Khameneis Assassination Instability In West Asia And Impact On India
ख़ामेनेई की हत्या से पूरा इलाक़ा अस्थिर हुआ
नवभारत टाइम्स•
ईरान के सर्वोच्च नेता ख़ामेनेई की हत्या से पश्चिम एशिया में अस्थिरता का माहौल है। यह घटना पूरे क्षेत्र को बदल सकती है और भारत पर भी इसका असर पड़ेगा। अमेरिका और इस्राइल के लक्ष्य स्पष्ट नहीं हैं। इस संघर्ष से खाड़ी देशों में नई गठबंधन की संभावना है। भारत को अपनी विदेश नीति को संतुलित रखना होगा।
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत पर भारत ने दुख जताया है, लेकिन इस पर प्रतिक्रिया में हुई देरी को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इस बीच, रूस और अमेरिका जैसे कई देशों में भारतीय राजदूत रह चुके और अब विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन में विशिष्ट फेलो अनिल त्रिगुणायत इस मामले को एक अलग नजरिए से देखते हैं। शैलेंद्र पांडेय के साथ एक खास बातचीत में उन्होंने बताया कि यह संघर्ष पश्चिम एशिया को कैसे बदल सकता है और इसका भारत पर क्या असर पड़ सकता है।
अमेरिका-इज़राइल के लक्ष्य और पश्चिम एशिया का बदलता समीकरणअनिल त्रिगुणायत के अनुसार, अमेरिका और इज़राइल अपने लक्ष्यों को लेकर काफी भ्रमित हैं और अपने एजेंडे को बार-बार बदल रहे हैं। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों से पहले ऐसा लग रहा था कि उनका मुख्य उद्देश्य ईरान में सत्ता परिवर्तन करना था, यानी ऐसी सरकार लाना जो उनकी बात माने। हालांकि, एक कड़वी सच्चाई यह है कि अयातुल्लाह अली खामेनेई ने ईरान को हमेशा परमाणु हथियारों से दूर रखा था। इसके बावजूद, दोनों पक्षों के बीच ऐतिहासिक रूप से बातचीत चल रही थी। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि इज़राइल हमला करना चाहता था, इसलिए उन्हें ऐसा करना पड़ा। उन्हें लगा कि खामेनेई को मारने से संकट हल हो जाएगा। कुल मिलाकर, ये सभी कदम बहुत ही कन्फ्यूज्ड लग रहे हैं।
यह लड़ाई अब पूरे पश्चिम एशिया में फैल चुकी है और ईरान मुस्लिम दुनिया में अलग-थलग पड़ता दिख रहा है। इस संघर्ष के बाद भू-राजनीतिक स्थिति क्या रूप ले सकती है, इस पर त्रिगुणायत का कहना है कि ईरान ने शुरू से ही कहा है कि अगर हमला हुआ तो वह क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी संपत्तियों को निशाना बनाएगा। उनका मानना है कि यह सही नहीं है। देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर ही अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा टिकी होती है। इसके अलावा, ईरान और सऊदी अरब या शिया-सुन्नी देशों के बीच अच्छी बातचीत चल रही थी। लेकिन, ईरान के हमलों ने खाड़ी देशों को ऐसे समूह में खड़ा कर दिया है कि जरूरत पड़ने पर अमेरिका उनका फिर से इस्तेमाल कर सकता है। आज का जमाना 'ग्रे जोन वॉरफेयर' का है। उदाहरण के लिए, ब्रिटेन ने कहा है कि साइप्रस में हमला करने वाला ड्रोन ईरान का नहीं था। इसी तरह, ईरान ने सऊदी अरब और कतर के गैस फील्ड पर हुए हमलों से इनकार किया है, जबकि बाकी हमलों को वह मान रहा है। अब इस क्षेत्र में अमेरिका और इज़राइल का सबसे ज्यादा हित है। इसलिए, उनकी एजेंसियां भी इस तरह के ऑपरेशन कर सकती हैं। इस बारे में जांच चल रही है। सऊदी अरब ईरान के खिलाफ गठबंधन का हिस्सा बनने के लिए मजबूर हो जाएगा।
भारत के लिए ईरान के साथ संबंध और रणनीतिक स्वायत्तता
भारत ने वर्षों तक ईरान के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे हैं। अनिल त्रिगुणायत बताते हैं कि खामेनेई ने भारत के साथ रणनीतिक संबंधों के बजाय धार्मिक नजरिए को ज्यादा महत्व दिया। कश्मीर और मुस्लिमों पर उनके कई बयान नई दिल्ली को पसंद नहीं आए थे। लेकिन, उन्हें मारने का मतलब है पूरे क्षेत्र को अस्थिर करना। इसका सीधा असर भारत पर पड़ता है। उन्हें खुशी है कि भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने ईरानी दूतावास जाकर कंडोलेंस बुक पर हस्ताक्षर किया।
