Munshi Premchands Subhagi Comes Alive In Sanskrit Play Based On Child Marriage And Widowhoods Plight
संस्कृत में जीवंत हुई 'सुभागी'
नवभारत टाइम्स•
लखनऊ में संस्कृत नाट्य प्रशिक्षण कार्यशाला संपन्न हुई। इसमें मुंशी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी 'सुभागी' का संस्कृत में मंचन हुआ। बाल-विवाह और विधवा जीवन की समस्याओं को दर्शाया गया। देवाशीष मिश्र ने निर्देशन किया। रोजी मिश्रा ने कार्यशाला का निर्देशन किया। प्रखर द्विवेदी के संस्कृत संभाषणों ने नाटक को प्रभावशाली बनाया।
लखनऊ: उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान और 'रंगनाद' ने मिलकर 15 दिनों की संस्कृत नाट्य प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया। इस कार्यशाला का समापन मंगलवार को मुंशी प्रेमचंद की मशहूर कहानी 'सुभागी' के संस्कृत रूपांतरण के मंचन के साथ हुआ। इस नाटक ने अपनी संवेदनशीलता और दमदार प्रस्तुति से दर्शकों का दिल जीत लिया। यह कार्यशाला मंगला देवी हाईस्कूल में हुई, और नाटक का मंचन तोपखाना प्रेक्षागृह में हुआ। देवाशीष मिश्र ने नाटक की कल्पना की और उसका निर्देशन किया, जबकि रोजी मिश्रा ने कार्यशाला का निर्देशन संभाला। प्रखर द्विवेदी द्वारा तैयार किए गए संस्कृत संवाद खास आकर्षण थे, जिन्होंने हिंदी की इस कहानी को संस्कृत में बहुत असरदार बना दिया। नाटक ने बाल-विवाह और विधवा जीवन की मुश्किलों जैसे अहम सामाजिक मुद्दों को उठाया। आद्या मिश्रा के संगीत ने मंच पर एक गाँव का माहौल बना दिया।
इस 15 दिवसीय कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य संस्कृत में नाट्य कला को बढ़ावा देना था। कार्यशाला के अंतिम दिन पेश किया गया नाटक 'सुभागी' इसी प्रयास का एक नतीजा था। इस नाटक के ज़रिए प्रेमचंद की कहानी को संस्कृत भाषा में जीवंत किया गया। दर्शकों ने नाटक की प्रस्तुति की खूब सराहना की।देवाशीष मिश्र ने नाटक की परिकल्पना और निर्देशन का जिम्मा संभाला। वहीं, रोजी मिश्रा ने पूरी कार्यशाला का निर्देशन किया। यह कार्यशाला युवा कलाकारों को संस्कृत में अभिनय और नाट्य मंचन की बारीकियां सिखाने के लिए आयोजित की गई थी।
प्रखर द्विवेदी के संस्कृत संवादों ने सबको प्रभावित किया। उन्होंने हिंदी की कहानी को संस्कृत में इस तरह ढाला कि वह सुनने में बहुत अच्छी लगी। यह संस्कृत संभाषण कार्यशाला का एक खास हिस्सा था।
नाटक में बाल-विवाह और विधवाओं के जीवन की कठिनाइयों जैसे गंभीर सामाजिक मुद्दों को दिखाया गया। इन मुद्दों को मंच पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया गया। आद्या मिश्रा के संगीत संयोजन ने नाटक के ग्रामीण माहौल को और भी वास्तविक बना दिया। संगीत ने दर्शकों को कहानी के माहौल में पूरी तरह डुबो दिया।