बनाकर सड़कों पर बैठे रहते हैं या घूमते रहते हैं, जिससे लोगों को परेशानी होती है।
आरटीआई कार्यकर्ता अजय सैनी ने इस मामले में जनसूचना अधिकार के तहत जानकारी मांगी थी। उन्होंने कई बिंदुओं पर सवाल उठाए थे, लेकिन अधिकारियों ने केवल गाड़ियों की कीमत बताकर मामले को टाल दिया। यह जानकारी भी सामने आई है कि इन गाड़ियों को खरीदने में करीब 86 लाख रुपये खर्च हुए थे। यह पैसा जनता का है और इसका सही इस्तेमाल होना चाहिए।
यह स्थिति चिंताजनक है। एक तरफ सरकार और निगम गोवंश को सड़कों से हटाने का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ खरीदी गई गाड़ियां बेकार पड़ी हैं। इससे न केवल सरकारी पैसे की बर्बादी हो रही है, बल्कि शहर में गोवंश की समस्या भी जस की तस बनी हुई है। इस मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत है। अधिकारियों को इस पर ध्यान देना चाहिए और इन गाड़ियों का सही इस्तेमाल सुनिश्चित करना चाहिए ताकि शहर को कैटल फ्री बनाने के लक्ष्य को हासिल किया जा सके।