अमेरिका के साथ भारत की बढ़ती साझेदारी यूक्रेन युद्ध के दौरान भी भारत को दुविधा में डाल चुकी है। अब फिर वैसे ही हालात हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि न चाहते हुए भी देश को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता करना पड़ रहा है? इस पर त्रिगुणायत का कहना है कि विदेश नीति का मुख्य लक्ष्य हर परिस्थिति में राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है। ऐसे हालात आते रहते हैं। 1971 की जंग में जब अमेरिका हमें दबा रहा था, तब सोवियत संघ के साथ समझौता करना पड़ा था। रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब है कि हम किसी से गठबंधन नहीं करते, बल्कि 'मल्टी-अलाइनमेंट' में यकीन रखते हैं। लेकिन, कई बार देशहित में इसे फिर से समायोजित करना पड़ता है।
कूटनीतिक संकट और हिंद महासागर में भारत की भूमिका
भारत से निकले ईरान के एक जहाज को श्रीलंका के पास अमेरिका ने डुबो दिया। इस तरह के कूटनीतिक संकट कैसे हल किए जाते हैं, क्योंकि इसमें बिना किसी बात के भारत का भी जिक्र आ गया? इस घटना को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं, जैसे कि क्या भारत को इसकी जानकारी थी, और अमेरिका इस क्षेत्र में क्यों आया? इन सबके बावजूद, इस समय अमेरिका और ईरान युद्ध की स्थिति में हैं और कहा जाता है कि युद्ध में हर चीज जायज होती है। यहां बस एक ही बिंदु देखने लायक है कि भारत एक क्षेत्रीय शक्ति है, हिंद महासागर को हम अपना पिछवाड़ा मानते हैं, और अमेरिका ने यहां आकर कार्रवाई की।
खामेनेई के बाद ईरान और चीन को काउंटर करने में भारत की भूमिका
खामेनेई के बाद के ईरान में क्या भारत के लिए ज्यादा जगह होगी? क्या यह चीन को काउंटर करने में मदद कर सकता है? अनिल त्रिगुणायत को लगता है कि इस लड़ाई में चीन और रूस की चुप्पी उनके लिए भी घातक होगी। चीन की साख कम होगी। इलाके के सारे देश अब 'ट्रांजैक्शनल रिलेशनशिप्स' बढ़ाएंगे। रणनीतिक रूप से महाशक्तियों को नुकसान हुआ है। हालांकि, चीन का आर्थिक महत्व बना रहेगा, क्योंकि वह एक बड़ी अर्थव्यवस्था है। अगर खामेनेई के बेटे सत्ता में आते हैं, तो नई दिल्ली-तेहरान के रिश्ते पहले जैसे ही रहेंगे।
पश्चिम एशिया में अस्थिरता का बढ़ता खतरा
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत ने पश्चिम एशिया में एक नई अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। भारत ने इस घटना पर दुख व्यक्त किया है, लेकिन इस पर प्रतिक्रिया में हुई देरी को लेकर कुछ सवाल भी उठाए जा रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए, हमें रूस और अमेरिका जैसे कई देशों में भारतीय राजदूत रह चुके और अब विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन में विशिष्ट फेलो अनिल त्रिगुणायत की बातों पर गौर करना होगा। उन्होंने शैलेंद्र पांडेय के साथ एक खास बातचीत में इस संघर्ष के संभावित प्रभावों और भारत पर इसके असर के बारे में विस्तार से बताया है।
अमेरिका और इज़राइल के भ्रमित लक्ष्य
त्रिगुणायत के अनुसार, अमेरिका और इज़राइल अपने लक्ष्यों को लेकर काफी उलझन में हैं और अपने एजेंडे को बार-बार बदल रहे हैं। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बयानों से ऐसा लग रहा था कि उनका मुख्य उद्देश्य ईरान में सत्ता परिवर्तन करना था, यानी ऐसी सरकार लाना जो उनकी बात माने। लेकिन, एक कड़वी सच्चाई यह है कि अयातुल्लाह अली खामेनेई ने ईरान को हमेशा परमाणु हथियारों से दूर रखा था। इसके बावजूद, दोनों पक्षों के बीच बातचीत चल रही थी। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि इज़राइल हमला करना चाहता था, इसलिए उन्हें ऐसा करना पड़ा। उन्हें लगा कि खामेनेई को मारने से संकट हल हो जाएगा। कुल मिलाकर, ये सभी कदम बहुत ही कन्फ्यूज्ड लग रहे हैं।
क्षेत्रीय अस्थिरता और 'ग्रे जोन वॉरफेयर' का बढ़ता चलन
यह लड़ाई अब पूरे पश्चिम एशिया में फैल चुकी है और ईरान मुस्लिम दुनिया में अलग-थलग पड़ता दिख रहा है। इस संघर्ष के बाद भू-राजनीतिक स्थिति क्या रूप ले सकती है, इस पर त्रिगुणायत का कहना है कि ईरान ने शुरू से ही कहा है कि अगर हमला हुआ तो वह क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी संपत्तियों को निशाना बनाएगा। उनका मानना है कि यह सही नहीं है। देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता पर ही अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा टिकी होती है। इसके अलावा, ईरान और सऊदी अरब या शिया-सुन्नी देशों के बीच अच्छी बातचीत चल रही थी। लेकिन, ईरान के हमलों ने खाड़ी देशों को ऐसे समूह में खड़ा कर दिया है कि जरूरत पड़ने पर अमेरिका उनका फिर से इस्तेमाल कर सकता है। आज का जमाना 'ग्रे जोन वॉरफेयर' का है। उदाहरण के लिए, ब्रिटेन ने कहा है कि साइप्रस में हमला करने वाला ड्रोन ईरान का नहीं था। इसी तरह, ईरान ने सऊदी अरब और कतर के गैस फील्ड पर हुए हमलों से इनकार किया है, जबकि बाकी हमलों को वह मान रहा है। अब इस क्षेत्र में अमेरिका और इज़राइल का सबसे ज्यादा हित है। इसलिए, उनकी एजेंसियां भी इस तरह के ऑपरेशन कर सकती हैं। इस बारे में जांच चल रही है। सऊदी अरब ईरान के खिलाफ गठबंधन का हिस्सा बनने के लिए मजबूर हो जाएगा।
भारत के लिए ईरान के साथ संबंध और रणनीतिक स्वायत्तता का संतुलन
भारत ने वर्षों तक ईरान के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे हैं। अनिल त्रिगुणायत बताते हैं कि खामेनेई ने भारत के साथ रणनीतिक संबंधों के बजाय धार्मिक नजरिए को ज्यादा महत्व दिया। कश्मीर और मुस्लिमों पर उनके कई बयान नई दिल्ली को पसंद नहीं आए थे। लेकिन, उन्हें मारने का मतलब है पूरे क्षेत्र को अस्थिर करना। इसका सीधा असर भारत पर पड़ता है। उन्हें खुशी है कि भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने ईरानी दूतावास जाकर कंडोलेंस बुक पर हस्ताक्षर किया।
अमेरिका के साथ भारत की बढ़ती साझेदारी यूक्रेन युद्ध के दौरान भी भारत को दुविधा में डाल चुकी है। अब फिर वैसे ही हालात हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि न चाहते हुए भी देश को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता करना पड़ रहा है? इस पर त्रिगुणायत का कहना है कि विदेश नीति का मुख्य लक्ष्य हर परिस्थिति में राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना है। ऐसे हालात आते रहते हैं। 1971 की जंग में जब अमेरिका हमें दबा रहा था, तब सोवियत संघ के साथ समझौता करना पड़ा था। रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब है कि हम किसी से गठबंधन नहीं करते, बल्कि 'मल्टी-अलाइनमेंट' में यकीन रखते हैं। लेकिन, कई बार देशहित में इसे फिर से समायोजित करना पड़ता है।
कूटनीतिक संकट और हिंद महासागर में भारत की बढ़ती भूमिका
भारत से निकले ईरान के एक जहाज को श्रीलंका के पास अमेरिका ने डुबो दिया। इस तरह के कूटनीतिक संकट कैसे हल किए जाते हैं, क्योंकि इसमें बिना किसी बात के भारत का भी जिक्र आ गया? इस घटना को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं, जैसे कि क्या भारत को इसकी जानकारी थी, और अमेरिका इस क्षेत्र में क्यों आया? इन सबके बावजूद, इस समय अमेरिका और ईरान युद्ध की स्थिति में हैं और कहा जाता है कि युद्ध में हर चीज जायज होती है। यहां बस एक ही बिंदु देखने लायक है कि भारत एक क्षेत्रीय शक्ति है, हिंद महासागर को हम अपना पिछवाड़ा मानते हैं, और अमेरिका ने यहां आकर कार्रवाई की।
खामेनेई के बाद ईरान और चीन को काउंटर करने में भारत की भूमिका का आकलन
खामेनेई के बाद के ईरान में क्या भारत के लिए ज्यादा जगह होगी? क्या यह चीन को काउंटर करने में मदद कर सकता है? अनिल त्रिगुणायत को लगता है कि इस लड़ाई में चीन और रूस की चुप्पी उनके लिए भी घातक होगी। चीन की साख कम होगी। इलाके के सारे देश अब 'ट्रांजैक्शनल रिलेशनशिप्स' बढ़ाएंगे। रणनीतिक रूप से महाशक्तियों को नुकसान हुआ है। हालांकि, चीन का आर्थिक महत्व बना रहेगा, क्योंकि वह एक बड़ी अर्थव्यवस्था है। अगर खामेनेई के बेटे सत्ता में आते हैं, तो नई दिल्ली-तेहरान के रिश्ते पहले जैसे ही रहेंगे।